वेदों और पुराणों में देखने को मिल जाते हैं कि जंतुओं ने भी सीधे अपनी योनि से मोक्ष की प्राप्ति की है। महाभारत में पांडवों के महाप्रयाण के समय एक कुत्ते का प्रसंग आता जिसे उन लोगो के साथ ही मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। जो वास्तव में धर्मराज थे।
महाभारत में ही अश्वमेघ यज्ञ के समय एक नेवले का भी प्रसंग आता है। जिसे युधिष्ठिर के अश्वमेघ यज्ञ से अधिक पुण्य एक गरीब के आटे से मिला था और बाद में उसको भी मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। विष्णु पुराण एवं गरुड़ पुराण में एक गज(हाथी) और ग्राह(मगरमछ) की कथा आती है
जिनको प्रभु विष्णु के द्वारा मोक्ष प्रदान किया गया था। वह ग्राह पूर्व जन्म में गन्धर्व और गज एक प्रभु भक्त राजा थे लेकिन कर्मफल के कारण उनका अगला जन्म में पशु योनि में हुआ था।
ऐसे ही एक गज का वृतांत गजानन की कहानी में है जिसके सिर को श्री गणेश जी के सिर के स्थान पर लगा दिया गया था और प्रभु शिव की कृपा से उसको भी मोक्ष की प्राप्ति हुई थी।
महाभारत की कृष्ण लीला में श्रीकृष्ण ने अपनी बाल्यावस्था में खेल-खेल में "यमल" एवं "अर्जुन" नामक दो वृक्षों को उखाड़ दिया था। वो यमलार्जुन दरअसल पूर्व जन्म में असुर थे जिन्को वृक्ष योनि में जन्म लेने का अभिशाप मिला था। अर्थात, कहने का तातपर्य यह है कि जीव किसी भी योनि में,
अपने पुण्य कर्मों और सच्ची भक्ति से वो मोक्ष प्राप्त कर सकता है। एक और सवाल अक्सर व्यक्ति के मन में आता है कि क्या मनुष्य योनि सबसे 8400000 योनियों के इस चक्र में सबसे अंत में मिलती है। तो इसका उत्तर है होगा नहीं, हो सकता है कि किसी को पूर्वजन्मों के पुण्यों की वजह फिरसे
मनुष्य योनि प्राप्त हुई हो किन्तु यह भी हो सकता है कि मनुष्य योनि मिलने पर किये गए पाप कर्मों के कारण अगले जन्म में किसी को अधम योनि प्राप्त हो जाये।
अतः 8400000 योनियों के अस्तित्व पर सवाल करने वाले या उसका मजाक उड़ाने वाले, इस शोध को अवश्य पढ़ें। साथ ही यह भी जाने कि जिस चीज को सिद्ध करने में
आधुनिक/पाश्चात्य विज्ञान को हजारों सालो का वक्त लग गया, उसे हमारे विद्वान ऋषि-मुनियों ने हजारो सालो पूर्व ही सिद्ध कर दिखाया था। जो भारतीय सभ्यता संस्कृति के वैज्ञानिक होने का श्रेष्ठ प्रमाण
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पौराणिक मान्यताओ के अनुसार बैकुंठधाम किसे कहते हैं ?
देखिए वैकुंठ लोक एक ग्रह है जहां इस ब्रह्मांड को नियंत्रित करने वाले भगवान विष्णु निवास करते हैं।
वैकुंठ धाम भक्तों के लिए अंतिम यात्रा पड़ाव है। भक्ति मैं लीन पुण्यात्माओं को वैकुंठ धाम में रहने का अवसर मिलता है।
वैकुंठ लोक मकर राशि की दिशा में सत्यलोक से 2 करोड़ 62 लाख योजन ऊपर स्थित है।
यह वैकुंठ धाम ना तो सूर्य से और ना ही चंद्र से प्रकाशित होता है। इसकी देखभाल करने के लिए भगवान के 96 करोड़ पार्षद तैनात हैं। सभी पार्षद भगवान की तरह ही चतुर्भुज आकार में रहते हैं।
इस परमधाम में प्रवेश करने से पहले जीवात्मा विरजा नदी में स्नान करता है और चतुर्भुज रुप प्राप्त करता है।
इस वैकुंठ धाम में श्रीविष्णु श्रीदेवी, भूदेवी, नीला देवी और महालक्ष्मी के साथ निवास करते हैं।
प्रश्न = किस तरह से चौरासी लाख योनियों के चक्र का शास्त्रों में वर्णन है ?
धर्म शास्त्रों और पुराणों में 84 लाख योनियों का उल्लेख मिलता है और इन योनियों को दो भागों में बाटां गया है। पहला- योनिज और दूसरा आयोनिज।
1- ऐसे जीव जो 2 जीवों के संयोग से उत्पन्न होते हैं वे योनिज कहे जाते हैं। 2- ऐसे जीव जो अपने आप ही अमीबा की तरह विकसित होते हैं उन्हें आयोनिज कहा गया है
3- इसके अतिरिक्त स्थूल रूप से प्राणियों को भी 3 भागों में बांटा गया है-
1- जलचर- जल में रहने वाले सभी प्राणी।
2- थलचर- पृथ्वी पर विचरण करने वाले सभी प्राणी।
3- नभचर- आकाश में विहार करने वाले सभी प्राणी। उक्त 3 प्रमुख प्रकारों के अंतर्गत मुख्य प्रकार होते हैं अर्थात 84 लाख योनियों में प्रारंभ में निम्न 4 वर्गों में बांटा जा सकता है।
एक काल्पनिक कहानी के जरीए समझिए की भगवान कहा इस्तिथ है
एक बार भगवान दुविधा में पड़ गए। कोई भी मनुष्य जब संकट में पड़ता तो भगवान के पास भागा भागा जाता और उन्हें अपनी अपनी समस्याएं बताता। उनसे कुछ न कुछ मांगने लगता।
अंततः उन्होंने इस समस्या के निवारण के लिए देवताओं की बैठक बुलाई।
और बोले........ देवताओं, मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूं, कोई न कोई मनुष्य हर समय मुझसे शिकायत ही करता रहता है। कभी भी संतुष्ट नहीं रहता, जबकि मैं उन्हें समय व कर्म अनुसार सब कुछ दे रहा हूं।
फिर भी थोड़े से कष्ट आते ही वह मेरे पास भागा भागा आ जाता है। जिससे ना तो मैं कहीं शांतिपूर्वक रह सकता हूं, और न ही कुछ कर सकता हूं। आप लोग मुझे कृपया ऐसा स्थान बताएं जहां मनुष्य नाम का प्राणी कदापि न पहुंच सके।
यज्ञ कुंड मुख्यत: आठ प्रकार के होते हैं और सभी का प्रयोजन अलग अलग होता है ।
1. योनिकुंड – यज्ञ के लिए प्रयोग में लाया जाने वाला यह कुंड योनि के आकार का होता है। इस कुण्ड कुछ पान के पत्ते के आकार का बनाया जाता है। इस यज्ञ कुंड का एक सिरा अर्द्धचन्द्राकार होता है तथा दूसरा त्रिकोणाकार होता है।
इस तरह के कुण्ड का प्रयोग सुन्दर, स्वस्थ, तेजस्वी व वीर पुत्र की प्राप्ति हेतु विशेष रूप से किया जाता है।
2. अर्ध चंद्राकार कुंड – इस कुण्ड का आकर अर्द्धचन्द्राकार रूप में होता है इस यज्ञ कुंड का प्रयोग पारिवारिक जीवन से जुड़ी तमाम तरह की समस्याओं के निराकरण के लिए किया जाता है
बैठो, ध्यान नाभि का रखो उठो, ध्यान नाभि का रखो। ये क्यों कहा जाता है ?
देखिए ये ब्राह्मणों ने एक चेतना जागृत करने की विधी बनाई थी जो कुछ इस तरह है । कुछ भी करो, लेकिन तुम्हारी चेतना नाभि के आस-पास घूमती रहे। एक मछली बन जाओ और नाभि के आस-पास घूमते रहो।
और शीघ्र ही तुम पाओगे कि तुम्हारे भीतर एक नई शक्तिशाली चेतना का जन्म हो गया।
इसके अदभुत परिणाम हैं और इसके बहुत प्रयोग हैं। आप यहां एक कुर्सी पर बैठे हुए हैं। ब्राह्मण कहते है कि आपके कुर्सी पर बैठने का ढंग गलत है। इसीलिए आप थक जाते हैं। ब्राह्मण कहते है,
कुर्सी पर मत बैठो। इसका यह मतलब नहीं कि कुर्सी पर मत बैठो, नीचे बैठ जाओ। ब्राह्मण कहते है, कुर्सी पर बैठो, लेकिन कुर्सी पर वजन मत डालो। वजन अपनी नाभि पर डालो।
अभी आप यहीं प्रयोग करके देख सकते हैं। एम्फेसिस का फर्क है।