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Jun 24 19 tweets 14 min read Read on X
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भगवान शिव के 19 अवतार तथा उनका विवरण 🧵

1. पिप्पलाद अवतार

मानव जीवन में भगवान शिव के पिप्पलाद अवतार का बड़ा महत्व है। शनि पीड़ा का निवारण पिप्पलाद की कृपा से ही संभव हो सका। कथा है कि पिप्पलाद ने देवताओं से पूछा- क्या कारण है कि मेरे पिता दधीचि जन्म से पूर्व ही मुझे छोड़कर चले गए? देवताओं ने बताया शनिग्रह की दृष्टि के कारण ही ऐसा कुयोग बना। पिप्पलाद यह सुनकर बड़े क्रोधित हुए। उन्होंने शनि को नक्षत्र मंडल से गिरने का श्राप दे दिया। शाप के प्रभाव से शनि उसी समय आकाश से गिरने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर पिप्पलाद ने शनि को इस बात पर क्षमा किया कि शनि जन्म से लेकर 16 साल तक की आयु तक किसी को कष्ट नहीं देंगे। तभी से पिप्पलाद का स्मरण करने मात्र से शनि की पीड़ा दूर हो जाती है। शिव महापुराण के अनुसार स्वयं ब्रह्मा ने ही शिव के इस अवतार का नामकरण किया था। अर्थात ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर सुवर्चा के पुत्र का नाम पिप्पलाद रखा।

पिप्पलादेति तन्नाम चक्रे ब्रह्मा प्रसन्नधीः।
- शिवपुराण शतरुद्रसंहिता 24/61Image
2. नंदी अवतार

भगवान शंकर का नंदीश्वर अवतार सभी जीवों से प्रेम का संदेश देता है। नंदी (बैल) कर्म का प्रतीक है, जिसका अर्थ है कर्म ही जीवन का मूल मंत्र है। इस अवतार की कथा इस प्रकार है- शिलाद मुनि ब्रह्मचारी थे। वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने शिलाद से संतान उत्पन्न करने को कहा। शिलाद ने अयोनिज और मृत्युहीन संतान की कामना से भगवान शिव की तपस्या की। तब भगवान शंकर ने स्वयं शिलाद के यहां पुत्र रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। कुछ समय बाद भूमि जोतते समय शिलाद को भूमि से उत्पन्न एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। भगवान शंकर ने नंदी को अपना गणाध्यक्ष बनाया। इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए। मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ।Image
3. वीरभद्र अवतार

यह अवतार तब हुआ था, जब दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में माता सती ने अपनी देह का त्याग किया था। जब भगवान शिव को यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने क्रोध में अपने सिर से एक जटा उखाड़ी और उसे रोषपूर्वक पर्वत के ऊपर पटक दिया। उस जटा के पूर्वभाग से महाभंयकर वीरभद्र प्रकट हुए। शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है-

क्रुद्धः सुदष्ठोष्ठापुटः स धूर्जटिर्जटां तडिद्वह्नि।सटोग्ररोचिषम्।

उत्कृत्य रुद्रः सहसोत्थितो हसन् गम्भीरनादो विससर्ज तां भुवि ॥

ततोऽतिकायस्तनुवा स्पृशन्दिवं।Image
4. भैरव अवतार

शिव महापुराण में भैरव को परमात्मा शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है। एक बार भगवान शंकर की माया से प्रभावित होकर ब्रह्मा व विष्णु स्वयं को श्रेष्ठ मानने लगे। तब वहां तेज-पुंज के मध्य एक पुरुषाकृति दिखलाई पड़ी। उन्हें देखकर ब्रह्माजी ने कहा- चंद्रशेखर तुम मेरे पुत्र हो। अतः मेरी शरण में आओ। ब्रह्मा की ऐसी बात सुनकर भगवान शंकर को क्रोध आ गया। उन्होंने उस पुरुषाकृति से कहा- काल की भांति शोभित होने के कारण आप साक्षात कालराज हैं। भीषण होने से भैरव हैं। भगवान शंकर से इन वरों को प्राप्त कर कालभैरव ने अपनी अंगुली के नाखून से ब्रह्मा के पांचवें सिर को काट दिया। ब्रह्मा का पांचवां सिर काटने के कारण भैरव ब्रह्महत्या के पाप से दोषी हो गए। तब काशी में भैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिल गई। काशीवासियों के लिए भैरव की भक्ति अनिवार्य बताई गई है।Image
5. अश्वत्थामा

महाभारत के अनुसार पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा काल, क्रोध, यम व भगवान शंकर के अंशावतार हैं। आचार्य द्रोण ने भगवान शंकर को पुत्र रूप में पाने की लिए घोर तपस्या की थी और भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया था कि वे उनके पुत्र के रूप मे अवतीर्ण होंगे। समय आने पर सवन्तिक रुद्र ने अपने अंश से द्रोण के बलशाली पुत्र अश्वत्थामा के रूप में अवतार लिया। ऐसी मान्यता है कि अश्वत्थामा अमर हैं तथा वह आज भी धरती पर ही निवास करते हैं। इस विषय में एक श्लोक प्रचलित है-

अश्वत्थामा बलिव्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविनः॥ सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्। जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।

अर्थ- अश्वत्थामा, राजा बलि, व्यासजी, हनुमानजी, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम व ऋषि मार्कण्डेय ये आठों अमर हैं। शिवमहापुराण (शतरुद्रसंहिता-37) के अनुसार अश्वत्थामा आज भी जीवित हैं और वे गंगा के किनारे निवास करते हैं। वैसे, उनका निवास कहां हैं, यह नहीं बताया गया है।Image
6. शरभावतार

शरभावतार में भगवान शंकर का स्वरूप आधा मृग (हिरण) तथा शेष शरभ पक्षी (आख्यानिकाओं में वर्णित आठ पैरों वाला जंतु जो शेर से भी शक्तिशाली था) का था। इस अवतार में भगवान शंकर ने नृसिंह भगवान की क्रोधाग्नि को शांत किया था। लिंगपुराण में शिव के शरभावतार की कथा है, उसके अनुसार हिरण्यकश्पू का वध करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंहावतार लिया था। हिरण्यकश्यपू के वध के पश्चात भी जब भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ तो देवता शिवजी के पास पहुंचे। तब भगवान शिव शरभ के रूप में भगवान नृसिंह के पास पहुंचे तथा उनकी स्तुति की, लेकिन नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत नहीं हुई तो शरभ रूपी भगवान शिव अपनी पूंछ में नृसिंह को लपेटकर ले उड़े। तब भगवान नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत हुई। उन्होंने शरभावतार से क्षमा याचना कर अति विनम्र भाव से उनकी स्तुति की।Image
7. गृहपति अवतार

भगवान शंकर जी कि इस कथा में - नर्मदा के तट पर धर्मपुर नाम का एक नगर था। वहां विश्वानर नाम के एक मुनि तथा उनकी पत्नी शुचिष्मती रहती थीं। शुचिष्मती ने बहुत काल तक निःसंतान रहने पर एक दिन अपने पति से शिव के समान पुत्र प्राप्ति की इच्छा की। पत्नी की अभिलाषा पूरी करने के लिए मुनि काशी आ गए। यहां उन्होंने घोर तप द्वारा भगवान शिव के वीरेश लिंग की आराधना की। एक दिन मुनि को वीरेश लिंग के मध्य एक बालक दिखाई दिया। मुनि ने बालरूपधारी शिव की पूजा की। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने शुचिष्मति के गर्भ से अवतार लेने का वरदान दिया। कालांतर में शुचिष्मती गर्भवती हुई और भगवान शंकर शुचिष्मती के गर्भ से पुत्ररूप में प्रकट हुए। कहते हैं पितामह ब्रह्म ने ही उस बालक का नाम गृहपति रखा था।Image
8. ऋषि दुर्वासा

भगवान शंकर के विभिन्न अवतारों में ऋषि दुर्वासा का अवतार भी प्रमुख है। धर्म ग्रंथों के अनुसार सती अनुसूइया के पति महर्षि अत्रि ने ब्रह्मा के निर्देशानुसार पत्नी सहित ऋक्षकुल पर्वत पर पुत्रकामना से घोर तप किया। उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों उनके आश्रम पर आए। उन्होंने कहा- हमारे अंश से तुम्हारे तीन पुत्र होंगे, जो त्रिलोक में विख्यात तथा माता-पिता का यश बढ़ाने वाले होंगे। समय आने पर ब्रह्माजी के अंश से चंद्रमा हुए, जो देवताओं द्वारा समुद्र में फेंके जाने पर उससे प्रकट हुए। विष्णु के अंश से श्रेष्ठ संन्यास पद्धति को प्रचलित करने वाले दत्त उत्पन्न हुए और रुद्र के अंश से मुनिवर दुर्वासा ने जन्म लिया। शास्त्रों में इसका उल्लेख है-

अत्रेः पत्न्यनसूया त्रीञ्जज्ञे सुयशसः सुतान्।
दत्तं दुर्वाससं सोममात्मेशब्रह्मासम्भवान्।।

अर्थ- अत्रि की पत्नी अनुसूइया से दत्तात्रेय, दुर्वासा और चंद्रमा नाम के तीन परम यशस्वी पुत्र हुए। ये क्रमशः भगवान विष्णु, शंकर और ब्रह्मा के अंश से उत्पन्न हुए थे।Image
9. हनुमान

इस अवतार में भगवान शंकर ने एक वानर का रूप धरा था। शिवमहापुराण के अनुसार देवताओं और दानवों को अमृत बांटते हुए विष्णुजी के मोहिनी रूप को देखकर लीलावश शिवजी ने कामातुर होकर वीर्यपात कर दिया। सप्तऋषियों ने उस वीर्य को कुछ पत्तों में संग्रहीत कर लिया। समय आने पर सप्तऋषियों ने भगवान शिव के वीर्य को वानरराज केसरी की पत्नी अंजनी के कान के माध्यम से गर्भ में स्थापित कर दिया, जिससे अत्यंत तेजस्वी एवं प्रबल पराक्रमी श्री हनुमानजी उत्पन्न हुए।Image
10. वृषभ अवतार

इस अवतार में भगवान शंकर ने विष्णु पुत्रों का संहार किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार जब भगवान विष्णु दैत्यों को मारने पाताल लोक गए तो उन्हें वहां बहुत सी चंद्रमुखी स्त्रियां दिखाई पड़ी। विष्णु जी ने उनके साथ रमण करके बहुत से पुत्र उत्पन्न किए, जिन्होंने पाताल से पृथ्वी तक बड़ा उपद्रव किया। उनसे घबराकर ब्रह्माजी ऋषिमुनियों को लेकर शिवजी के पास गए और रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगे। तब भगवान शंकर ने वृषभ रूप धारण कर विष्णु पुत्रों का संहार किया।Image
11. यतिनाथ अवतार

इस अवतार में अतिथि बनकर भील दम्पत्ति की परीक्षा ली थी। भील दम्पत्ति को अपने प्राण गंवाने पड़े। धर्म ग्रंथों के अनुसार अर्बुदाचल पर्वत के समीप शिवभक्त आहुक-आहुका भील दम्पत्ति रहते थे। एक बार भगवान शंकर यतिनाथ के वेष में उनके घर आए। उन्होंने भील दम्पत्ति के घर रात व्यतीत करने की इच्छा प्रकट की। आहुका ने अपने पति को गृहस्थ की मर्यादा का स्मरण कराते हुए स्वयं धनुषबाण लेकर बाहर रात बिताने और यति को घर में विश्राम करने देने का प्रस्ताव रखा। इस तरह आहुक धनुषबाण लेकर बाहर चला गया। प्रातःकाल आहुका और यति ने देखा कि वन्य प्राणियों ने आहुक को मार डाला है। इस पर यतिनाथ बहुत दुःखी हुए। तब आहुका ने उन्हें शांत करते हुए कहा कि आप शोक न करें। अतिथि सेवा में प्राण विसर्जन धर्म है और उसका पालन कर हम धन्य हुए हैं। जब आहुका अपने पति की चिताग्नि में जलने लगी तो शिवजी ने उसे दर्शन देकर अगले जन्म में पुनः अपने पति से मिलने का वरदान दिया।Image
12. कृष्णदर्शन अवतार

भगवान शिव ने इस अवतार में यज्ञ आदि धार्मिक कार्यों के महत्व को बताया है। यह अवतार पूर्णतः धर्म का प्रतीक है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इक्ष्वाकुवंशीय श्राद्धदेव की नवमी पीढ़ी में राजा नभग का जन्म हुआ। विद्या-अध्ययन को गुरुकुल गए। जब बहुत दिनों तक न लौटे तो उनके भाइयों ने राज्य का विभाजन आपस में कर लिया। नभग को जब यह बात ज्ञात हुई तो वह अपने पिता के पास गया। पिता ने नभग से कहा कि वह यज्ञ परायण ब्राह्मणों के मोह को दूर करते हुए उनके यज्ञ को सम्पन्न करके उनके धन को प्राप्त करे।

तब नभग ने यज्ञभूमि में पहुंचकर वैश्य देव सूक्त के स्पष्ट उच्चारण द्वारा यज्ञ संपन्न कराया। अंगारिक ब्राह्मण यज्ञ अवशिष्ट धन नभग को देकर स्वर्ग को चले गए। उसी समय शिवजी कृष्णदर्शन रूप में प्रकट होकर बोले कि यज्ञ के अवशिष्ट धन पर तो उनका अधिकार है। विवाद होने पर कृष्णदर्शन रूपधारी शिवजी ने उसे अपने पिता से ही निर्णय कराने को कहा। नभग के पूछने पर श्राद्धदेव ने कहा-वह पुरुष शंकर भगवान हैं। यज्ञ में अवशिष्ट वस्तु उन्हीं की है। पिता की बातों को मानकर नभग ने शिवजी की स्तुति की।Image
13. अवधूत अवतार

भगवान शंकर ने अवधूत अवतार लेकर इंद्र के अंहकार को चूर किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार एक समय बृहस्पति और अन्य देवताओं को साथ लेकर इंद्र शंकर जी के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पर गए। इंद्र की परीक्षा लेने के लिए शंकरजी ने अवधूत रूप धारण कर उसका मार्ग रोक लिया। इंद्र ने उस पुरुष से अवज्ञापूर्वक बार-बार उसका परिचय पूछा तो भी वह मौन रहा।

इस पर क्रुद्ध होकर इंद्र ने ज्यों ही अवधूत पर प्रहार करने के लिए वज्र छोडना चाहा त्यों ही उसका हाथ स्तंभित हो गया। यह देखकर बृहस्पति ने शिवजी को पहचान कर अवधूत की बहुविधि स्तुति की। इससे प्रसन्न होकर शिवजी ने इंद्र को क्षमा कर दिया।Image
14. भिक्षुवर्य अवतार

भगवान शंकर जन्म लेने वाले हर प्राणी के जीवन के रक्षक भी ही हैं। भगवान शंकर का भिक्षुवर्य अवतार यही संदेश देता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार विदर्भ नरेश सत्यरथ को शत्रुओं ने मार डाला। उसकी गर्भवती पत्नी ने शत्रुओं से छिपकर अपने प्राण बचाए। समय पर उसने एक पुत्र को जन्म दिया। रानी जब जल पीने के लिए सरोवर गई तो उसे घडियाल ने अपना आहार बना लिया। तब वह बालक भूख- प्यास से तड़पने लगा। इतने में ही शिवजी की प्रेरणा से एक भिखारिन वहां पहुंची। तब शिवजी ने भिक्षुक का रूप धर उस भिखारिन को बालक का परिचय दिया और उसके पालन-पोषण का निर्देश दिया तथा यह भी कहा कि यह बालक विदर्भ नरेश सत्यरथ का पुत्र है। यह सब कह कर भिक्षुक रूपधारी शिव ने उस भिखारिन को अपना वास्तविक रूप दिखाया। शिव के आदेश अनुसार भिखारिन ने उसे बालक का पालन पोषण किया। बड़ा होकर उस बालक ने शिवजी की कृपा से अपने दुश्मनों को हराकर पुनः अपना राज्य प्राप्त किया।Image
15. सुरेश्वर अवतार

भगवान शंकर का सुरेश्वर (इंद्र) अवतार भक्त के प्रति उनकी प्रेमभावना को प्रदर्शित करता है। इस अवतार में भगवान शंकर ने एक छोटे से बालक उपमन्यु की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे अपनी परम भक्ति और अमर पद का वरदान दिया। धर्म ग्रंथों के अनुसार व्याघ्रपाद का पुत्र उपमन्यु अपने मामा के घर पलता था। वह सदा दूध की इच्छा से व्याकुल रहता था। उसकी मां ने उसे अपनी अभिलाषा पूर्ण करने के लिए शिवजी की शरण में जाने को कहा। इस पर उपमन्यु वन में जाकर ऊँ नमः शिवाय का जाप करने लगा। शिवजी ने सुरेश्वर (इंद्र) का रूप धारण कर उसे दर्शन दिया और शिवजी की अनेक प्रकार से निंदा करने लगा। इस पर उपमन्यु क्रोधित होकर इंद्र को मारने के लिए खड़ा हुआ। उपमन्यु को अपने में दृढ़ शक्ति और अटल विश्वास देखकर शिवजी ने उसे अपने वास्तविक रूप के दर्शन कराए तथा क्षीरसागर के समान एक अनश्वर सागर उसे प्रदान किया। उसकी प्रार्थना पर कृपालु शिवजी ने उसे परम भक्ति का पद भी दिया।Image
16. किरात अवतार

किरात अवतार में भगवान शंकर ने पाण्डुपुत्र अर्जुन की वीरता की परीक्षा ली थी। महाभारत के अनुसार कौरवों ने छल-कपट से पाण्डवों का राज्य हड़प लिया व पाण्डवों को वनवास पर जाना पड़ा। वनवास के दौरान जब अर्जुन भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए तपस्या कर रहे थे, तभी दुर्योधन द्वारा भेजा हुआ मूड़ नामक दैत्य अर्जुन को मारने के लिए शूकर (सुअर) का रूप धारण कर वहां पहुंचा। अर्जुन ने शूकर पर अपने बाण से प्रहार किया। उसी समय भगवान शंकर ने भी किरात वेष धारण कर उसी शूकर पर बाण चलाया। शिव की माया के कारण अर्जुन उन्हें पहचान न पाया और शूकर का वध उसके बाण से हुआ है, यह कहने लगा। इस पर दोनों में विवाद हो गया। अर्जुन ने किरात वेषधारी शिव से युद्ध किया। अर्जुन की वीरता देख भगवान शिव प्रसन्न हो गए और अपने वास्तविक स्वरूप में आकर अर्जुन को कौरवों पर विजय का आशीर्वाद दिया।Image
17. सुनटनर्तक अवतार

पार्वती के पिता हिमाचल से उनकी पुत्री का हाथ मागंने के लिए शिवजी ने सुनटनर्तक वेष धारण किया था। हाथ में डमरू लेकर जब शिवजी हिमाचल के घर पहुंचे तो नृत्य करने लगे। नटराज शिवजी ने इतना सुंदर और मनोहर नृत्य किया कि सभी प्रसन्न हो गए।

जब हिमाचल ने नटराज को भिक्षा मांगने को कहा तो नटराज शिव ने भिक्षा में पार्वती को मांग लिया। इस पर हिमाचलराज अति क्रोधित हुए। कुछ देर बाद नटराज वेषधारी शिवजी पार्वती को अपना रूप दिखाकर स्वयं चले गए। उनके जाने पर मैना और हिमाचल को दिव्य ज्ञान हुआ और उन्होंने पार्वती को शिवजी को देने का निश्चय किया।Image
18. ब्रह्मचारी अवतार

दक्ष के यज्ञ में प्राण त्यागने के बाद जब सती ने हिमालय के घर जन्म लिया तो शिवजी को पति रूप में पाने के लिए घोर तप किया। पार्वती की परीक्षा लेने के लिए शिवजी ब्रह्मचारी का वेष धारण कर उनके पास पहुंचे। पार्वती ने ब्रह्मचारी को देख उनकी विधिवत पूजा की।

जब ब्रह्मचारी ने पार्वती से उसके तप का उद्देश्य पूछा और जानने पर शिव की निंदा करने लगे तथा उन्हें श्मशानवासी व कापालिक भी कहा। यह सुन पार्वती को बहुत क्रोध हुआ। पार्वती की भक्ति व प्रेम को देखकर शिव ने उन्हें अपना वास्तविक स्वरूप दिखाया। यह देख पार्वती अति प्रसन्न हुई।Image
19. यक्ष अवतार

यक्ष अवतार शिवजी ने देवताओं के अनुचित और मिथ्या अभिमान को दूर करने के लिए धारण किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार देवताओं व असुरों द्वारा किए गए समुद्रमंथन के दौरान जब भयंकर विष निकला तो भगवान शंकर ने उस विष को ग्रहण कर अपने कंठ में रोक लिया। इसके बाद अमृत कलश निकला। अमृतपान करने से सभी देवता अमर तो हो गए, साथ ही उन्हें अभिमान भी हो गया कि वे सबसे बलशाली हैं।

देवताओं के इसी अभिमान को तोड़ने के लिए शिवजी ने यक्ष का रूप धारण किया व देवताओं के आगे एक तिनका रखकर उसे काटने को कहा। अपनी पूरी शक्ति लगाने पर भी देवता उस तिनके को काट नहीं पाए। तभी आकाशवाणी हुई कि यह यक्ष सब गर्गों के विनाशक शंकर भगवान हैं। सभी देवताओं ने भगवान शंकर की स्तुति की तथा अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी ।Image

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Jun 25
कलावा (रक्षासूत्र/मौली) #Thread

🔹कलावा किस हाथ में बांधना चाहिए?
🔹कलावा कितनी बार लपेटना चाहिए?
🔹कलावा किस दिन खोलना चाहिए ?
🔹कलावा बांधने के फायदे तथा महत्व
🔹पुराना कलावा कहा रखे ?
🔹ज्योतिष विज्ञान तथा कलावा
🔹कलावा तथा आयुर्वेद 🧵(1/9)

(कृपया थ्रेड को अंत तक पढ़े) Image
रक्षा सूत्र (कलावा)

कलावा को रक्षा सूत्र भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में कलावा अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। हिन्दू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कर्म यानी पूजा-पाठ, उद्घाटन, यज्ञ, हवन, संस्कार आदि के पूर्व पुरोहितों द्वारा यजमान के दाएं हाथ में मौली बांधी जाती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जीवन में आने वाले संकट और परेशानियों से छुटकारा पाने के लिए कलावा या रक्षा सूत्र बांधा जाता है, कलावा बांधने से व्यक्ति पर त्रिदेवों और तीन महादेवियों की कृपा होती है, तीन देवियों मां लक्ष्मी, मां सरस्वती तथा महाकाली से धन सम्पति, विद्या-बुद्धि और शक्ति मिलती है।
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🔹कलावा किस हाथ में बांधना चाहिए?

कलावा किस हाथ में बांधे इस बारे में भी नियम है, जो कि पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग हैं. पुरुषों और कुंवारी कन्याओं को दाहिने हाथ में और विवाहित महिलाओं को हमेशा बाएं हाथ में कलावा बांधने चाहिए।

(3/n) Image
Read 9 tweets
Jun 22
बिना पैसे खर्च किए घर के समस्त वास्तुदोष दूर करने के उपाय #Thread

वैदिक ज्योतिष शास्त्र में वास्तुदोष तथा वास्तु संबंधी नियमों का विशेष महत्व होता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में यदि वास्तु संबंधी कोई भी दोष होता है तो इसका नकारात्मक प्रभाव व्यक्ति के जीवन पर जरूर पड़ता है, उस घर में सुख और शांति का हमेशा अभाव बना रहता है।

🧵घर के वास्तुदोष को दूर करने के उपाय👇Image
🔹 वास्तु शास्त्र में स्वास्तिक का विशेष महत्व है। घर के मुख्य द्वार पर स्वास्तिक का चिन्ह रखने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और वास्तु दोष कम होता है तथा मंगल ग्रह के दोष भी समाप्त होते हैं। Image
🔹वास्तु शास्त्र के अनुसार घर को साफ सुथरा और रोशनी से भरपूर होना बहुत आवश्यक है, यदि घर में पॉजिटिव एनर्जी चाहते हैं तो घर के वायव्य कोण पर दीपक जलाकर रखें। Image
Read 17 tweets
Jun 16
हिरोशिमा/नागासाकी पर अमेरिका द्वारा परमाणु बम से हमला #Thread (1/6)

🔹द्वितीय विश्व युद्ध में जापान का आत्मसमर्पण करने से इनकार

🔹6 अगस्त 1945 को परमाणु बम ने हिरोशिमा को किया तबाह

🔹9 अगस्त 1945 को परमाणु बम ने नागासाकी को किया तबाह

🔹आज का हिरोशिमा कैसा है?

🔹आज के नागासाकी की तस्वीर कैसी है?Image
🔹दूसरे विश्वयुद्ध का लंबा चलना तथा जापान का आत्मसमर्पण करने से मना करना (2/6)

दुनिया के इतिहास में पहली बार परमाणु बमों का इस्तेमाल दूसरे विश्वयुद्ध में हुआ था जब अमेरिका ने जापान के दो शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर 6 और 9 अगस्त 1945 को परमाणु बम से हमला किया था, दूसरे विश्वयुद्ध में इटली और जर्मनी की पराजय के बाद भी जापान ने आत्मसमर्पण नहीं किया, तो इस कारण अमेरिकी नेतृत्व इस निर्णय पर पहुंचा कि जापान से संघर्ष को लंबा नहीं खींचना चाहिए और इसका परिणाम हुआ परमाणु बम के प्रयोग का निर्णय!Image
🔹6 अगस्त 1945 को परमाणु बम लिटिल बॉय (code name) ने हिरोशिमा को किया तबाह (3/6)

6 अगस्त 1945 को सुबह के करीब आठ बजे हिरोशिमा पर परमाणु बम का जोरदार हमला हुआ. अमेरिका ने हिरोशिमा पर जिस बम को गिराया था उसका नाम लिटिल बॉय (Little Boy)रखा गया था, विस्फोट के बाद आग का गोला बना जिससे तापमान लगभग 5,000 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया, बम धमाकों में इतनी गर्मी थी कि लोग सीधे जल गए. एक मिनट के भीतर हिरोशिमा शहर का 80 फीसदी हिस्सा राख हो गया. इसके बाद बम गिरने की जगह के 29 किलोमीटर क्षेत्र में काली बारिश हुई. जिसमें रेडियोएक्टिव विकिरण मौजूद थे, जिससे मौतें बढ़ीं और इस काली बारिश ने अपने संपर्क में आने वाली सभी चीजों को भी दूषित कर दिया. अमेरिका के इस हमले में हिरोशिमा के लगभग 140000 लोग मारे गये ।Image
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Jun 14
आपकी पूजा थाली में बना स्वस्तिक एक विज्ञान है ,कैसे

Thread 🧵

स्वस्ति न इन्द्र वृद्धश्रवाः, स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः स्वस्तिनस्तावृष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु
(यजुर्वेद सं. 25/16)

यह मंत्र इतना प्रसिद्ध है आपने कई बार कि तिलक आदि करते समय आशीर्वाद के रूप में विद्वान इसी का प्रयोग करते हैं।

इस मंत्र का शाब्दिक अर्थ है-महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे विश्व के ज्ञान स्वरूप पूषा देव हमारा कल्याण करें जिसके हथियार अरिष्ट भंग करने में समर्थ हैं ऐसे गरुड़ देव हमारी रक्षा करें। बृहस्पति भी हमारे कल्याण की पुष्टि करें।Image
स्वस्तिक का अर्थ है भाग्य

स्वस्तिक शब्द 'अस' धातु से पहले लगे 'सु' उपसर्ग से बना है। 'सु' का अर्थ है अच्छा, कल्याण करने वाला, सर्वोत्तम, शुभ, 'अस' का अर्थ है होना, अस्तित्वस्वस्तिक का अर्थ है कल्याण का होना, मंगल्य का अस्तित्व। जहां भी श्री, सौंदर्य, पुरुषत्व, प्रेम, आनंद, जीवन की सुंदरता और व्यवहार का सामंजस्य, सुख, भाग्य और समृद्धि है, वहां स्वस्तिक की भावना है। स्वस्तिक की भावना विश्व विकास की भावना है। स्वस्तिक चिन्ह मानव जाति के विकास हेतु प्राचीन धार्मिक सौभाग्य का प्रतीक है।

'समाप्ति कामः मंगलं आचरेत्'

पातंजलि योग शास्त्रानुसार कोई भी कार्य निर्विघ्न संपूर्ण समाप्त हो जायेImage
स्वस्तिक 'विष्णु' व 'श्री' का प्रतीक चिह्न है-
स्वस्तिक की चार भुजाएं भगवान

विष्णु भगवान के चार हाथ हैं। भगवान विष्णु ही स्वस्तिक आकृति में चार भुजाओं से चारों दिशाओं का पालन करते हैं। स्वस्तिक मध्य जो बिन्दु है वह भगवान विष्णु का नाभिकमल-ब्रह्मा का स्थान है। इस भावात्मक प्रतीक से सृष्टि की रचना का प्रतिबिम्ब मिलता है।

स्वस्तिक श्री का प्रतीक है। यह श्री विष्णु एवं धन की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी का प्रतीकात्मक चिह्न है। स्वस्तिक लक्ष्मी-उपासना, श्रीकामना हेतु बनाया जाता है।Image
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Jun 12
ज्योतिषशास्त्र के अचूक उपाय

Thread 🧵

1. धन प्राप्ति के उपाय

• नमक को कभी भी खुले बरतन में न रखें।

• प्रतिदिन पीपल की जड़ में जल डालें।

• जब भी आप अपनी बहन या बुआ को घर पर आमन्त्रित करें तो उसे खाली हाथ न भेजे।

• जब भी आप घर के फर्श साफ करें तो उस पानी में थोड़ा सा नमक मिला ले।Image
धन के ठहराव के लिए उपाय

• जब भी आप नोटों की गिनती करें तो कभी भी अँगूली पर थूक लगाकर गिनती न करें।

• कभी भी सुर्यास्त उपरान्त घर में झाडू न लगाये।

• बुधवार को किसी को भी पैसे उधार न दें।

• हमेशा अपने से बड़े व्यक्तियों और बुजुर्गो का सम्मान करें। Image
शीघ्र विवाह हेतु उपाय

• जब भी आप स्नान करें तो उस पानी में थोड़ा सा हल्दी पाउडर मिला लें।

• देवगुरु बृहस्पति का पूजन करें।

• जब कभी भी अपने माता-पिता आपके लिए वर देखने जाये उस दिन लाल वस्त्र पहने

• पीले मीठे चावल बना कर दान करे Image
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Jun 11
किसी भी मंत्र को सिद्ध करने के लिए योगियों के नियम करेंगे मंत्र कार्य करता है

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मन्त्र-साधना में उपयोगी ज्ञान

मन्त्र-साधना करने से पूर्व उससे सम्बन्धित अनेक बातों की जानकारी आवश्यक है। इसके विधि-विधान और उपयोगी विचारों का ज्ञान न होने से जब भी उस सम्बन्ध में कुछ जानने को मिलता है तो मानसिक चिन्ता होती है और जो किया जाता है उसमें सफलता भी नहीं मिल पाती। अतः प्रमुख रूप से जानने योग्य कुछ बातों का विचार यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।

प्रातःकृत्य

साधना के लिये यह अत्यावश्यक है कि वह अपने जीवन की समस्त क्रियाओं को नियमित बनाये। नियमितता मानव जीवन की एक अपूर्व साधना है जिसके सहारे प्रत्येक कार्य में सफलता ही मिलती है। प्राचीन आचार्यों ने इसी बात को ध्यान में रखकर निम्नलिखित निर्देश दिये हैं-

सूर्योदय से प्रायः दो घण्टे पहले ब्राह्ममुहूर्त होता है। उस समय सोते रहना दरिद्रता को बुलाने के समान है। अतः ब्राह्ममुहूर्त में उठ- कर अपने दोनों हाथों को देखें तथा-

कराग्रे वसते लक्ष्मी; करमध्ये सरस्वती।

करमूले स्थितो ब्रह्मा, प्रभाते करदर्शनम् ॥

हाथों के अगले भाग में लक्ष्मी, मध्य भाग में सरस्वती और मूल में ब्रह्माजी स्थित हैं। अतः सवेरे उठते ही हाथों का दर्शन करें।Image
इसके पश्चात् नीचे लिखो प्रार्थना करके पृथ्वी पर पैर रखें-

समुद्रवसने देवि ! पर्वतस्तनमण्डले ।
विष्णुपत्नि ! नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्व मे ।।

"हे विष्णुपत्नि ! हे समुद्ररूपी वस्त्रों को धारण करने वालो ! तथा पर्वतरूप स्तनों से युक्त पृथ्वोदेवो! तुम्हें नमस्कार है। मेरे पैरों के नोचे स्पर्श को क्षमा करो ।"

पश्चात् मुंह धोकर कुल्ला करके प्रातः स्मरण करें जिसमें गणेश, लक्ष्मी, सूर्य, तुलसी, गौ, गुरु, माता-पिता और वृद्धजनों को प्रणाम करें ।

तदनन्तर शुद्ध हो देंतुअन करें और नदी, तालाब, कुआँ, बावड़ी अथवा घर पर ही शुद्ध जल से स्नान करें। स्नान के जल में पुष्कर आदि तीर्थों का आवाहन नोचे लिखे पद्य से करना चाहिए-

पुष्कराद्यानि तीर्थानि गंगाद्याः सरितस्तथा ।
आगच्छन्तु पवित्राणि स्नानकाले सदा मम ।।

और भावना करें कि यह जल सभो तोर्यों के जल के समान पवित्र है।

वस्त्र - स्नान के अनन्तर धुले हुए वस्त्र पहनें। मुख्य रूप से पूजा जपादि के समय दो वस्त्र अधोवस्त्र धोती ओर ऊर्ध्ववस्त्र दुपट्टा पहनने की शास्त्रों में आज्ञा है। सूती हो तथा शुद्ध हो नया वस्त्र हो तो उसे एक बार धोकर हो पहनना चाहिए ।

विशेष कार्य के लिए अनुष्ठान के अवसर पर विशेष रंगीन वस्त्र पहनने का भी आदेश है। जैसे श्वेत वस्त्र सदा उत्तम कर्मों के लिए ग्राह्य हैं। पीताम्बर आदि आकर्षण और लाल रंग का वस्त्र देवी की उपासना में उतम माने गये हैं। ठण्ड के दिनों में ऊनी स्वेटर आदि भी पहनते हैं तथा कई व्यक्ति पाजामा या पेंट पहनकर ही जप करना चाहते हैं, किन्तु यह ठीक नहींImage
शुद्ध वस्त्र पहनकर जप के लिए निश्चित स्थान पर जाएँ ।

जय का स्थान -

पूजा-जन आदि के लिए एकान्त, पवित्र और शुद्ध वायु वाला स्थान चुनना चाहिए। जहाँ कोलाहल अधिक होता हो, स्थान का संकोच हो, आस-पास में दुर्गन्धपूर्ण वस्तुएँ हों ऐसे स्थान पर मन में स्थिरता नहीं रहती । अतः इस ओर सावधानी रखनी चाहिए ।

दिशा-
आसन पर बैठने से पूर्व हो उचित दिशा का चुनाव भी आवश्यक है। मन तथा इन्द्रियों को प्रसन्न और स्थिर रखने के लिये पूर्व दिशा को ओर मुख करके बैठाना उत्तम माना गया है। शिव- पुराण में कहा गया है कि "पूर्व दिशा की ओर मुंह करके जप करने से वशीकरण, दक्षिण में अभिचार मारण आदि, पश्चिम में स्तंभन और उत्तर में शान्ति प्राप्त होती है।वैसे साधक और देवता के बीच में पूर्व दिशा की स्थिति मानी गई है। सूर्य, अग्नि, ब्राह्मण, देवता तथा श्रेष्ठ पुरुषों को उपस्थिति में उनकी ओर पीठ करके बैठना उचित नहीं है।

विशेष प्रयोग के समय दिशाओं में परिवर्तन होता है, किन्तु सामान्यतः पूर्व और उत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करना श्रेष्ठकर है।

आसन-विचार

आसन को दो भागों में विभक्त होता है।

१. देह की स्थिति और हम जिस पर बैठकर जपादि कर्म करते हैं वह साधना के समय हमारा शरीर बिना किसी कष्ट के सुख- पूर्वक अपना सहयोगी बना रहे और हमारे कार्य में किसी प्रकार को विकलता-बेचैनी का अनुभव न हो। इसके लिए योगशास्त्र में कहा गया है कि- 'स्थिरसुखमासनम् ।' आसन वही उत्तम है जिसमें स्थिर सुख हो। इसके लिए स्वस्तिकासन, पद्मासन, वीरासन ओर सिद्धासन आदि प्रसिद्ध हैं। सबसे सरल स्वस्तिकासन है, जो पालथी मारकर बैठने का नाम है। इससे आगे के आसनों पर अधिक समय तक बैठने का अभ्यास करना पड़ता है। इसी को हम आसन- सिद्धि कह सकते हैं।

देह का आधार जिस पर हम बैठते हैं वह भी सुखकर होना चाहिये । थोड़े-थोड़े समय में मन में उद्वेग करने वाला आसन जप में बाधक बनता है। यह आसन लकड़ी के सुन्दर, सुहाने पटिये पर फैलाकर बैठा जा सकता है अथवा जमीन पर ही बिछा लें। इसके लिये कुश (दर्भ), कम्बल, मृग-चर्म, व्याघ्र-चर्म आदि का आसन बनाया जा सकता है। शास्त्रों में वस्त्र का आसन निषिद्ध माना गया है-

वस्त्रासने तु दारिद्र्यं पाषाणे व्याधिपीडनम् ।

इसी प्रकार बिना आसन के पत्थर पर बैठना भी रोगकारक माना गया है। अधिक गम्भीरतापूर्वक विचार क रें तो आसन के रंग, आकार आदि का विचार भी शास्त्रों में निदिष्ट है। देवी की उपासना में लाल रंग, शिव की उपासना में श्वेत तथा मारण विद्वेषण आदि के लिये काले रंग का आसन उत्तम माना गया है।

प्राचमन - जिस प्रकार स्नान से शरीर के बाहरी अंगों की शुद्धि होती है उसी प्रकार मन्त्रपूर्वक प्राचमन करने से अन्तःकरण की शुद्धि होती है। अतः दैवी कार्यारम्भ से पहले आचमन करने का विधान है।

ॐ केशवाय नमः स्वाहा। ॐ नारायणाय नमः स्वाहा ।

ॐ माधवाय नमः स्वाहा ।

इन तीन मन्त्रों से तीन बार आचमन करें और बाद में ॐ गोविन्दाय नमः बोलकर हाथ धो डालें ।

पवित्रीकरण - बायें हाथ में जल लेकर कुशा से मस्तक पर जल छिड़कते हुये नीचे लिखा मन्त्र बोलें -

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा । यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥

फिर नीचे लिखे मन्त्र से आसान पर जल छिड़कर दायें हाथ से उसका स्पर्श करें ।

ॐ पृथ्विी ! त्वया धृता लोका देवि ! त्वं विष्णुना धृता । त्वं च धारय मां देवि ! पवित्र कुरू चासनम् ।।

प्राणायाम

जिस प्रकार स्नान से शरीर के बाहरी अंगों की शुद्धि होती है, उसी प्रकार प्राणायाम से भीतरी अंगों की। यह एक प्रकार का श्वास-व्यायाम है, जो फेफड़ों और छाती को फैलाकर मजबूत बनाता है और रक्तगत दोषों को दूर करके उन्हें शुद्ध करता है। फेफड़ों की गति और भीतरी अंगों की कार्यशीलता प्राणायाम का प्रमुख कार्य है। इससे सहनशीलता बढ़ती है और अंग बलवान् होते हैं।

श्वास रोकने से वायु की अनेक शक्तियाँ शरीर में प्रविष्ट होती हैं और क्षय, प्रमेह, रक्तचाप जैसे रोग नहीं होते । शरीर के शिथिल अंगों और अवयवों में क्रिया-शक्ति का संचार प्राप्त करने के लिये ही उपासना में प्राणायाम को महत्त्वपूर्ण स्थान मिला है।Image
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