मौत के अंतिम 5 सेकंड का रहस्य | उदान वायु की प्रचंड उड़ान
हॉस्पिटल में जब मॉनिटर की हार्टबीट लाइन सीधी हो जाती है, डॉक्टर कहते हैं- “आई एम सॉरी, ही इज डेड।”
आधुनिक विज्ञान यही मानता है कि दिल रुकते ही सब खत्म। लेकिन गरुड़ पुराण, प्रश्न उपनिषद और योग-तंत्र शास्त्र कहते हैं- ये सिर्फ शुरुआत है।
असली यात्रा दिल रुकने के ठीक बाद शुरू होती है।
मृत्यु कोई अचानक स्विच ऑफ नहीं। ये पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) का क्रमिक विलय है।
जन्म में सूक्ष्म से स्थूल की यात्रा, मौत में स्थूल से सूक्ष्म की उल्टी यात्रा।
पहले पृथ्वी तत्व पिघलता है- शरीर भारी लगता है, पैर ठंडे पड़ जाते हैं, जैसे हजार बिच्छू डंक मार रहे हों (गरुड़ पुराण)।
फिर जल तत्व- भयंकर प्यास, गला सूखना, होंठ फटना।
अग्नि तत्व- शरीर ठंडा, आंखों की रोशनी धुंधली, यमदूतों के साए या फ्रैक्टल आकृतियां दिखना।
वायु और आकाश बचे रहते हैं। बाहर से शांत, अंदर भयानक युद्ध चल रहा होता है।
हठयोग का सबसे गुप्त रहस्य , वज्रोली और सहजोली मुद्रा
क्या आप जानते हैं कि प्राचीन ऋषियों ने एक ऐसी विद्या बताई थी जिससे वीर्य/रजस का पतन रोककर उसे ओजस में बदल दिया जाता है? इससे बुढ़ापा रुकता है, दिमाग तेज होता है और सिद्धियां खुलती हैं।
हठयोग प्रदीपिका में स्वात्माराम जी कहते हैं – वज्रोली सिद्ध करने वाला काल से भी अजेय हो जाता है!
ये कोई साधारण किगल एक्सरसाइज नहीं, बल्कि प्राण-ऊर्जा का अलकेमी है।
वज्रोली क्या है?
“वज्र” का मतलब कठोर, अभेद्य, इंद्र का वज्र।
हमारे शरीर में वज्र नाड़ी जननांगों से मस्तिष्क तक जुड़ी है। वज्रोली मुद्रा में पुरुष अपनी मूत्र मार्ग और जननांग मांसपेशियों को पूरी तरह कंट्रोल करके अपान वायु को ऊपर खींचता है।
नतीजा? वीर्य (बिंदु) नीचे गिरने की बजाय ऊपर उठकर ओजस बनता है।
हठयोग प्रदीपिका 3.82: “यो विजानाति स योगी सिद्धि भाजनम्” – इसे जान लेने वाला सिद्धि का पात्र बन जाता है।
सहजोली – स्त्री का शक्तिशाली रूप 🌸
सहजोली वज्रोली का स्त्री स्वरूप है। “सहज” यानी स्वाभाविक।
योगिनी गर्भाशय, योनि मार्ग और मूल बंध के संकुचन से रजस को ऊर्ध्वगामी करती है। उड्डीयान बंध के साथ करने से वैक्यूम बनता है जो ऊर्जा को सहजता से ऊपर ले जाता है।
ये शिव-शक्ति का संतुलन है। दोनों साथ में पूर्ण होते हैं।
कही भोजन करते समय आप भी य गलती रोज़ कर रहे है ? इसलिए आपका शरीर में बीमारी का आगमन हुआ ?
आप सुन कर स्तंभ रह जाएँगे आज
आपके पेट में साक्षात् ईश्वर बैठे है !
वैश्वानर विद्या छांदोग्य उपनिषद की अमर शिक्षा
कल्पना कीजिए प्राचीन मंदिर के गर्भगृह में आप खड़े हैं चारों ओर सन्नाटा बीच में पवित्र अग्नि प्रज्वलित है घी और अन्न की आहुति डाल रहे हैं यह यज्ञ है अब आंखें खोलिए आप डाइनिंग टेबल पर बैठे हैं फोन हाथ में तनाव दिमाग में जल्दी खाना मुंह में डाल रहे हैं इन दोनों दृश्यों में कोई अंतर नहीं आपका पेट ही हवन कुंड है जिसे पाचन तंत्र समझते हैं वह साक्षात ईश्वर है
छांदोग्य उपनिषद में वैश्वानर विद्या छिपी है यह बताती है भोजन कोई शारीरिक मजबूरी नहीं बल्कि ब्रह्मांड का सबसे बड़ा आध्यात्मिक कृत्य है हम खाना खाते नहीं अपने भीतर बैठे भूखे देवता को आहुति देते हैं आज भागदौड़ में हम इस सत्य को भूल गए खाना कैलोरी या स्वाद बन गया तनाव क्रोध या स्क्रीन के साथ खाते हैं मंदिर में कचरा फेंकने जैसा अपमान है
हमारे प्राचीन ऋषि जिन शब्दों को उच्चारित करते थे वे तुरंत फल देते थे। इसका राज था वाक शुद्धि। आज हम उसी प्राचीन भारतीय विज्ञान को समझते हैं जो शब्दों को सृष्टि का मजबूत आदेश बना सकता है।
वेदों और उपनिषदों में वाक को ब्रह्म की शक्ति माना गया है।
ऋग्वेद के वाक सूक्त में देवी वाक स्वयं कहती हैं कि वे ब्रह्मांड को धारण करती हैं। मांडूक्य उपनिषद में ओमकार को ब्रह्मांड का आधार बताया गया है। विज्ञान भैरव तंत्र में शिव पार्वती को बताते हैं कि शुद्ध वाक से शब्द पत्थर की लकीर बन जाते हैं।
वाक शुद्धि में जीभ को तालु से स्पर्श करने की प्रक्रिया खेचरी मुद्रा से प्रेरित है। प्राचीन ग्रंथों में इसे 72000 नाड़ियों को संरेखित करने और पीनियल ग्लैंड को सक्रिय करने वाला बताया गया है। आधुनिक विज्ञान भी जीभ की स्थिति के प्रभावों का अध्ययन कर रहा है।
वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि जीभ को तालु (roof of the mouth) पर रखने से पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम सक्रिय होता है। इससे हृदय गति और तनाव कम होता है। कुछ शोध vagus nerve के माध्यम से रिलैक्सेशन बढ़ने का संकेत देते हैं।
एक अध्ययन में tongue position पर mandibular muscle activity और heart rate variability का परीक्षण किया गया। तालु पर जीभ रखने से शरीर में रिलैक्सेशन संबंधी बदलाव देखे गए। इससे न्यूरोप्लास्टिसिटी प्रभावित हो सकती है जो आदतों और सोच को बदलने में मदद करती है।
कुंभक प्राणायाम … हिमालयी योगियों की प्राचीन विद्या जो उम्र को उलट सकती है वेद पुराणों का गुप्त रहस्य
कुंभक कोई जिम की कसरत नहीं है।
क्या आपने कभी सोचा है कि हिमालय के योगी सौ साल की उम्र में भी युवाओं जैसी असीम ऊर्जा चेहरे की चमक और शरीर का लचीलापन कैसे बनाए रखते हैं। क्या सचमुच संभव है कि साठ साल की उम्र में भी पच्चीस साल के जवान जैसा जीवंत और स्वस्थ दिखा जा सके।
आज हम उसी प्राचीन महाविद्या कुंभक प्राणायाम की गहराइयों में उतर रहे हैं जो समय के पहिए को उलटने की शक्ति रखती है।
उम्र बढ़ना सिर्फ कोशिकाओं का क्षरण नहीं बल्कि मन और प्राण की गति का परिणाम है। जब हमारी सांस तेज और उथली होती है तो शरीर लगातार तनाव की स्थिति में रहता है। प्रकृति का सरल नियम देखिए कुत्ता एक मिनट में बीस तीस सांस लेता है और उसकी उम्र दस पंद्रह साल होती है जबकि कछुआ तीन चार सांस लेता है और दो सौ तीन सौ साल तक स्वस्थ रहता है। हमारे ऋषियों ने हजारों साल पहले यही समझ लिया था कि ईश्वर ने हमें सांसों की एक निश्चित संख्या दी है।
श्वेताश्वतार उपनिषद हठयोग प्रदीपिका और योग वासिष्ठ में स्पष्ट लिखा है कि श्वास चलती है तो मन चंचल होता है और जब कुंभक से श्वास स्थिर हो जाती है तो मन भी शांत हो जाता है। जब मन और प्राण दोनों ठहर जाते हैं तो शरीर के अंदर ऊर्जा का अनावश्यक खर्च रुक जाता है और कोशिकाओं का टूटना यानी बुढ़ापा वहीं थम जाता है। यह कोई कथा नहीं बल्कि ब्रह्मांडीय सत्य है जिसे आज का विज्ञान ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस कम होने और सेलुलर रिपेयर के रूप में देख रहा है।
द सीक्रेट – वो किताब जो आपकी जिंदगी का गेम चेंजर बन सकती है
क्या आपने कभी सोचा है कि कुछ लोग बिना ज्यादा मेहनत के पैसा, सफलता और खुशी आकर्षित कर लेते हैं, जबकि दूसरे पूरी कोशिश के बावजूद खाली हाथ रह जाते हैं?
रोंडा बर्न की किताब “The Secret” इसी रहस्य को खोलती है – Law of Attraction।
आप जो सोचते हो, वही आपकी जिंदगी बन जाता है। विचार ऊर्जा हैं और ब्रह्मांड उन्हें सुनता है।
अगर आप अपनी किस्मत बदलना चाहते हो तो सोच बदलनी होगी। तैयार हो? शुरू करते हैं।
द सीक्रेट का पहला रहस्य: Law of Attraction।
समान चीजें समान चीजों को आकर्षित करती हैं। आपके विचार ब्रह्मांड में ऊर्जा बनकर फैलते हैं और उसी तरह के लोग, अवसर और परिस्थितियां खींच लाते हैं।
आपकी सबसे बड़ी गलती ये है कि आप नहीं जानते आप हर पल अपनी जिंदगी खुद बना रहे हो।
कमी, डर या असफलता पर सोचोगे तो वही ज्यादा आएगा। ब्रह्मांड नहीं देखता कि आप क्या चाहते हो, वो देखता है कि आप किस पर ध्यान दे रहे हो।
अब से ध्यान सकारात्मक पर लगाओ।
आप खुद एक चलता-फिरता चुंबक हो।
आपकी सोच + भावना + विश्वास मिलकर ऐसी ऊर्जा बनाते हैं जो ठीक वैसी चीजें आपकी ओर खींचती है।
जिस पर ध्यान दोगे, वो बढ़ेगा। समस्याओं पर ध्यान दो तो समस्याएं बढ़ेंगी। समाधान पर ध्यान दो तो समाधान आने लगेंगे।
ब्रह्मांड को “कैसे” मत पूछो। आपका काम सिर्फ “क्या” तय करना है। बाकी ब्रह्मांड संभाल लेगा।
बड़े सपने देखने से डरो मत। जितना बड़ा सोचोगे, उतना बड़ा पाओगे।