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इसके बाद सन्त नामदेवजी ने पूरे भारत का भ्रमण किया, मराठी के साथ हिन्दी भाषा में भी अनेक रचनाएँ कीं।

उन पर प्रसन्न होकर भगवान् ने उनसे एक दिन कहा कि ‘मैंने अपने को तुम्हें दे दिया।’ इसीसे अवतार लेने पर भगवान् का नाम ‘दत्त’ पड़ा (अत्रि का पुत्र होने से ‘आत्रेय’। दत्त + आत्रेय = दत्तात्रेय)। 
को प्रकट करता है और ‘वर्ण’ शब्द के आधुनिक पर्याय के रूप में समझा और जाना जाता है।
तदेनं पूजयाम्याशु परिवारसमन्वितम् ।