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Mar 14, 2022, 23 tweets

"हाथी नही गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है.."

जंगल का सबसे ताकतवर, विशालकाय, इंटेलिजेंट, सामाजिक, शाकाहारी जीव, जिसे ऐसे गगनभेदी नारों से मूर्ख बनाकर सवारी गांठी जाती है।

हाथी सिकंदर के दौर से, मालिकों की लड़ाइयां लड़ता रहा है, उनका हौदा पीठ पर ढोता रहा है। शीश का दान कर, वह
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पूजनीय बन सकता है,मगर राजा नही।

नो पॉलिटिक्स- ऑनली वाइल्डलाइफ सीरीज में गिरगिट, शेर,गैंडे,जंगली गधे, मगरमच्छ, उल्लू, गिद्ध पर बात हो चुकी है, मगर हाथी यहां हमसे भी उपेक्षित रह गया था।

तो आज बात हमारी, याने हाथी की..

साहबान, कदरदान, मितरों,मूर्खो।

आप जानते हैं कि धरती पर
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चलने वाला सबसे विशालकाय मेमल, हाथी है। संस्कृत के हस्ति शब्द से इसका प्रादुर्भाव है। जहां सारे हाथी पकड़कर सेवा में लाये जायें, वह माइथोलॉजिकल शहर हस्तिनापुर कहलाया।

अंग्रेजी में एलिफेंट कहते है, जो ग्रीक शब्द एलिफ़ास से बनता है।एलिफ़ास का मतलब है आइवरी, याने वो दांत, जो बड़े
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कीमती होते हैं।

तो नाम हिंदी हो या ग्रीक, उसका नाम ही उसके शोषण से ही उपजा है।

हाथी का बच्चा ,22 माह के गर्भकाल के बाद, जन्मते ही 100 किलो का रहता है। किसी की मदद के बगैर कुछ ही देर में खड़ा होकर चलने लगता है।

तो आत्मनिर्भरता की मिसाल तो हाथी का बच्चा है, शाह का नही। खैर..
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हाथी धीरे धीरे विकसित होता है,लम्बा वक्त लगता है।असल मे साठ सत्तर साल की कुल उम्र में आधे से ज्यादा वक्त बढ़ता ही रहता है। शरीर मे, अनुभव में..

उसका दिमाग बड़ा होता है,बेहद बड़ा। वह भूलता नही,सब कुछ याद रखता है।बेहद पुरानी बातें,मामूली बातें,अनुपयोगी बातें..

और इन यादों का
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गुलाम भी बनता है।इन्हीं यादोंमें फंसकर मारा भी जाता है।

वो ऐसे कि जिस राहसे वह आता जाता है, उसकी स्मृति इतनी परफेक्ट होतीहै,की वह एग्जेक्टली उसी राह से आयेगा-जाएगा।हाथी बड़ा प्रिडिक्तिबल बिहेव करता है,तो हाथी पकड़ने वाले भी उसी राह में गड्ढा खोदते हैं।

राहमें कीलें बिछातेहैं,
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जाल फैलाते है, और हाथी पकड़ा जाता है।
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छुटपन से पकड़े गए हाथी को, प्रशिक्षण की शाखा में ले जाकर, मोटे खूंटे और मोटी रस्सी से बांध दिया जाता है। शुरुआती कसमसाहट के बाद, जब हाथी का मन, हार मान ले, उसी वक्त वो गुलाम हो जाता है।
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@BramhRakshas

अब वह पतली सी,धुनी हुई झूठ की रस्सी भी तोड़ने की कोशिश नही करता।उसका आत्मा, उसकी ताकत,उसका पूरा हाथीत्व अब पालतू हो जाता है।

फिर पालतू हाथी,और पालतू कुत्ते में ज्यादा अंतर नही जाता।

मगर "कुत्ते भौके हजार, हाथी चले बाजार" वाली कहावत तो है ही।पर यह भी सच है कि हाथी का बाजार में
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कोई काम नही। बाजार तो उस पर बैठे सेठ, शाह और हृदय सम्राट जाते हैं।

पर हाथी के मन की बात पूछी जाए, तो वह इन बवालों से दूर, हरे हरे झुरमुटों की तरफ जाना चाहेगा। प्रकृति के करीब.. शांति की ओर। आजादी की ओर..

क्योकि हाथी बेसिकली शांतिप्रिय है, शाकाहारी भी है।घास, पौधे,पत्ते खाकर
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खुश रहता है।खून खच्चर,मार-काट,शिकार, घात,छल कपट से कोसों दूर।

हाथी बोलता कम है।असल ने ईश्वर ने दो बड़े कान दिए,तो मुंह सिल दिया।जरा अपने ऊपरी होठ को उठाकर नाक से चिपकाइये। कल्पना कीजिये कि दोनों का जोड़ लम्बा होता जा रहा है..

वो पाइप की तरह बेहद लम्बा बढ़ता जा रहा है.. हाँ,
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अभी और बढ़ने दीजिए।

जब वह छह फीट की हो जाये,पैरोंसे टकराने लगे,तब समझिए कि मूंह पर सूंड लटका होना आपको कैसे चुप कर देता है।न फील किया तो कोई बात नही..

आपतो सूंड़के बगैर ही चुपहैं।

मगर हाथीने सूंड़ को बहुत डेवलप कर लिया।इससे वह हवा का रुख सूंघ सकता है।

उसमे वह कई लीटर पानी
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भर सकता है।इसे स्नोर्केलिंग पाइप की तरह ऊपर कर वह गोता लगा सकता है, पानी मे तैर सकता है। जमीन से सुई या कील उठा सकता है, उखाड़ भी सकता है।

हाथी ऐसा चुप भी नही रहता। वह कम्युनिकेट करता है। वह जमीन को अपने पैरों से थपकता है,वह सिस्मिक वेव से कम्युनिकेट करता है। वह भाव भंगिमा और
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स्पर्श से कम्युनिकेट करता है।वह इंफ्रासोनिक साउंडसे कम्युनिकेट करता है।

रो कर कम्युनिकेट करता है।

हाथी का संदेश समझनेके लिए शांति को समझना,और सिस्मिक वेव को पहचानना जरूरी है।शोरगुल,हंगामे को ही सुनने के आदी लोग अक्सर हाथीको चुप और मजबूर समझ लेतेहैं।

उन्हें हाथी के पैरों तले
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आते देखा गया है।
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इसलिए कहावतों पर मत जाइए। हाथी न चूहे से डरता है, न चींटी से,न शेर से। उसका गुस्सा प्रलयंकारी है। तब वह चिंगाड़ता है, और तमाम जंगल हिल जाता है। गुस्से मे आया हाथी वह आपको दौड़ा सकता है, कोई 25 से 30किमी प्रतिघन्टे की रफ्तार से।

याद रहे,अगर हाथी दौड़ाए तो
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तो ऊँचा न चढ़ें, ढलान की ओर भागें।

ढलान सुरक्षित है, क्योकि हाथी को सेंटर ऑफ ग्रेविटी मेंटेन करने में कठिनाई होगी। मगर ऊपर आप चढ़े, तो हाथी को कम्फर्ट है। और तब भगवान ही आपका मालिक है।

कहने को भगवान भी हाथी के ही करीब है। कभी हजार साल के आर्तनाद के बाद श्री हरि भी हाथी के
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त्राण को आ जाते थे।

मगर शोषण देवताओं ने भी कम नही किया। ऐरावत को समुद्र मंथन इसे निकला रत्न घोषित किया गया, फिर इंद्र ने ही सवारी गांठ ली।

आप भी तो पूजन की शुरआत, नाम के लिए श्रीगणेश से करते हैं। मगर फिर फटाक से लक्ष्मी को प्रसन्न करने वाले मंत्र की ओर स्विच कर जाते हैं।
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स्वर्ग छोड़िए। मृत्युलोक में भी हाथियों के साथ धोखे ही हुए। पालने वाले जिस मालिक को हाथी अपना संरक्षक समझकर प्यार देता है, वक्त आने पर वही मालिक शराब पिलाकर, उसे मदमस्त कर, आंखे फोड़, शत्रुओं पर छोड़ देता है।

दर्द से चीखता हाथी जब कत्लेआम मचाता है, तो मालिक की जीत होती है।
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मामूली दंगा पार्टी हो,या पोरस या हैंनिबाल।वे तक दुश्मनों पर फतह तब तक पातेरहे..

जब तक कि उनके दंगाई अंधे हाथियोंको टेकल करनेका कोई तरीका,दुश्मन ने ईजाद न कर लिया।

हालमें अमेरिकामें गधा छाप बाइडन ने हाथी छाप ट्रम्प को हराया।भारत मे भी गधों ही हाथी पर सवार होकर मैदान लूटलिया,
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साइकल कुचल दी ।

हाथी को बेचकर खाने वाली देवी ने आखरी क़िस्त भी बेच दी है। इसलिए उत्तर के जंगलों में हाथी, अब एंडेन्जर्ड है। एक्स्टिंक्ट होने के कगार पर है।
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पर सच तो यह है कि हाथी किसी देवी देवता की जागीर नही।

क्योकि हाथी हम है, हम भारत के लोग हैं। आदतों से लाचार है।
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जंगल का सबसे ताकतवर जीव, जिसे अंकुश और कोड़ो से नही, गगनभेदी नारों से बेवकूफ बनाकर सवारी गांठी गयी है।

हमे जरा थमना चाहिए। गर्दन पर चढ़े महावत के बरसते अंकुश का दर्द, और पीठ पर बैठी गधा मंडली के नारों को क्षण भर को इग्नोर करना चाहिए।

हाथी को याद करना चाहिए, कि आखरी बार
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भरपेट कब खाया था। कब सुकून से सोया था। कब सूंड से सूंड मिलाकर अपने परिवार और कुनबे के साथ बैठा था।

सोचना चाहिए कि इन नारों के जोश में वह किस युद्ध मे जा रहा है? किससे लड़ने, और क्यों जा रहा है?? वह मरा, तो मर जायेगा।

जीता- तो राज्याभिषेक किसका होगा??
हाथी का..? नहीं न..
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सोचना जरूरी है। रुकना होगा। हां, माना कि हाथी इस वक्त जरा कमजोर है, कैप्टिविटी में है, मजबूर है।

मगर वह हाथी है, गजराज है, जन है, गण है, गणेश है।

वह तो .. ब्रम्हा विष्णु, महेश है।
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@ShuebKh16859893
@budhwardee
@NiranjanTripa16

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