एक संवेदनाहीन "लोकतांत्रिक" समाज
कुछ दिनों पूर्व एक सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश की मृत्यु हुई... उसके विपरीत विचारधारा रखने वालों ने उसका पुरजोर जश्न मनाया...
ऐसे ही जश्न का प्रदर्शन प्रसिद्ध शायर राहत इंदौरी की मृत्यु के बाद किया गया था..
गृह मंत्री अमित शाह एम्स में भर्ती हुए तो गिद्ध विचारधारा वाले ऐसे ही लोगो ने उनकी मृत्यु की कामना के memes बनाने शुरू कर दिए...
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तो मारने तक कि बाते लोगो को करते हुए देखा जा सकता है..
मुझे समझ नही आता कि क्या हम इतने संवेदनाहींन होते जा रहे है?
हम सब लोग आतंकवादियो से नफरत करने का पाखण्ड करते है, लेकिन क्या हमारी और आतंकवादियो की विचारधारा एक जैसी नही है?
वो भी तो अपने से अलग विचार रखने वालों की मौत पर खुशियां मनाते है, और मौत के घाट उतार देते है..!!
फिर क्या फर्क हुआ उनमे और हम में?
मृत्यु पर प्रसन्नता पैशाचिक है... रावण तक की अंत्येष्टि भगवान ने स्वयं,विधानपूर्वक “बिधिवत देस काल जियँ जानी” कहकर कराई थी...
मानस में रावण की मृत्यु का प्रसंग आता है तब तुलसी जी लिखते है -
“कृपादृष्टि प्रभु ताहि बिलोका,
करहु क्रिया परिहरी सब सोका।”
कँहा से कँहा पहुंचते जा रहे है हम?
हम कैसे समाज का निर्माण कर रहे है?
वैचारिक मतभेद रखने वाले कि मृत्यु की कामना हम कर रहे है, उसकी मृत्यु पर प्रसन्नता जाहिर कर रहे है...
सुषमा स्वराज की मृत्यु पर एक वर्ग ने जो खुशियां जाहिर की थी आज भी स्मृति पटल में वो कंही न कंही चुभ रही है..!
कभी हमने सोचा है कि हम इतना उग्र क्यो होते जा रहे है?
हमारी नन्ही पीढ़ी को हम कैसी मानसिकता देकर जाने वाले है?
इस विषय पर विचार करने की बहुत गहन आवश्यकता है...
पुराने जमाने मे कहा जाता था कि शत्रुता व्यक्ति की मृत्यु के साथ ही खत्म हो जाती है..
हम इतनी सरल लेकिन महत्वपूर्ण बात को क्यो नही समझ पाते?
विरोध करिए, लेकिन विचारधारा का विरोध करिए.... "मानवता" का नही..!
ऐसे ही चला तो हर व्यक्ति एक आतंकवादी ही कहलायेगा, चाहे वो स्वीकार करे या नही..!!
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