"#इतिहास_का_पुनर्संशोधित_प्रमाणों_के_आधार_पर
#पुनर्लेखन_होना_आवश्यक_है..."
*वाकाटक नरेश द्वितीय पृथ्वीसेन की राजमुद्रा *
ये राजमुद्रा नंदीवर्धन अर्थात आज के नगरधन के अंतिम मुख्य वाकाटकवंशीय नरेश पृथ्वीसेन द्वितीय की है। इस तांबे की राजमुद्रा पर कमलपुष्प पर अधिष्ठित बौद्ध
1)
धम्म की रक्षक देवी "तारा "की उलट प्रतिमा(Mirror Image) उत्कीर्ण है। जिसके मस्तक पर मुकुट है और गले में अलंकरण धारण किये हुए हैं। बायें हाथ में डंठल सहित खिला हुआ कमल पुष्प है। दायां हाथ दायीं जंघा पर रखा हुआ है। वे "वरदमुद्रा" में बैठी हुई हैं।
2)
तांबे की इस राजमुद्रा पर तारा देवी की प्रतिमा के नीचे
चार पंक्तियां "मध्यप्रदेशी लिपि "(ब्राह्मी लिपि नहीं) में उलट प्रभाव (Mirror Image) में एक लेख उकेरा हुआ है। उसमें कुल 33 अक्षर खुदे हुए हैं। इस लेख की भाषा संस्कृत है तथा इस राजमुद्रा को पलटकर किया गया
3)
लेख का नागरी लिप्यंतरण इस प्रकार है ------
"नरेंद्रसेन सत्सुनौः ----
भर्तुरव्वाकाटकश्रीयः
प्रिथिविषेननृपते
जिगिशौर्ज्जयशासनं ----"
अर्थात ---- "नरेंद्रसेन का पुत्र वाकाटक नृपति पृथ्वीसेन का सर्वसमावेशक ऐसा शौर्यशाली जयशासन"
वाकाटक राजवंश की जानकारी निम्नानुसार है ----
4)
वाकाटक राजघराना ------
•संस्थापक •
विंध्यशक्ति (250--270)
| -----------------------------------
| |
5)
*(प्रवरपुर नंदीवर्धन शाखा) *(वत्सगुल्म शाखा)
1) प्रवरसेन प्रथम (270- 230) 1)सर्वसेन
तृतीय (230 -355)
2)रूद्रसेन प्रथम (330 -355) 2) विंध्यसेन
(विंध्यशक्ति)
(द्वितीय 355 -400 )
6)
3)पृथ्वीसेन प्रथम (355 -380) 3) प्रवरसेन(415 )
4)रूद्रसेन द्वितीय(380- 385) 4) राजा- अज्ञात
(415 -450)
5)प्रभावतीगुप्त(385 -405) 5)देवसेन(450 -475)
6)दिवाकर सेन (385 -400) 6)हरिषेण(475 -500)
7)दामोदर सेन(प्रवरसेन द्वितीय)
(400 -440)
7)
8)नरेंद्रसेन(440 -460)
9)पृथ्वीसेन द्वितीय (460 -480)
पृथ्वीसेन द्वितीय (राज्यकाल ई. सन् 460 -480) मुख्य वाकाटक शाखा (नंदीवर्धन) का ज्ञात अंतिम शासक है।
नर्मदा के तटीय क्षेत्र तथा बालाघाट (मध्यप्रदेश) के अभिलेखों में पृथ्वीसेन ने "अपने वंश का खोया हुआ भाग्य और गौरव
8)
पुनः प्राप्त करवा दिया था" -ऐसा कहा गया है। इस अभिलेख के अनुसार उसे राज्यारोहण के आरंभ में उसके पिता नरेंद्रसेन के समय से ही विदर्भ के "नल"तथा दक्षिण गुजरात के त्रैकूटक वंशीय शत्रुओं का सामना लगातार करना पड़ा था। त्रैकूटक शासक 'धारसेन' का पराभव करके अपने वाकाटक वंश की
9)
खोई हुई प्रतिष्ठा तथा कीर्ति को पृथ्वीसेन द्वितीय ने पुनः प्राप्त किया। पृथ्वीसेन द्वितीय का कोई पुत्र न होने से उसके बाद वाकाटकों की इस शाखा का विलय 'वत्सगुल्म 'जैसी दूसरी शाखा में हुआ। अब वाकाटक नरेश 'हरिषेण 'उसके उत्तराधिकारी के रूप में शासन करने लगा। उसके शासनकाल में
10)
उसके दिये गये विपुल दान से अजंता तथा घटोत्कच गुफा के चित्र व शिल्पकृतियुक्त विश्वविख्यात बौद्ध गुफ़ाओं का निर्माण हुआ। इसकी जानकारी हमें अजंता गुफ़ाओं के शिलालेखों से प्राप्त होती है।
इस राजमुद्रा के अध्ययन से प्राप्त विशेष जानकारी इस तरह है कि इस मुद्रा पर
11)
अंकित प्रतिमा, महायान बौद्ध धम्म की एक संरक्षक देवता तथा स्त्री बोधिसत्व
"तारा "की हैं। इसे बहुत से अध्येता "राजलक्ष्मी"समझते हैं और इस आधार पर वाकाटकों का संबंध "वैष्णवों "से जोड़ते हैं। इतिहास अध्येताओं और शोधकर्ताओं से अनेक बार ऐसे तथ्यों का ग़लत 'अन्वयार्थ '
12)
लगाया जाता है। इससे इतिहास में अनेक त्रुटियां दिखलाई पड़ती हैं। ये राजमुद्रा महत्वपूर्ण पत्रव्यवहार पर 'मोहर 'के रूप में इस्तेमाल की जाती थी। वैसे ही अनुमतिपत्र पर अतिमहत्वपूर्ण कारणों से इस्तेमाल की जाती थी। ऐसा उसके आकार और 'उलट प्रतिमा '(Mirror Image) से स्पष्ट होता है।
13)
यहाँ ये भी स्पष्ट कर देना चाहिए कि वाकाटक नरेश 'प्रवरसेन द्वितीय 'महायानी बौद्ध धम्म का अनुयायी रहा होगा। क्योंकि उसके बाद के शासक 'हरिषेण 'ने अजंता, घटोत्कच की महायान बौद्ध धम्म के अतिशय सुंदर चित्र व शिल्पकृति और अलंकरणयुक्त जगविख्यात् अजंता गुफाओं का निर्माण करवाया था।
14)
और इस महद् कार्य के लिए विपुल दान भी उन्होंने दिया था।
('मध्यप्रदेशी लिपि'---मध्यप्रदेश बुंदेलखंड तथा पूर्वी हैदराबाद संस्थान के उत्तरी भाग और पुराने मैसूर संस्थान के कुछ भागों में पांचवीं सदी से नौवीं सदी तक ये लिपि प्रचलित थी। गुप्त, वाकाटक वंशीय, शरभपुर के शासक
15)
तथा कदंब शासकों के दानपत्रों व शिलालेखों में इस लिपि का उपयोग हम देख सकते हैं।
------ संदर्भ ---प्राचीन भारतीय लिपिमाला, ले. रायबहादुर पं. गौरीशंकर हीराचंद ओझा, अनुवादक --डाॅ .लक्ष्मीनारायण भारतीय, प्रकरण छठा-मध्यप्रदेशी लिपि, पृष्ठ क्रमांक 64.)
16)
--------------------------------#अशोक_नगरे
पुराभिलेखागार, संचनालय, महाराष्ट्र शासन प्रमाणित
मोड़ी लिप्यंतरकार, धम्मलिपि तथा प्राचीन इतिहास तथा पुरातत्व के अध्येता, पारनेर /जि. अहमदनगर
मराठी से हिंदी भाषांतर ---#राजेंद्र_गायकवाड़
17).
Share this Scrolly Tale with your friends.
A Scrolly Tale is a new way to read Twitter threads with a more visually immersive experience.
Discover more beautiful Scrolly Tales like this.
