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Jun 24, 2024 19 tweets 14 min read Read on X
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भगवान शिव के 19 अवतार तथा उनका विवरण 🧵

1. पिप्पलाद अवतार

मानव जीवन में भगवान शिव के पिप्पलाद अवतार का बड़ा महत्व है। शनि पीड़ा का निवारण पिप्पलाद की कृपा से ही संभव हो सका। कथा है कि पिप्पलाद ने देवताओं से पूछा- क्या कारण है कि मेरे पिता दधीचि जन्म से पूर्व ही मुझे छोड़कर चले गए? देवताओं ने बताया शनिग्रह की दृष्टि के कारण ही ऐसा कुयोग बना। पिप्पलाद यह सुनकर बड़े क्रोधित हुए। उन्होंने शनि को नक्षत्र मंडल से गिरने का श्राप दे दिया। शाप के प्रभाव से शनि उसी समय आकाश से गिरने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर पिप्पलाद ने शनि को इस बात पर क्षमा किया कि शनि जन्म से लेकर 16 साल तक की आयु तक किसी को कष्ट नहीं देंगे। तभी से पिप्पलाद का स्मरण करने मात्र से शनि की पीड़ा दूर हो जाती है। शिव महापुराण के अनुसार स्वयं ब्रह्मा ने ही शिव के इस अवतार का नामकरण किया था। अर्थात ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर सुवर्चा के पुत्र का नाम पिप्पलाद रखा।

पिप्पलादेति तन्नाम चक्रे ब्रह्मा प्रसन्नधीः।
- शिवपुराण शतरुद्रसंहिता 24/61Image
2. नंदी अवतार

भगवान शंकर का नंदीश्वर अवतार सभी जीवों से प्रेम का संदेश देता है। नंदी (बैल) कर्म का प्रतीक है, जिसका अर्थ है कर्म ही जीवन का मूल मंत्र है। इस अवतार की कथा इस प्रकार है- शिलाद मुनि ब्रह्मचारी थे। वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने शिलाद से संतान उत्पन्न करने को कहा। शिलाद ने अयोनिज और मृत्युहीन संतान की कामना से भगवान शिव की तपस्या की। तब भगवान शंकर ने स्वयं शिलाद के यहां पुत्र रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। कुछ समय बाद भूमि जोतते समय शिलाद को भूमि से उत्पन्न एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। भगवान शंकर ने नंदी को अपना गणाध्यक्ष बनाया। इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए। मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ।Image
3. वीरभद्र अवतार

यह अवतार तब हुआ था, जब दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में माता सती ने अपनी देह का त्याग किया था। जब भगवान शिव को यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने क्रोध में अपने सिर से एक जटा उखाड़ी और उसे रोषपूर्वक पर्वत के ऊपर पटक दिया। उस जटा के पूर्वभाग से महाभंयकर वीरभद्र प्रकट हुए। शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है-

क्रुद्धः सुदष्ठोष्ठापुटः स धूर्जटिर्जटां तडिद्वह्नि।सटोग्ररोचिषम्।

उत्कृत्य रुद्रः सहसोत्थितो हसन् गम्भीरनादो विससर्ज तां भुवि ॥

ततोऽतिकायस्तनुवा स्पृशन्दिवं।Image
4. भैरव अवतार

शिव महापुराण में भैरव को परमात्मा शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है। एक बार भगवान शंकर की माया से प्रभावित होकर ब्रह्मा व विष्णु स्वयं को श्रेष्ठ मानने लगे। तब वहां तेज-पुंज के मध्य एक पुरुषाकृति दिखलाई पड़ी। उन्हें देखकर ब्रह्माजी ने कहा- चंद्रशेखर तुम मेरे पुत्र हो। अतः मेरी शरण में आओ। ब्रह्मा की ऐसी बात सुनकर भगवान शंकर को क्रोध आ गया। उन्होंने उस पुरुषाकृति से कहा- काल की भांति शोभित होने के कारण आप साक्षात कालराज हैं। भीषण होने से भैरव हैं। भगवान शंकर से इन वरों को प्राप्त कर कालभैरव ने अपनी अंगुली के नाखून से ब्रह्मा के पांचवें सिर को काट दिया। ब्रह्मा का पांचवां सिर काटने के कारण भैरव ब्रह्महत्या के पाप से दोषी हो गए। तब काशी में भैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिल गई। काशीवासियों के लिए भैरव की भक्ति अनिवार्य बताई गई है।Image
5. अश्वत्थामा

महाभारत के अनुसार पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा काल, क्रोध, यम व भगवान शंकर के अंशावतार हैं। आचार्य द्रोण ने भगवान शंकर को पुत्र रूप में पाने की लिए घोर तपस्या की थी और भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया था कि वे उनके पुत्र के रूप मे अवतीर्ण होंगे। समय आने पर सवन्तिक रुद्र ने अपने अंश से द्रोण के बलशाली पुत्र अश्वत्थामा के रूप में अवतार लिया। ऐसी मान्यता है कि अश्वत्थामा अमर हैं तथा वह आज भी धरती पर ही निवास करते हैं। इस विषय में एक श्लोक प्रचलित है-

अश्वत्थामा बलिव्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविनः॥ सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्। जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।

अर्थ- अश्वत्थामा, राजा बलि, व्यासजी, हनुमानजी, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम व ऋषि मार्कण्डेय ये आठों अमर हैं। शिवमहापुराण (शतरुद्रसंहिता-37) के अनुसार अश्वत्थामा आज भी जीवित हैं और वे गंगा के किनारे निवास करते हैं। वैसे, उनका निवास कहां हैं, यह नहीं बताया गया है।Image
6. शरभावतार

शरभावतार में भगवान शंकर का स्वरूप आधा मृग (हिरण) तथा शेष शरभ पक्षी (आख्यानिकाओं में वर्णित आठ पैरों वाला जंतु जो शेर से भी शक्तिशाली था) का था। इस अवतार में भगवान शंकर ने नृसिंह भगवान की क्रोधाग्नि को शांत किया था। लिंगपुराण में शिव के शरभावतार की कथा है, उसके अनुसार हिरण्यकश्पू का वध करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंहावतार लिया था। हिरण्यकश्यपू के वध के पश्चात भी जब भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ तो देवता शिवजी के पास पहुंचे। तब भगवान शिव शरभ के रूप में भगवान नृसिंह के पास पहुंचे तथा उनकी स्तुति की, लेकिन नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत नहीं हुई तो शरभ रूपी भगवान शिव अपनी पूंछ में नृसिंह को लपेटकर ले उड़े। तब भगवान नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत हुई। उन्होंने शरभावतार से क्षमा याचना कर अति विनम्र भाव से उनकी स्तुति की।Image
7. गृहपति अवतार

भगवान शंकर जी कि इस कथा में - नर्मदा के तट पर धर्मपुर नाम का एक नगर था। वहां विश्वानर नाम के एक मुनि तथा उनकी पत्नी शुचिष्मती रहती थीं। शुचिष्मती ने बहुत काल तक निःसंतान रहने पर एक दिन अपने पति से शिव के समान पुत्र प्राप्ति की इच्छा की। पत्नी की अभिलाषा पूरी करने के लिए मुनि काशी आ गए। यहां उन्होंने घोर तप द्वारा भगवान शिव के वीरेश लिंग की आराधना की। एक दिन मुनि को वीरेश लिंग के मध्य एक बालक दिखाई दिया। मुनि ने बालरूपधारी शिव की पूजा की। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने शुचिष्मति के गर्भ से अवतार लेने का वरदान दिया। कालांतर में शुचिष्मती गर्भवती हुई और भगवान शंकर शुचिष्मती के गर्भ से पुत्ररूप में प्रकट हुए। कहते हैं पितामह ब्रह्म ने ही उस बालक का नाम गृहपति रखा था।Image
8. ऋषि दुर्वासा

भगवान शंकर के विभिन्न अवतारों में ऋषि दुर्वासा का अवतार भी प्रमुख है। धर्म ग्रंथों के अनुसार सती अनुसूइया के पति महर्षि अत्रि ने ब्रह्मा के निर्देशानुसार पत्नी सहित ऋक्षकुल पर्वत पर पुत्रकामना से घोर तप किया। उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों उनके आश्रम पर आए। उन्होंने कहा- हमारे अंश से तुम्हारे तीन पुत्र होंगे, जो त्रिलोक में विख्यात तथा माता-पिता का यश बढ़ाने वाले होंगे। समय आने पर ब्रह्माजी के अंश से चंद्रमा हुए, जो देवताओं द्वारा समुद्र में फेंके जाने पर उससे प्रकट हुए। विष्णु के अंश से श्रेष्ठ संन्यास पद्धति को प्रचलित करने वाले दत्त उत्पन्न हुए और रुद्र के अंश से मुनिवर दुर्वासा ने जन्म लिया। शास्त्रों में इसका उल्लेख है-

अत्रेः पत्न्यनसूया त्रीञ्जज्ञे सुयशसः सुतान्।
दत्तं दुर्वाससं सोममात्मेशब्रह्मासम्भवान्।।

अर्थ- अत्रि की पत्नी अनुसूइया से दत्तात्रेय, दुर्वासा और चंद्रमा नाम के तीन परम यशस्वी पुत्र हुए। ये क्रमशः भगवान विष्णु, शंकर और ब्रह्मा के अंश से उत्पन्न हुए थे।Image
9. हनुमान

इस अवतार में भगवान शंकर ने एक वानर का रूप धरा था। शिवमहापुराण के अनुसार देवताओं और दानवों को अमृत बांटते हुए विष्णुजी के मोहिनी रूप को देखकर लीलावश शिवजी ने कामातुर होकर वीर्यपात कर दिया। सप्तऋषियों ने उस वीर्य को कुछ पत्तों में संग्रहीत कर लिया। समय आने पर सप्तऋषियों ने भगवान शिव के वीर्य को वानरराज केसरी की पत्नी अंजनी के कान के माध्यम से गर्भ में स्थापित कर दिया, जिससे अत्यंत तेजस्वी एवं प्रबल पराक्रमी श्री हनुमानजी उत्पन्न हुए।Image
10. वृषभ अवतार

इस अवतार में भगवान शंकर ने विष्णु पुत्रों का संहार किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार जब भगवान विष्णु दैत्यों को मारने पाताल लोक गए तो उन्हें वहां बहुत सी चंद्रमुखी स्त्रियां दिखाई पड़ी। विष्णु जी ने उनके साथ रमण करके बहुत से पुत्र उत्पन्न किए, जिन्होंने पाताल से पृथ्वी तक बड़ा उपद्रव किया। उनसे घबराकर ब्रह्माजी ऋषिमुनियों को लेकर शिवजी के पास गए और रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगे। तब भगवान शंकर ने वृषभ रूप धारण कर विष्णु पुत्रों का संहार किया।Image
11. यतिनाथ अवतार

इस अवतार में अतिथि बनकर भील दम्पत्ति की परीक्षा ली थी। भील दम्पत्ति को अपने प्राण गंवाने पड़े। धर्म ग्रंथों के अनुसार अर्बुदाचल पर्वत के समीप शिवभक्त आहुक-आहुका भील दम्पत्ति रहते थे। एक बार भगवान शंकर यतिनाथ के वेष में उनके घर आए। उन्होंने भील दम्पत्ति के घर रात व्यतीत करने की इच्छा प्रकट की। आहुका ने अपने पति को गृहस्थ की मर्यादा का स्मरण कराते हुए स्वयं धनुषबाण लेकर बाहर रात बिताने और यति को घर में विश्राम करने देने का प्रस्ताव रखा। इस तरह आहुक धनुषबाण लेकर बाहर चला गया। प्रातःकाल आहुका और यति ने देखा कि वन्य प्राणियों ने आहुक को मार डाला है। इस पर यतिनाथ बहुत दुःखी हुए। तब आहुका ने उन्हें शांत करते हुए कहा कि आप शोक न करें। अतिथि सेवा में प्राण विसर्जन धर्म है और उसका पालन कर हम धन्य हुए हैं। जब आहुका अपने पति की चिताग्नि में जलने लगी तो शिवजी ने उसे दर्शन देकर अगले जन्म में पुनः अपने पति से मिलने का वरदान दिया।Image
12. कृष्णदर्शन अवतार

भगवान शिव ने इस अवतार में यज्ञ आदि धार्मिक कार्यों के महत्व को बताया है। यह अवतार पूर्णतः धर्म का प्रतीक है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इक्ष्वाकुवंशीय श्राद्धदेव की नवमी पीढ़ी में राजा नभग का जन्म हुआ। विद्या-अध्ययन को गुरुकुल गए। जब बहुत दिनों तक न लौटे तो उनके भाइयों ने राज्य का विभाजन आपस में कर लिया। नभग को जब यह बात ज्ञात हुई तो वह अपने पिता के पास गया। पिता ने नभग से कहा कि वह यज्ञ परायण ब्राह्मणों के मोह को दूर करते हुए उनके यज्ञ को सम्पन्न करके उनके धन को प्राप्त करे।

तब नभग ने यज्ञभूमि में पहुंचकर वैश्य देव सूक्त के स्पष्ट उच्चारण द्वारा यज्ञ संपन्न कराया। अंगारिक ब्राह्मण यज्ञ अवशिष्ट धन नभग को देकर स्वर्ग को चले गए। उसी समय शिवजी कृष्णदर्शन रूप में प्रकट होकर बोले कि यज्ञ के अवशिष्ट धन पर तो उनका अधिकार है। विवाद होने पर कृष्णदर्शन रूपधारी शिवजी ने उसे अपने पिता से ही निर्णय कराने को कहा। नभग के पूछने पर श्राद्धदेव ने कहा-वह पुरुष शंकर भगवान हैं। यज्ञ में अवशिष्ट वस्तु उन्हीं की है। पिता की बातों को मानकर नभग ने शिवजी की स्तुति की।Image
13. अवधूत अवतार

भगवान शंकर ने अवधूत अवतार लेकर इंद्र के अंहकार को चूर किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार एक समय बृहस्पति और अन्य देवताओं को साथ लेकर इंद्र शंकर जी के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पर गए। इंद्र की परीक्षा लेने के लिए शंकरजी ने अवधूत रूप धारण कर उसका मार्ग रोक लिया। इंद्र ने उस पुरुष से अवज्ञापूर्वक बार-बार उसका परिचय पूछा तो भी वह मौन रहा।

इस पर क्रुद्ध होकर इंद्र ने ज्यों ही अवधूत पर प्रहार करने के लिए वज्र छोडना चाहा त्यों ही उसका हाथ स्तंभित हो गया। यह देखकर बृहस्पति ने शिवजी को पहचान कर अवधूत की बहुविधि स्तुति की। इससे प्रसन्न होकर शिवजी ने इंद्र को क्षमा कर दिया।Image
14. भिक्षुवर्य अवतार

भगवान शंकर जन्म लेने वाले हर प्राणी के जीवन के रक्षक भी ही हैं। भगवान शंकर का भिक्षुवर्य अवतार यही संदेश देता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार विदर्भ नरेश सत्यरथ को शत्रुओं ने मार डाला। उसकी गर्भवती पत्नी ने शत्रुओं से छिपकर अपने प्राण बचाए। समय पर उसने एक पुत्र को जन्म दिया। रानी जब जल पीने के लिए सरोवर गई तो उसे घडियाल ने अपना आहार बना लिया। तब वह बालक भूख- प्यास से तड़पने लगा। इतने में ही शिवजी की प्रेरणा से एक भिखारिन वहां पहुंची। तब शिवजी ने भिक्षुक का रूप धर उस भिखारिन को बालक का परिचय दिया और उसके पालन-पोषण का निर्देश दिया तथा यह भी कहा कि यह बालक विदर्भ नरेश सत्यरथ का पुत्र है। यह सब कह कर भिक्षुक रूपधारी शिव ने उस भिखारिन को अपना वास्तविक रूप दिखाया। शिव के आदेश अनुसार भिखारिन ने उसे बालक का पालन पोषण किया। बड़ा होकर उस बालक ने शिवजी की कृपा से अपने दुश्मनों को हराकर पुनः अपना राज्य प्राप्त किया।Image
15. सुरेश्वर अवतार

भगवान शंकर का सुरेश्वर (इंद्र) अवतार भक्त के प्रति उनकी प्रेमभावना को प्रदर्शित करता है। इस अवतार में भगवान शंकर ने एक छोटे से बालक उपमन्यु की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे अपनी परम भक्ति और अमर पद का वरदान दिया। धर्म ग्रंथों के अनुसार व्याघ्रपाद का पुत्र उपमन्यु अपने मामा के घर पलता था। वह सदा दूध की इच्छा से व्याकुल रहता था। उसकी मां ने उसे अपनी अभिलाषा पूर्ण करने के लिए शिवजी की शरण में जाने को कहा। इस पर उपमन्यु वन में जाकर ऊँ नमः शिवाय का जाप करने लगा। शिवजी ने सुरेश्वर (इंद्र) का रूप धारण कर उसे दर्शन दिया और शिवजी की अनेक प्रकार से निंदा करने लगा। इस पर उपमन्यु क्रोधित होकर इंद्र को मारने के लिए खड़ा हुआ। उपमन्यु को अपने में दृढ़ शक्ति और अटल विश्वास देखकर शिवजी ने उसे अपने वास्तविक रूप के दर्शन कराए तथा क्षीरसागर के समान एक अनश्वर सागर उसे प्रदान किया। उसकी प्रार्थना पर कृपालु शिवजी ने उसे परम भक्ति का पद भी दिया।Image
16. किरात अवतार

किरात अवतार में भगवान शंकर ने पाण्डुपुत्र अर्जुन की वीरता की परीक्षा ली थी। महाभारत के अनुसार कौरवों ने छल-कपट से पाण्डवों का राज्य हड़प लिया व पाण्डवों को वनवास पर जाना पड़ा। वनवास के दौरान जब अर्जुन भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए तपस्या कर रहे थे, तभी दुर्योधन द्वारा भेजा हुआ मूड़ नामक दैत्य अर्जुन को मारने के लिए शूकर (सुअर) का रूप धारण कर वहां पहुंचा। अर्जुन ने शूकर पर अपने बाण से प्रहार किया। उसी समय भगवान शंकर ने भी किरात वेष धारण कर उसी शूकर पर बाण चलाया। शिव की माया के कारण अर्जुन उन्हें पहचान न पाया और शूकर का वध उसके बाण से हुआ है, यह कहने लगा। इस पर दोनों में विवाद हो गया। अर्जुन ने किरात वेषधारी शिव से युद्ध किया। अर्जुन की वीरता देख भगवान शिव प्रसन्न हो गए और अपने वास्तविक स्वरूप में आकर अर्जुन को कौरवों पर विजय का आशीर्वाद दिया।Image
17. सुनटनर्तक अवतार

पार्वती के पिता हिमाचल से उनकी पुत्री का हाथ मागंने के लिए शिवजी ने सुनटनर्तक वेष धारण किया था। हाथ में डमरू लेकर जब शिवजी हिमाचल के घर पहुंचे तो नृत्य करने लगे। नटराज शिवजी ने इतना सुंदर और मनोहर नृत्य किया कि सभी प्रसन्न हो गए।

जब हिमाचल ने नटराज को भिक्षा मांगने को कहा तो नटराज शिव ने भिक्षा में पार्वती को मांग लिया। इस पर हिमाचलराज अति क्रोधित हुए। कुछ देर बाद नटराज वेषधारी शिवजी पार्वती को अपना रूप दिखाकर स्वयं चले गए। उनके जाने पर मैना और हिमाचल को दिव्य ज्ञान हुआ और उन्होंने पार्वती को शिवजी को देने का निश्चय किया।Image
18. ब्रह्मचारी अवतार

दक्ष के यज्ञ में प्राण त्यागने के बाद जब सती ने हिमालय के घर जन्म लिया तो शिवजी को पति रूप में पाने के लिए घोर तप किया। पार्वती की परीक्षा लेने के लिए शिवजी ब्रह्मचारी का वेष धारण कर उनके पास पहुंचे। पार्वती ने ब्रह्मचारी को देख उनकी विधिवत पूजा की।

जब ब्रह्मचारी ने पार्वती से उसके तप का उद्देश्य पूछा और जानने पर शिव की निंदा करने लगे तथा उन्हें श्मशानवासी व कापालिक भी कहा। यह सुन पार्वती को बहुत क्रोध हुआ। पार्वती की भक्ति व प्रेम को देखकर शिव ने उन्हें अपना वास्तविक स्वरूप दिखाया। यह देख पार्वती अति प्रसन्न हुई।Image
19. यक्ष अवतार

यक्ष अवतार शिवजी ने देवताओं के अनुचित और मिथ्या अभिमान को दूर करने के लिए धारण किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार देवताओं व असुरों द्वारा किए गए समुद्रमंथन के दौरान जब भयंकर विष निकला तो भगवान शंकर ने उस विष को ग्रहण कर अपने कंठ में रोक लिया। इसके बाद अमृत कलश निकला। अमृतपान करने से सभी देवता अमर तो हो गए, साथ ही उन्हें अभिमान भी हो गया कि वे सबसे बलशाली हैं।

देवताओं के इसी अभिमान को तोड़ने के लिए शिवजी ने यक्ष का रूप धारण किया व देवताओं के आगे एक तिनका रखकर उसे काटने को कहा। अपनी पूरी शक्ति लगाने पर भी देवता उस तिनके को काट नहीं पाए। तभी आकाशवाणी हुई कि यह यक्ष सब गर्गों के विनाशक शंकर भगवान हैं। सभी देवताओं ने भगवान शंकर की स्तुति की तथा अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी ।Image

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May 2
The 31 ta tantric texts of Maa Tara . Image
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Apr 24
थ्रेड

मौत के अंतिम 5 सेकंड का रहस्य | उदान वायु की प्रचंड उड़ान

हॉस्पिटल में जब मॉनिटर की हार्टबीट लाइन सीधी हो जाती है, डॉक्टर कहते हैं- “आई एम सॉरी, ही इज डेड।”
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असली यात्रा दिल रुकने के ठीक बाद शुरू होती है।

मृत्यु कोई अचानक स्विच ऑफ नहीं। ये पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) का क्रमिक विलय है।
जन्म में सूक्ष्म से स्थूल की यात्रा, मौत में स्थूल से सूक्ष्म की उल्टी यात्रा।
पहले पृथ्वी तत्व पिघलता है- शरीर भारी लगता है, पैर ठंडे पड़ जाते हैं, जैसे हजार बिच्छू डंक मार रहे हों (गरुड़ पुराण)।
फिर जल तत्व- भयंकर प्यास, गला सूखना, होंठ फटना।
अग्नि तत्व- शरीर ठंडा, आंखों की रोशनी धुंधली, यमदूतों के साए या फ्रैक्टल आकृतियां दिखना।
वायु और आकाश बचे रहते हैं। बाहर से शांत, अंदर भयानक युद्ध चल रहा होता है।
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Apr 24
हठयोग का सबसे गुप्त रहस्य , वज्रोली और सहजोली मुद्रा

क्या आप जानते हैं कि प्राचीन ऋषियों ने एक ऐसी विद्या बताई थी जिससे वीर्य/रजस का पतन रोककर उसे ओजस में बदल दिया जाता है? इससे बुढ़ापा रुकता है, दिमाग तेज होता है और सिद्धियां खुलती हैं।

हठयोग प्रदीपिका में स्वात्माराम जी कहते हैं – वज्रोली सिद्ध करने वाला काल से भी अजेय हो जाता है!

ये कोई साधारण किगल एक्सरसाइज नहीं, बल्कि प्राण-ऊर्जा का अलकेमी है।Image
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वज्रोली क्या है?

“वज्र” का मतलब कठोर, अभेद्य, इंद्र का वज्र।
हमारे शरीर में वज्र नाड़ी जननांगों से मस्तिष्क तक जुड़ी है। वज्रोली मुद्रा में पुरुष अपनी मूत्र मार्ग और जननांग मांसपेशियों को पूरी तरह कंट्रोल करके अपान वायु को ऊपर खींचता है।

नतीजा? वीर्य (बिंदु) नीचे गिरने की बजाय ऊपर उठकर ओजस बनता है।

हठयोग प्रदीपिका 3.82: “यो विजानाति स योगी सिद्धि भाजनम्” – इसे जान लेने वाला सिद्धि का पात्र बन जाता है।
सहजोली – स्त्री का शक्तिशाली रूप 🌸
सहजोली वज्रोली का स्त्री स्वरूप है। “सहज” यानी स्वाभाविक।

योगिनी गर्भाशय, योनि मार्ग और मूल बंध के संकुचन से रजस को ऊर्ध्वगामी करती है। उड्डीयान बंध के साथ करने से वैक्यूम बनता है जो ऊर्जा को सहजता से ऊपर ले जाता है।

ये शिव-शक्ति का संतुलन है। दोनों साथ में पूर्ण होते हैं।
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Apr 19
कही भोजन करते समय आप भी य गलती रोज़ कर रहे है ? इसलिए आपका शरीर में बीमारी का आगमन हुआ ?

आप सुन कर स्तंभ रह जाएँगे आज

आपके पेट में साक्षात् ईश्वर बैठे है !

वैश्वानर विद्या छांदोग्य उपनिषद की अमर शिक्षा Image
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कल्पना कीजिए प्राचीन मंदिर के गर्भगृह में आप खड़े हैं चारों ओर सन्नाटा बीच में पवित्र अग्नि प्रज्वलित है घी और अन्न की आहुति डाल रहे हैं यह यज्ञ है अब आंखें खोलिए आप डाइनिंग टेबल पर बैठे हैं फोन हाथ में तनाव दिमाग में जल्दी खाना मुंह में डाल रहे हैं इन दोनों दृश्यों में कोई अंतर नहीं आपका पेट ही हवन कुंड है जिसे पाचन तंत्र समझते हैं वह साक्षात ईश्वर है
छांदोग्य उपनिषद में वैश्वानर विद्या छिपी है यह बताती है भोजन कोई शारीरिक मजबूरी नहीं बल्कि ब्रह्मांड का सबसे बड़ा आध्यात्मिक कृत्य है हम खाना खाते नहीं अपने भीतर बैठे भूखे देवता को आहुति देते हैं आज भागदौड़ में हम इस सत्य को भूल गए खाना कैलोरी या स्वाद बन गया तनाव क्रोध या स्क्रीन के साथ खाते हैं मंदिर में कचरा फेंकने जैसा अपमान हैImage
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Apr 18
जो बोलोगे सब सच होगा

हमारे प्राचीन ऋषि जिन शब्दों को उच्चारित करते थे वे तुरंत फल देते थे। इसका राज था वाक शुद्धि। आज हम उसी प्राचीन भारतीय विज्ञान को समझते हैं जो शब्दों को सृष्टि का मजबूत आदेश बना सकता है।

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ऋग्वेद के वाक सूक्त में देवी वाक स्वयं कहती हैं कि वे ब्रह्मांड को धारण करती हैं। मांडूक्य उपनिषद में ओमकार को ब्रह्मांड का आधार बताया गया है। विज्ञान भैरव तंत्र में शिव पार्वती को बताते हैं कि शुद्ध वाक से शब्द पत्थर की लकीर बन जाते हैं।

वाक शुद्धि में जीभ को तालु से स्पर्श करने की प्रक्रिया खेचरी मुद्रा से प्रेरित है। प्राचीन ग्रंथों में इसे 72000 नाड़ियों को संरेखित करने और पीनियल ग्लैंड को सक्रिय करने वाला बताया गया है। आधुनिक विज्ञान भी जीभ की स्थिति के प्रभावों का अध्ययन कर रहा है।
वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि जीभ को तालु (roof of the mouth) पर रखने से पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम सक्रिय होता है। इससे हृदय गति और तनाव कम होता है। कुछ शोध vagus nerve के माध्यम से रिलैक्सेशन बढ़ने का संकेत देते हैं।

एक अध्ययन में tongue position पर mandibular muscle activity और heart rate variability का परीक्षण किया गया। तालु पर जीभ रखने से शरीर में रिलैक्सेशन संबंधी बदलाव देखे गए। इससे न्यूरोप्लास्टिसिटी प्रभावित हो सकती है जो आदतों और सोच को बदलने में मदद करती है।
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Apr 17
कुंभक प्राणायाम … हिमालयी योगियों की प्राचीन विद्या जो उम्र को उलट सकती है वेद पुराणों का गुप्त रहस्य

कुंभक कोई जिम की कसरत नहीं है।

क्या आपने कभी सोचा है कि हिमालय के योगी सौ साल की उम्र में भी युवाओं जैसी असीम ऊर्जा चेहरे की चमक और शरीर का लचीलापन कैसे बनाए रखते हैं। क्या सचमुच संभव है कि साठ साल की उम्र में भी पच्चीस साल के जवान जैसा जीवंत और स्वस्थ दिखा जा सके।Image
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आज हम उसी प्राचीन महाविद्या कुंभक प्राणायाम की गहराइयों में उतर रहे हैं जो समय के पहिए को उलटने की शक्ति रखती है।

उम्र बढ़ना सिर्फ कोशिकाओं का क्षरण नहीं बल्कि मन और प्राण की गति का परिणाम है। जब हमारी सांस तेज और उथली होती है तो शरीर लगातार तनाव की स्थिति में रहता है। प्रकृति का सरल नियम देखिए कुत्ता एक मिनट में बीस तीस सांस लेता है और उसकी उम्र दस पंद्रह साल होती है जबकि कछुआ तीन चार सांस लेता है और दो सौ तीन सौ साल तक स्वस्थ रहता है। हमारे ऋषियों ने हजारों साल पहले यही समझ लिया था कि ईश्वर ने हमें सांसों की एक निश्चित संख्या दी है।
श्वेताश्वतार उपनिषद हठयोग प्रदीपिका और योग वासिष्ठ में स्पष्ट लिखा है कि श्वास चलती है तो मन चंचल होता है और जब कुंभक से श्वास स्थिर हो जाती है तो मन भी शांत हो जाता है। जब मन और प्राण दोनों ठहर जाते हैं तो शरीर के अंदर ऊर्जा का अनावश्यक खर्च रुक जाता है और कोशिकाओं का टूटना यानी बुढ़ापा वहीं थम जाता है। यह कोई कथा नहीं बल्कि ब्रह्मांडीय सत्य है जिसे आज का विज्ञान ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस कम होने और सेलुलर रिपेयर के रूप में देख रहा है।Image
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