धर्म की बात Profile picture
#धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ।। #मनुस्मृति
3 Nov
#जाति की व्याकरणसम्मत परिभाषा इस प्रकार है-

आकृतिग्रहणा जातिः, लिङ्गानां च न सर्वभाक् ।
सकृदाख्यातनिर्ग्राह्या, गोत्रञ्च चरणः सह ।।

इस श्लोक में जाति के चार लक्षण दिये गये हैं। यथा-
[१] आकृति से

[२] लिंग से

[३] जन्म से

[४] वेद से
[१] आकृति -

आकृतिविशेष जिस का व्यञ्जक होता है उसे #जाति कहते हैं । जैसे एक कुक्कुट (मुर्गे) या सूकर (सूअर) आदि को देख कर उस में गृहीत अवयवसंस्थान से अन्यत्र सर्वत्र कुक्कुट सूकर आदि व्यक्तियों का ज्ञान हो जाता है तो ये कुक्कुट, सूकर आदि व्यक्तिवाचक होते हुए भी जातिवाचक हैं।
[२] लिङ्ग -

किसी व्यक्ति में एक बार जिस के कथन से अन्य अनेक व्यक्तियों में उस का
बोध हो जाये तो उसे भी जाति समझना चाहिये । यथा-किसी को जब वृषल (शूद्र) कह दिया जाये तो उस के पिता, पितामह, पुत्र, भ्राता आदि का भी वृषलत्व स्वयं विदित हो जाता है।
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23 May
पन्द्रह #निमेष की एक काष्ठा होती है और तीस #काष्ठा की एक कला गिनी जाती है। तीस कलाओंका एक #मुहूर्त होता है और तीस मुहूर्तोंके सम्पूर्ण रात्रि-दिन
होते हैं।दिनोंके घटते-बढ़ते रहनेपर भी #सन्ध्या सर्वदा समान भावसे एक मुहूर्तकी ही होती है।
उदयसे लेकर सूर्यकी तीन मुहूर्तकी गतिके कालको #प्रातःकाल कहते हैं, यह सम्पूर्ण दिनका पाँचवाँ भाग होता है। इस प्रात:कालके अनन्तर तीन मुहूर्तका समय #संगव कहलाता है तथा संगवकालके पश्चात् तीन मुहूर्तका #मध्याह्न होता है।
मध्याह्नकालसे पीछेका समय #अपराह्न
कहलाता है इस काल-भागको भी बुधजन तीन मुहूर्तका ही बताते हैं। अपराह्नके बीतनेपर #सायाह्न आता है। इस प्रकार [सम्पूर्ण दिनमें] पन्द्रह मुहूर्त और [प्रत्येक
दिवसांशमें] तीन मुहूर्त होते हैं।
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23 May
बुद्धि और आत्मा - ये दोनों ही सूक्ष्म तत्त्व हैं तथापि इनमें बड़ा भारी अन्तर है । तुम इस अन्तरपर दृष्टिपात करो । इनमें #बुद्धि तो गुणोंकी सृष्टि करती है और #आत्मा गुणोंकी सृष्टिसे अलग रहता है।
जैसे गूलरका फल और उसके भीतर रहनेवाले कीड़े एक साथ रहते हुए भी एक - दूसरेसे अलग हैं , उसी प्रकार #बुद्धि और #आत्मा दोनोंका एक साथ रहना
और भिन्न - भिन्न होना समझना चाहिये।

#शान्तिपर्व
ये दोनों स्वभावसे ही अलग - अलग हैं तो भी सदा एक - दूसरेसे मिले रहते हैं । ठीक वैसे ही , जैसे मछली और जल एक - दूसरेसे पृथक् होकर भी परस्पर संयुक्त रहते हैं । यही स्थिति बुद्धि और आत्माकी भी है।
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22 May
जीवात्माके आश्रित रहकर बुद्धि ( सुख , दुःख और मोह ) तीन भावोंमें स्थित होती है । वह कभी तोसप्रसन्नताका अनुभव करती है , कभी शोकमें डूबी रहती है और कभी सुख और दुःख दोनोंके अनुभवसे रहित मोहाच्छन्न हो जाती है।
इस प्रकार वह मनुष्योंके मनके भीतर तीन भावोंमें अवस्थित है , यह भावात्मिका बुद्धि (समाधि में) सुख , दुःख और मोह - इन तीनों भावोंको लाँघ जाती है । ठीक उसी तरह जैसे सरिताओंका स्वामी समुद्र उत्ताल तरंगोंसे संयुक्त हो अपनी विशाल तटभूमिको भी कभी - कभी लाँघ जाता है।
उपर्युक्त भावोंको लाँघ जानेपर भी #बुद्धि भावात्मक मनमें सूक्ष्मरूपसे स्थित रहती है । तत्पश्चात् समाधिसे उत्थानके समय प्रवृत्त्यात्मक #रजोगुण बुद्धिभावका प्रवृत्ति अनुसरण करता है। उस समय रजोगुणसे युक्त हुई बुद्धि सारी इन्द्रियोंको प्रवृत्तिमें लगा देती है ।
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21 May
जितनी दूरतक सूर्य और चन्द्रमाकी किरणोंका प्रकाश जाता है; समुद्र, नदी
और पर्वतादिसे युक्त उतना प्रदेश #पृथिवी कहलाता है।जितना पृथिवीका विस्तार और परिमण्डल (घेरा) है उतना ही विस्तार और परिमण्डल #भुवर्लोक का भी है।
पृथिवीसे एक लाख योजन दूर #सूर्यमण्डल है और सूर्यमण्डलसे भी एक लक्ष योजनके अन्तरपर #चन्द्रमण्डल है। चन्द्रमासे पूरे सौ हजार (एक लाख) योजन ऊपर सम्पूर्ण #नक्षत्रमण्डल प्रकाशित हो रहा है।
नक्षत्रमण्डलसे दो लाख योजन ऊपर
#बुध और बुधसे भी दो लक्ष योजन ऊपर #शुक्र स्थित हैं।
शुक्रसे इतनी ही दूरीपर #मंगल हैं और
मंगलसे भी दो लाख योजन ऊपर #बृहस्पति जी हैं। बृहस्पतिजीसे दो लाख योजन ऊपर #शनि हैं और शनिसे एक लक्ष योजनके अन्तरपर #सप्तर्षिमण्डल है तथा सप्तर्षियोंसे भी सौ हजार योजन ऊपर समस्त ज्योतिश्चक्रकी नाभिरूप #ध्रुवमण्डल स्थित है।
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21 May
वृक्षोंमें पाञ्चभौतिकता की सिद्धि -

भगुजीने कहा - मुने । यद्यपि #वृक्ष ठोस जान
पड़ते हैं तो भी उनमें #आकाश हैं , इसमें संशय नहीं है ।
इसीसे उनमें नित्यप्रति फल - फूल आदिकी उत्पत्ति
सम्भव हो सकती है।
वृक्षोंके भीतर जो #ऊष्मा या गर्मी है , उसीसे उनके
पत्ते , छाल , फल फूल , कुम्हलाते हैं , मुरझाकर झड़ जाते
; इससे उनमें #स्पर्श का होना भी सिद्ध होता है।
यह भी देखा जाता है कि वायु , अग्नि और
बिजलीकी कड़क आदि भीषण शब्द होनेपर वृक्षोंके
फल - फूल झड़कर गिर जाते हैं । #शब्द का ग्रहण तो
श्रवणेन्द्रियसे ही होता है ; इससे यह सिद्ध हुआ कि वृक्ष
भी सुनते हैं।
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4 May
राजा इन ३६ गुणोंसे सम्पन्न होनेकी चेष्टा करे -

१ - #धर्म का आचरण करे , किंतु कटुता न आने दे
२ - #आस्तिक रहते हुए दूसरों के साथ प्रेमका बर्ताव न छोड़े
३ - क्रूरताका आश्रय लिये बिना ही #अर्थ - संग्रह करे
४ - #मर्यादा का अतिक्रमण न करते हुए ही विषयोंको भोगे
सुखकी प्राप्ति करानेवाले छत्तीस गुणोंका वर्णन-

५ - दीनता न लाते हुए ही प्रिय #भाषण करे
६- #शूरवीर बने , किंतु बढ़ - बढ़कर बातें न बनावे
७- #दान दे , परंतु अपात्रको नहीं
८ - #साहसी हो , किंतु निष्ठुर न हो
९- #दुष्टों के साथ मेल न करे
१० - बन्धुओं के साथ लड़ाई - #झगड़ा न ठाने ।
११ - जो राजभक्त न हो , ऐसे #गुप्तचर से काम न ले
१२ - किसीको #कष्ट पहुँचाये बिना ही अपना कार्य करे
१३ - दुष्टोंसे अपना #अभीष्ट कार्य न कहे
१४ - अपने गुणोंका स्वयं ही वर्णन न करे
१५ - श्रेष्ठ पुरुषोंसे उनका #धन न छीने
१६ - नीच पुरुषोंका #आश्रय न ले
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3 May
(३) विकृत #देश के लक्षण - जिस देश के स्वाभाविक वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श विकृत हो गए हों, अधिक क्लेदयुक्त, साँप, हिंसक जन्तु, मच्छड़, टिड्डी, मक्खियाँ, चूहा, उल्लू, गोध, सियार आदि जन्तुओं से व्याप्त, तृण और फूस से युक्त उपवन वाले, विस्तृत लता आदि से युक्त,

#चरकसंहिता
#महामारी
जैसा पहले कभी नहीं हुआ हो ऐसे गिरे हुये, सूखे हुये, और नष्ट हुए शस्यवाले, धूम युक्त वायुवाले, लगातार शब्द करते हुए पक्षियों के समूह और जहाँ जोर से कुत्ते चिल्लाते हों, अनेक प्रकार के मृग, पक्षी, घबड़ा कर और दुःखित होकर इधर-उधर दौड़ते हों,
छोड़ दिए हैं और नष्ट हो गए हैं #धर्म, #सत्य, #लज्जा, #आचार, #स्वभाव और गुण जिनमें ऐसे #जनपद वाले, जहाँके #जलाशय क्षुब्ध हों और उसमें बड़ी लहरें उठती हों, जहाँ लगातार आकाश से उल्कापात होता हो, बिजली गिरनी हो, भूकम्प होता हो और भयंकर शब्द सुनाई पड़ते हों,
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3 May
#जनपदोद्ध्वंस [ #Epidemic ] के कारण के विषय में भगवान् आत्रेय से अग्निवेश का प्रश्न -

#अग्निवेश ने कहा ‘एक ही समय में भिन्न-भिन्न प्रकृति, आहार, देह, बल, सात्म्य, मन और आयु के मनुष्यों का जनपदोद्ध्वंस ( #महामारी ) एक ही व्याधि से कैसे होता है ?’

#चरकसंहिता
भगवान् #आत्रेय का उत्तर - प्रकृति आदि भावों के भिन्न होते हुए भी मनुष्यों के जो अन्य #भाव_सामान्य हैं, उनके विकृत होने से एक ही समय में, एक ही समान लक्षण वाले #रोग उत्पन्न होकर #जनपद को नष्ट कर देते हैं। वे ये भाव जनपद में सामान्य होते हैं। जैसे-#वायु, #जल, #देश और #काल
(१) विकृत (रोग पैदा करने वाली) #वायु के लक्षण -

ऋतु के विपरीत, अतिनिश्चल, अति वेग वाली, अत्यन्त कर्कश, अतिशीत, अति उष्ण, अत्यन्त रुक्ष, अत्यन्त अभिष्यन्दी, भयंकर शब्द करने वाली, आपस में टक्कर खाती हुई, अति कुण्डली युक्त , बुरे गन्ध, वाष्प, बालू , धूलि और #धूम से दूषित हुई।
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2 May
#नाड़ीचक्र का वर्णन-

मूलाधार में आधा बाँस काटा गया हो ऐसे आकार (आभा) वाली, मूलाधार के त्रिकोणाकार प्रदेश में अवस्थित, बारह अंगुल के परिमाणवाली #सुषुम्ना नाम की #नाड़ी है, उसे #ब्रह्मनाड़ी भी कहा जाता है । उस सुषुम्ना के दोनों पार्थों में #इडा और #पिंगला नाम की दो नाड़ियाँ हैं।
वे दोनों नाड़ियाँ #विलम्बिनी नाम की #नाड़ी में अनुस्यूत (पिरोयी हुई)हैं और वे दोनों नाड़ियाँ नासिका के अन्तभाग-नथुने तक पहुँची हुई हैं ।वाम नथुने से इडा में हेमरूप से (सूर्य नाड़ी से) प्राणवायु पहले आता है।और नासिका के दक्षिण भाग से (दाहिने नथुने से) सूर्यस्वरूप वह वायु जाता है ।
अब जो #विलम्बिनी नाम की नाड़ी है, वह व्यक्त होकर #नाभि प्रदेश में प्रतिष्ठित हुई है, उसके थोड़े ऊपर के भाग में नीचे मुख किए हुए नाड़ियाँ उत्पन्न हुई हैं । उस स्थान को #नाभिचक्र कहा जाता है । कुक्कुट ( मुर्गी ) के अण्डे की तरह उसका आकार है ।
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2 May
शंका- इस देह के अन्त के बाद कौन-सा जन्म मिलेगा, यह आभास #ज्ञानी मनुष्य जानते नहीं है। इसलिए #योग से रहित केवल जानकारी का ज्ञान और वैराग्य तो अर्थविहीन परिश्रम ही है।
#ध्यान में बैठे हुए जिस मनुष्य का ध्यान एक चींटी के काटने से भी छूट जाता है, वह पुरुष #मृत्यु के समय के में बिच्छुओं के डंक मारने की-सी पीड़ा होने पर किस तरह #सुखी हो सकता है भला?
समाधान- इस बात को मिथ्या तर्क से घिरे हुए लोग समझ नहीं सकते कि जब #अहंकार (मैं-मेरा) ही नष्ट हो जाता है, तब देह भी वास्तव में नष्ट ही हो जाता है। (भले ही वह बाहर से दिखाई दे) और तब तो फिर पीड़ाएँ होंगी किसको ? तब तो फिर जल, अग्नि, शस्त्र और खाई आदि की बाधाएँ भला किसको होंगी ?
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2 May
#गौतमधर्मसूत्र

सभी धर्मसूत्रों में #गौतम #धर्मसूत्र सबसे प्राचीन है। यह केवल गद्य में है तथा
इसमें श्लोक का कोई उद्धरण नहीं दिया गया है, जबकि दूसरे धर्मसूत्रों में
श्लोक का उद्धरण आ जाता है। इसकी प्राचीनता के प्रमाण :
१. सर्वप्रथम इसका उल्लेख #बौधायनधर्मसूत्र में कई जगह किया गया है। अनेक प्रमाणों से यह बात सिद्ध है कि बौधायन ने ही गौतमधर्मसूत्र
से सामग्री ग्रहण की है।
२. इसी प्रकार वसिष्ठधर्मसूत्र में भी गौतमधर्मसूत्र से सामग्री ली गयी है।
३. #मनुस्मृति ३. १६ में #गौतम का उल्लेख किया गया है और उन्हें #उतथ्य का
पुत्र बताया गया है।

४. #याज्ञवल्क्यस्मृति १. ५ में उन्हें धर्मशास्त्रकारों में गिनाया गया है :
"पराशरव्यासशंखलिखिता दक्षगौतमौ”।
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1 May
आदि #सत्ययुग में जिस प्रकार #राजा और #राज्य की उत्पत्ति हुई वह सारा वृतांत सुनो -

पहले न कोई राज्य था ना राजा। न दंड था और न दंड देने वाला। समस्त प्रजा धर्म के द्वारा ही एक दूसरे की रक्षा करती थी।
...

- भीष्म

#शान्तिपर्व
सब मनुष्य धर्मके द्वारा परस्पर पालित
और पोषित होते थे। कुछ दिनोंके बाद सब लोग पारस्परिक संरक्षणके कार्यमें महान् कष्टका अनुभव करने लगे।फिर उन सबपर #मोह छा गया। जब सारे मनुष्य मोहके वशीभूत हो गये, तब कर्तव्याकर्तव्यके ज्ञानसे शून्य होनेके कारण उनके #धर्म का नाश हो गया।
कर्तव्याकर्तव्यका ज्ञान नष्ट हो जानेपर
मोहके वशीभूत हुए सब मनुष्य #लोभ के अधीन हो गये। फिर जो वस्तु उन्हें प्राप्त नहीं थी, उसे पानेका वे प्रयत्न करने लगे। इतनेहीमें वहाँ #काम नामक दूसरे दोषने उन्हें घेर लिया। कामके अधीन हुए उन मनुष्योंपर #क्रोध नामक शत्रुने आक्रमण किया।
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1 May
राजनीतिके छ : #गुण होते हैं - #सन्धि , #विग्रह , #यान , #आसन , #द्वैधीभाव और #समाश्रय । इन सबके गुण - दोषोंका अपनी बुद्धिद्वारा सदा निरीक्षण करे।

यदि शत्रुपर चढ़ाई की जाय और वह अपनेसे बलवान् सिद्ध हो तो उससे मेल कर लेना #सन्धि नामक गुण है ।

#शान्तिपर्व
#महाभारत
यदि दोनोंमें समान बल हो तो लड़ाई जारी रखना #विग्रह है ।

यदि शत्रु दुर्बल हो तो उस अवस्थामें उसके दुर्ग आदि पर जो आक्रमण किया जाता है , उसे #यान कहते हैं ।
यदि अपने ऊपर शत्रुकी ओरसे आक्रमण हो और शत्रुका पक्ष प्रबल जान पड़े तो उस समय अपनेको दुर्ग आदिमें छिपाये रखकर जो आत्मरक्षा की जाती है , वह #आसन कहलाता है।
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1 May
#श्येनयाग के #धर्म या #अधर्म होने में निर्णय-

(१) ‘अनिष्ट से असम्बद्ध #इष्ट की सिद्धि जिससे हो वही #धर्म है।’ यदि धर्म
का यह लक्षण करें तो फिर श्येन याग अधर्म होने के कारण वर्जनीय होगा, क्योंकि इस याग से उत्पन्न होने वाले शत्रुवध स्वरूप फल से अनिष्ट का होना निश्चित है।
(२)यदि किसी रीति से अर्थात् शत्रुवधादि स्वरूप अकार्य के उत्पादन के द्वारा भी #प्रीति का जो कारण विधिवाक्य के द्वारा विधेयरूप में निर्दिष्ट हो वही 'धर्म' है-धर्म का लक्षण करें तो फिर श्येनयाग भी #धर्म ही है, क्योंकि श्येनयाग भी शत्रु के वध से ही उत्पन्न होनेवाली प्रीति का कारण है।
एवं 'श्यनेनाभिचरन् यजेत' इस #विधिवाक्य के द्वारा विधेय रूप में निर्दिष्ट भी है। भले ही वह शत्रुवध रूप 'अकार्य' अर्थात् #अधर्म का जनक हो। #धर्म होने के लिये #अधर्म का उत्पादकत्व #बाधक नहीं है। #धर्म होने के लिये केवल #प्रीतिजनकत्व एवं #चोदनागम्यत्व ये ही दोनों आवश्यक हैं।
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30 Apr
राजासे जीविका चलानेवाले #सेवक अधिक मुंहलगे हो जानेपर मालिकका अपमान कर बैठते हैं । वे अपनी मर्यादामें स्थिर नहीं रहते और स्वामीकी आज्ञाका उल्लंघन करने लगते हैं।

#शान्तिपर्व
वे जब किसी कार्यके लिये भेजे जाते हैं तो उसकी सिद्धिमें संदेह उत्पन्न कर देते हैं । राजाकी गोपनीय त्रुटियोंको भी सबके सामने ला देते हैं । जो वस्तु नहीं मांगनी चाहिये उसे भी मांग बैठते हैं , तथा राजाके लिये रक्खे हुए भोज्य पदार्थोंको स्वयं खा लेते हैं।

#शान्तिपर्व
राज्यके अधिपति भूपालको कोसते हैं , उनके प्रति क्रोधसे तमतमा उठते हैं ; घूस लेकर और धोखा देकर राजाके कार्योंमें विघ्न डालते हैं। वे जाली आज्ञापत्र जारी करके राजाके राज्यको जर्जर कर देते हैं । रनवासके रक्षकोंसे मिल जाते हैं अथवा उनके समान ही वेशभूषा धारण करके वहाँ घूमते फिरते हैं।
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