#भंन्ते_कौण्डिण्य
ज्ञानी कौण्डिण्य ही भगवान बुध्द के प्रथम शिष्य थे। जिन्होंने उनका मध्यम मार्ग सर्वप्रथम समझा था। वे पहले भंन्ते थे जो बुध्द द्वारा उपसम्पन्न कराये गये थे।
राजपुत्र सिध्दार्थ संबधित भविष्य जानने के लिए निमंत्रित आठ विद्वानों में से कौण्डिण्य भी एक थे।
1)
उन में कौण्डिण्य तरुण थे तथा सबसे कम उम्र थे।
तरुण कौण्डिण्य ने केवल एक ही उंगली ऊपर उठाकर एक ही प्रकार की भविष्यवाणी कही उन्होंने दृढ़ निश्चय से कहा, "बालक के गृहस्थ बने रहने का कोई भी चिन्ह नहीं है। उसके अंग लक्षण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि वह निश्चित ही बुध्द होगा
2)
बुध्द होने के लिये कोई बाधक कारण नहीं है।"
कौण्डिण्य बुध्द द्वारा देशित धर्म बोध करने में पहले भिक्षु थे और बुध्द के प्रथम शिष्य।
भगवान बुध्द ने जेतवन में भिक्षुओं की भारी सभा में ज्ञानी कौण्डिण्य के संबंध मे कहा, "सर्वप्रथम मेरा धर्म समझने वालों में ज्ञानी
3)
कौण्डिण्य सर्व श्रेष्ठ है।" आगे भगवान ने यह कहा, "अधिक समय तक खड़े रहने वाले मेंरे शिष्यों में ज्ञानी कौण्डिण्य प्रमुख हैं।"
भगवान के उपदेश देते समय ज्ञानी कौण्डिण्य भिक्षुओं की सभा में दो प्रधान शिष्यों के पीछे बैठते थे। वे नहीं चाहते थे कि भगवान के समीप उनकी उपस्थिति के
4)
कारण स्वयंम उनकों या दुसरों को कोई असुविधा हो।
उन्हें जनवास बहुत प्रिय नहीं था। वह एकांत प्रिय थे। राजगृह से मंदाकिनी नदी के किनारे छद्दंत वन में वे बारा वर्ष तक रहे।
भंन्ते कौण्डिण्य की दाहक्रिया में स्थविर अनिरुध्द के नेतृत्व में पांच सौ भिक्षु उपस्थित थे।
5)
उनके शरीरावेशेष वेलुवन लाये गये। उन अवशेषों को स्वयंम भगवान बुद्ध ने अपने हाथों से स्तूप में प्रतिष्ठित किया।
6)
#अजय_पवार ,जलगांव।
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