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जय जय मुंजे, घर घर गूंजे!!

क्या आपने डण्डा, डुगडुगी, हाफ पैंट, काली टोपी की मिलिट्रीनुमा वर्दी में, सड़कों पर परेड करते आम लोगों को देखा हैं। शायद नही। मगर सौ साल पहले इटली में लोगो ने जरूर देखा था। उसे ब्लैक शर्ट्स कहते थे, क्योकि वे काली शर्ट पहनते थे।
भारत मे भी आजादी के दौरान ऐसा एक सन्गठन बना था।
विचित्र सा सवाल है कि भारत की संस्कृति के उत्थान में लाठी-डंडा और मिलिट्री परेड का कॉन्सेप्ट कहाँ से आया? इसका जवाब डाक्टर बीएस मुंजे की 1930 के दशक की इटली यात्रा से मिलता है।

असल मे किसी देश मे अगर कोई क्रांति होती है,
तो उसकी नकल और प्रेरणा कई देशों में ली जाती है। जैसे रूस में हुई क्रांति से देश का पहला जबर वामपन्थी बड़ा प्रभावित था।

"साम्राज्यवाद का नाश हो", "क्रांति अमर रहे" (इंकलाब जिंदाबाद) के नारों के साथ वो फांसी पर झूल गया। अजी वही, जो फांसी की रात लेनिन की जीवनी पढ़ रहा था।
अब भी न पहचाना तो जाने दीजिए।

वैसे भी बात वामपन्थी भगतसिंह पर नही, दक्षिणपन्थी श्री मुंजे पर है।

तो मुंजे साहब का जन्म आज के छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में हुआ, तो आगे की शिक्षा दीक्षा मुंबई में, जहां वो सम्पर्क में आये तिलक के, और मुरीद हो गए।
अगले दस साल उन्ही के सान्निध्य में काम किया।

एक मजेदार फैक्ट है कि कांग्रेस के शुरुआती दौर में वर्चस्व मराठी ब्राह्मणों का था। आपको पता है कि उग्र हिंदुत्व के पैरोकार शुरू से यही लोग रहे हैं। इसी नजरिये की वजह से प्रतिक्रिया में 1906 में मुस्लिम लीग बनी।
तो जब तक गोखले, तिलक का दौर था, मुंजे कांग्रेस में थे। 1915 में गांधी युग की शुरआत में उन्हें मराठी वर्चस्व खत्म होने के लक्षण दिख गए। अहिंसा और धर्मनिरपेक्षता, और लीडरशिप को पूरे देश मे नए लड़कों और बुद्धिजीवियों में बाँटना... गांधी के ये कारनामे मराठी क्लब को नापसन्द था।
1920 आते आते हेडगेवार, मुंजे, मालवीय जैसे लोग नए ठिकाने की तलाश में थे।अब तक सावरकर भी जेल से रिहा हो गए थे। सब पुरोधा आकर महासभा में सँगमित हुए। सावरकर को राजनीतिक गतिविधियों की इजाजत न थी, तो खड़ाऊं रखकर मुंजे अध्य्क्ष हुए।
(1937 में जब सावरकर से बैन हटा, मुंजे ने सावरकर को राजपाट सौंप दिया)

सावरकर की किताब हिंदुत्व, हिन्दुओ को मिलिट्री शिक्षा की बात करती है। अब कोई हार्ड कमांडो ट्रेनिंग तो दी नही जा सकती। मगर लाठी, उछल कूद, परेड, गीत-गुंजन की दी जा सकती है। वही सही..
एक और चीज.. मुसलमान हर जुम्मे को, क्रिश्चियन हर सन्डे मिलकर प्रार्थना करते है। हिन्दुओ का कोई दिन नही, जिस दौरान उनके मजमे में रिलिजियस कम पोलिटीकल ज्ञान फैलाया जा सके। तरीका निकाला गया कि सुबह शाम, हर शहर मोहल्ले में , किसी मैदान या छोटे छोटे केंद्रों में लोगो को सिखाने
और ट्रेंड किया जाए। हथियार, हिंदुत्व और इस्लाम पर चुने हुए विचार पेश किए जाएं।

वैसे यह सच है कि आरएसएस एक सांस्कृतिक संगठन है और उसका राजनीति से उतना ही सम्बन्ध है, जितना मेरी पोस्ट का राजनीति से होता है।

जब ये शाखा मिलन शुरू हुआ, तब देश के शासक अंग्रेज थे।
वो स्मार्ट थे, कुटिल थे.. आंखों के सामने एक अर्धसैनिक जनसंगठन बनते देख कोई प्रतिक्रिया नही की। इसलिए कि हिन्दू मुस्लिम एकता कांग्रेस को मजबूत करती।

कोई और सन्गठन अगर इस एकता में डेंट लगाए, तो उनको फायदेमंद था। वैसे भी इसके सुप्रीम लीडर को मासिक 60 रुपये बांध ही रखे थे।
पनपने दिया।

तो सावरकर के दो प्रमुख साथी थे। वरिष्ठ मुंजे पोलिटिकल विंग याने महासभा को देखते थे। जो चुनाव वगैरह लड़ती। जूनियर हेडगेवार साहब मिलिशिया के नेटवर्क को लीड करते। ये समर्थंक बनाती, विचार फैलाती, और लोकल नेटवर्क को कन्ट्रोल करती।
राजनैतिक धार्मिक विचार के प्रचार की चेन भी बनती, ट्रेंड लठैत भी बनते वैसे चुनिंदा लोगो के लिए शस्त्र भी होते थे, जिनकी विजयादशमी पर शस्त्र पूजा होती। जनता में अपनी धमक बताने को सड़कों पर परेड होती। जाहिर है महासभा की असली ताकत मिलिशिया संगठन था।देश भर में नेटवर्क बनाया जाने लगा।
यह सिस्टम इटली में सफलता से शासन कर रहे मुसोलिनी के सिस्टम पर था। मगर सुनी सुनाई पर कितना काम किया जाये, देखकर ज्यादा सीखा जा सकता है। मुंजे को अध्ययन भ्रमण पर इटली भेजा गया।

वर्ष 1930 में, जब फासिज्म सफलता के चरम पर था, मुंजे इटली गए, वेनिटो मुसोलिनी का दर्शन लाभ लिया।
उनकी और इटली की प्रशंसा की। जाहिर है तब इटली उतना बुरा न था।

क्योकि एंटोनिया माइनो ने अभी जन्म नही लिया था।

खैर..! तो मुंजे साहब ने मुसोलिनी के ब्लैक शर्ट्स ऑर्गनाइजेशन का अध्ययन किया। उनके शैक्षणिक संस्थान, मिलिशिया स्कूल्स का भ्रमण किया। बड़े प्रभावित हुए।
इंटरनेट पर फासिज्म की प्रशंसा में लिखे उनके व्याख्यान अंग्रेजी में उपलब्ध हैं। उन्होंने लिखा -

" आदर्श हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए किसी डिक्टेटरशिप, जैसे कि पुराने वक्त के शिवाजी या आज के हिटलर या मुसोलिनी की तरह ..." उफ, लम्बा है। खुद ही मूल अंग्रेजी में पढिये।
"the point is that this ideal cannot be brought to effect unless we have our own swaraj with a Hindu as a dictator like Shivaji of old or Mussolini or Hitler of the present day in Italy and Germany...But this does not mean that we have to sit with folded hands until some such
dictator arises in India. We should formulate a scientific scheme and carry on propaganda for it".
--
अशोक कुमार पाण्डेय ने अपने क्रेडिबल हिस्ट्री चैनल पर एक शानदार विडियो पोस्ट किया है। विडियो का लिंक पहले कमेंट मे है। लेख यहीं खत्म करता हूँ।
मेरा विषय सिर्फ मुंजे साहब के लेखन, यात्राओं और इतिहास पर है। सौ साल में हर संगठन आधुनिक सोच की ओर अनिवार्यतः बढ़ता है। नए तरीक़े, नई फिलासफी और नए आइडियल्स अपनाता है।
भारत में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बेहद बदल चुका है। अब वह बेहद समावेशी, बेहद शांतिप्रिय, पूर्णतः सांस्कृतिक सन्गठन है। जिसका देश की आजादी में बड़ा योगदान है। ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास है।
मुंजे साहब द्वारा स्थापित कई स्कूलों में से एक, भोसला मिलिट्री स्कूल का नाम मालेगांव ब्लास्ट की चार्जशीट में आया था, जो हेमंत करकरे ने बनाई थी। वही करकरे जिनकी बाद में श्राप से मृत्यु हो गयी थी।
मुंजे सर अमर रहें।
जय जय मुंजे, घर घर गूंजे

#स्वतंत्र Image
खुद ही मूल अंग्रेजी में पढिये।

"the point is that this ideal cannot be brought to effect unless we have our own swaraj with a Hindu as a dictator like Shivaji of old or Mussolini or Hitler of the present day in Italy and Germany...But this does not mean that we have to sit
with folded hands until some such dictator arises in India. We should formulate a scientific scheme and carry on propaganda for it".
--
अशोक कुमार पाण्डेय ने अपने क्रेडिबल हिस्ट्री चैनल पर एक शानदार विडियो पोस्ट किया है। विडियो का लिंक पहले कमेंट मे है। लेख यहीं खत्म करता हूँ।

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Jun 21
गोलचा सिनेमा पर पांच आना क्लास की टिकट हासिल करने का तरीका था कि दर्शक वहां पर साइकलपर पहुंचता और बुकिंग आफिस की जगह सीधा सिनेमा के साइकल स्टैण्ड पर पहुंचता और साइकल के बदले में पांच आना क्लास का टिकट हासिल करता । यानी साइकल स्टैण्ड के कान्ट्रेक्टर का हर शो की पांच आना
क्लास की टिकट कर एक कोटा निर्धारित था जिस का इस्तेमाल वो अपना धन्धा चमकाने के लिये करता था ।

रिट्ज़ पर ब्लैक छुप कर नहीं होती थी, शरेआम होती थी । सिनेमा के ऐन बाहर ही मुट्ठी में टिकटें और नोट सम्भाले ब्लैकिया खड़ा होता था और खुल्ली ब्लैक करता था ।
वहां सब से ज्यादा डिमांड बाक्स की टिकट की होती थी क्योंकि रिट्ज़ राजधानी के दुर्लभ सिनेमाओं में था जिन में कि बॉक्स थे । करीब ही दिल्ली यूनीवर्सिटी होने की वजह से नून और मौटिनी शो में विद्यार्थीगण उमड़ के पड़ते थे और तनहाई तलाशते सब को बॉक्स की टिकट दरकार होती थी ।
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Jun 21
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टोपी में गिरा दिये। फिर उसने उस बोर्ड को पलट कर कुछ शब्द लिखे और वहां से चला गया। उसने बोर्ड को पलट दिया था जिससे कि लोग वह पढ़ें जो उसने लिखा था।

जल्द ही टोपी को भरनी शुरू हो गई। अधिक से अधिक लोग अब उस अंधे लड़के को पैसे दे रहे थे। दोपहर को बोर्ड बदलने वाला आदमी फिर वहां आया।
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Jun 21
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Jun 21
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Jun 21
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कितना जानते हो , हमे ? हमारी संस्कृति को , भाषा को , रवायत को , हमारे इतिहास को ? नहीं जानते , लेकिन हम सब जानते हैं , भगत सिंह , गाँधी , नेहरू सब को । ( ये भाव बिनी जी के हैं और भाषा हमारी थोड़ी बदली है । ) लगा कि सार्वजनिक जगह पर बेइज्जत हो रहा हूँ ।
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