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#जमालगढी_स्तूप_व_विहार

जमालगढी सध्याच्या पाकिस्तानातील खबैर पक्ख्तुन्ख्वामधील मरदानच्या कटलांग मरदान मिर्गापासून १३ किमी अंतरावर हे शहर आहे. जमालगढी येथे प्राचीन स्तूप व विहारांचे अवशेष सापडले आहेत.

जमालगढी येथील स्तूप व विहार १/५ शतकातील भरभराटीचे बौद्ध ठिकाण होते.
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जमालगढीचे स्थानीय नाव "जमालगढी कंदारत" किंवा "काफिरो कोटे" असे आहे. जमालगढीच्या भग्नावशेषांचा प्रथम शोध ब्रिटीश पुरात्ववेत्ता व गाढे अभ्यासक अलेक्झांडर कॅनिंगहॅम यांनी इसवी सन १८४८ मध्ये लावला.

कर्नल ल्युम्स्डेन यांनी जमालगढी येथे उत्खनन केले होते पण तेव्हा तेथे विशेष
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काही सापडले नाही. नंतर इसवी सन १८७१ मध्ये लेफ्टनंट क्राॅमटन यांनी पुन्हा येथे उत्खनन केले व अनेक बौद्धशिल्पे सापडली आहेत.

चित्र क्रमांक एक जमालगढी, मरदान, पाकिस्तान बौद्ध नगरीचे भग्नावशेष.

चित्र क्रमांक दोन १/३ शतकातील राणी महामायेचे स्वप्न शिल्प जमालगढी, मरदान,
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#महाकाश्यप_और_भिक्षु

महाकाश्यप भिक्षुओं को क्रियाशील और धार्मिक जीवन व्यतीत करने के लिये हमेशा प्रेरित करते थे। इस कारण भगवान उन्हें अपने समान मानते थे। अपनी अल्पेच्छता और संतोष के लिये भगवान की दृष्टि में ऊंचे थे। भगवान उनका अनुकरण करने का भिक्षुओं को उपदेश दिया करते।
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महाकाश्यप के उपदेशों लोग बड़े प्रभावित होते। भगवान ने उन्हें चंद्र की उपमा दी थी। वे लौकिक बंधनों से मुक्त थे।

एक समय श्रावस्ती में विहार करते हुये उनके संबंध में भगवान ने कहा,
"भिक्षुओं ! काश्यप चीवर से संतुष्ट रहता है, चाहे वह कैसा भी रहे, वह उसकी प्रशंसा करता है।
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भोजन कैसा भी प्राप्त हो वह उससे संतुष्ट होता है। शयनासन कैसा भी हो वह उससे संतोष पाता है। इस लिये भिक्षुओं यह सीखना चाहिये कि हम इसप्रकार संतोष पायेंगे।"

जीवन दर्शन के बारे में महाकाश्यप की अपनी अलग धारणा थी। उन्हें आरण्यक
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#तथागत_और_महाकाश्यप

भगवान और महाकाश्यप राजगृह के लिये रवाना हुये। नगर के पास जाकर भगवान ने एक वृक्ष की छाया में बैठने की इच्छा प्रकट की। काश्यप ने अपना उत्तरासंध का आसन बनाया और वृक्ष के नीचे बिछा दिया। भगवान पीछे आसन पर बैठ गये। संघाटी को हाथ से स्पर्श कर भगवान ने
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मृदुलता से उसकी प्रशंसा की। काश्यप ने संघाटी को स्वीकार करने की भगवान से प्रार्थना की।

भगवान ने पूछा — "तुम क्या पहनोंगे ? "
उन्होंने भगवान के जीर्ण चीवर की याचना की।
"किंन्तु यह जीर्ण हुआ है और फट गया है" भगवान ने कहा।
काश्यप ने पुनः याचना की — "सारे संसार से
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भी यह मेरे लिये कीमती हैं।"

भगवान ने अपना पुराना चीवर काश्यप को दिया और उन्हीं ने अपना नया चीवर भगवान को प्रदान किया। काश्यप के इस महापुन्य के कारण धरती कांप गई थी क्योंकि भगवान द्वारा इस्तेमाल की हुई वस्तु साधारण आदमी इस्तेमाल नहीं कर सकता था।
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#महाकाश्यप_कि_उपसंपदा

पिप्पली उसी रास्ते गुजर रहे थे जिसपर भगवान बुद्ध विराजमान थे। दूर से ही भगवान को देखकर उन्होेंने जान लिया कि वे ही उनके शास्ता होंगे।

समीप पहुंचने पर भगवान ने उन्हें बैठ ने को कहा। तीन बातों का उपदेश दे भगवान ने उन्हें उपसंपदा दी — "काश्यप अपने आपको
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इसप्रकार सुशिक्षित करो। जेष्ठ भिक्षुओं के प्रति, श्रमणेरो के प्रति और समवयस्कों के प्रति आदर तथा सन्मान की भावना रखनी चाहिये। जो धम्म तुम सुनोगे जो की सब की भलाई के लिये होगा। तुम उसे सावधान हो कर, कान खोलकर अपनी इच्छा से उसे ग्रहण करो। शरीर के प्रति जागरूकता को
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कभी उपेक्षा नहीं करोगे।"

इस प्रकार से महाकाश्यप को दिक्षा दि गई।

यह चायना में बना लकड़ी का महाकाश्यप शिल्प आठवीं शताब्दी में का है।
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#अजय_पवार ,जलगांव।
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#महाकाश्यप_भद्दकपिलानी

एक दिन पिप्पली खेत पर गये। उस समय मजदूर खेत में हल चला रहे थे। हल से फटी हूई जमीन में से बरसाती किडे बाहर निकल आये थे जिनको हलों के पीछे उड़ने वाले पक्षी खा रहे थे। यह प्रकृति का खेल पिप्पली ने देखा। उनसे कहा गया और उन्होंने स्वीकार किया कि इस पाप
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का उत्तरदायित्व उन्ही पर है। इससे उनके मन में पश्चाताप होने लगा। सारी भौतिक वस्तुये त्याग देने का उन्हों ने उसी समय निश्चय किया।

इधर घर में भद्दकपिलानी उन कौवों देख रही थी। जो धूप में सुखते तील से किडे खा रहे थे। पूछने पर उसकी दासी ने बताया कि इन किडो के हत्या का पाप उसी
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को हो रहा है तो उसने भी गृहत्याग का संकल्प लिया।

दोनों का एक ही संकल्प था। उन्होंने एक दूसरे के बाल काटें काषाय वस्त्र पहने और हाथ में भिक्षापात्र ले विलापते दास दासियों को छोड़ घर से निकाल पड़े। उन्होंने सब दास दासियों को मुक्त कर दिया तथा अपना धन उनमें बांट दिया।
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#महाकाश्यप

ईसापूर्व ५२७ महाकाश्यप का नाम पिप्पली कुमार था। वे महातीर्थ मगध में पैदा हुये थे। उनके पिता का परिवार ऐश्वर्य संपन्न था। पिप्पली के पिता कपिल और माता सुमना देवी थी।

पिप्पली विवाह करना नहीं चाहते थे और माता पिता विवाह करने पर तुले हुये थे। अन्त में मध्यम मार्ग
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निकाल कर पिप्पली ने माता पिता को इस शर्त पर राजी कर लिया कि उसके द्वारा निर्मित मूर्ति के समान वधु मिले तो वे शादी करेंगे नहीं तो नहीं। वधू की चारों ओर खोज की। अंत में साकेत नगर में एक तरुणी पाई गई। उसका नाम भद्दकपिलानी । भद्दकपिलानी को भी वैवाहिक जीवन पसंद नहीं था।
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दोनों के अनिच्छा के बावजूद उनका विवाह संपन्न हुआ।

परिवार वालों को किसी तरह का संदेह न हो इसलिये शयनो के बीच फुल की माला रख साथ सोते थे। इस प्रकार वे ब्रम्हचर्य का पालन करते थे।

पिप्पली के पास असीमित धन संपत्ति थी। किसी चीज कमी नहीं थी।
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#भंन्ते_महाकात्यायन

ईसापूर्व ५२७ भगवान ने भिक्षु-परिषद में घोषणा की थी, "संक्षिप्त उपदेश को विस्तृत कहने वालों में महाकात्यायन प्रमुख है।"

उनके पिता तिरिहिवच्छ उज्जैनी में चण्डप्रद्योत राजा के दरबार में मंत्री थे। उनकी माता का नाम चंदिमा था। अपने पिता
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के देहांत के पश्चात वे राजा चण्डप्रद्योत के दरबार में मंत्री बने।

भगवान बुध्द की किर्ती गाथा अवंति राज्यतक पहुँच चुकी थी।राजा की भगवान दर्शन कि बेहद इच्छा हुयी। राजाने अपने मंत्री कात्यायन को अन्य सात मंत्रीयो के साथ भगवान को उज्जैनी लाने को भेजा।
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कात्यायन के आठ व्यक्तियों का मण्डल भगवान के पास पहुँचा। उन्होंने भगवान का उपदेश सुना उपदेश सुनते ही उन्हें विमुक्ति प्राप्त हुयी। वे सब भगवान के पास प्रव्रजित हूये। कात्यायन ने राजा के निमंत्रण की भगवान को याद दिलाई परंतु भगवान साथ नहीं गये। उन्होंने कात्यायन को ही भेजा।
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#आयुष्मान्_यश

ईसापूर्व ५२८ भगवान के धम्म में प्रविष्ट होने वाले यश छटे भिक्षु थे। पंचवर्गीय भिक्षुओं की उपसंपदा के पश्चात श्रेष्ठी पुत्र यश तथागत के पास प्रव्रजित हूए।

धनवान यश कुमार के पास सब था किंन्तु कितना भी धन हो और उसके द्वारा कितने भी सुख साधन क्यों न प्राप्त
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किये जाएं परंतु मानसिक शांति किसी भी प्रकार धन देकर खरीदी नहीं जा सकती। यश कुमार के पास सब होने के बावजूद मानसिक शांति, मन की स्थिरता नहीं थी।

धन और उनके माध्यम से प्राप्त किये गये भौतिक सुख के साधनों से यश घिरा रहने पर भी उनके मन में एक प्रकार की अशांति, उदासीनता छाई
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हुई थी। उन्हें अपने अंतर मन में किसी वस्तु का अभाव सा जान पड़ता था किंन्तु वह किस प्रकार का अभाव है उसका चित्र उनके सम्मुख स्पष्ट नहीं था।

व्यक्ति परिवर्तनवादी होता है। यश कुमार अपने जीवन में परिवर्तन लाना चाहते थे। वह परिवर्तन किस प्रकार का हो इसका उन्हें ज्ञान नहीं था।
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#भंन्ते_कौण्डिण्य

ज्ञानी कौण्डिण्य ही भगवान बुध्द के प्रथम शिष्य थे। जिन्होंने उनका मध्यम मार्ग सर्वप्रथम समझा था। वे पहले भंन्ते थे जो बुध्द द्वारा उपसम्पन्न कराये गये थे।

राजपुत्र सिध्दार्थ संबधित भविष्य जानने के लिए निमंत्रित आठ विद्वानों में से कौण्डिण्य भी एक थे।
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उन में कौण्डिण्य तरुण थे तथा सबसे कम उम्र थे।

तरुण कौण्डिण्य ने केवल एक ही उंगली ऊपर उठाकर एक ही प्रकार की भविष्यवाणी कही उन्होंने दृढ़ निश्चय से कहा, "बालक के गृहस्थ बने रहने का कोई भी चिन्ह नहीं है। उसके अंग लक्षण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि वह निश्चित ही बुध्द होगा
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बुध्द होने के लिये कोई बाधक कारण नहीं है।"

कौण्डिण्य बुध्द द्वारा देशित धर्म बोध करने में पहले भिक्षु थे और बुध्द के प्रथम शिष्य।

भगवान बुध्द ने जेतवन में भिक्षुओं की भारी सभा में ज्ञानी कौण्डिण्य के संबंध मे कहा, "सर्वप्रथम मेरा धर्म समझने वालों में ज्ञानी
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भगवान बुद्धाने अपने इस #धम्मशासन में अपने लिये कोई विशेष स्थान सुरक्षित नहीं रखा था।

उनका अपना स्थान अलग था, धम्म का अपना।

भगवान बुद्ध ने किसी को भी अपना उत्तराधिकारी बनाने से इनकार किया, वह अपने #धम्मशासन में अपने लिये कोई भी स्थान सुरक्षित रखना नहीं चाहते थे।
दो तीन बार
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भगवान बुद्ध के अनुयायियों ने उनसे प्रार्थना की, कि वे किसी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दें।
हर बार भगवान बुद्ध ने मना कर दिया।
उनका उत्तर था, #धम्म_ही_धम्म_का_उत्तराधिकारी_हैं

"धम्म को अपने तेज से जीवित रहना चाहिए। किसी मानवीय अधिकार के बल से नहीं।"
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"यदि धम्म को मानवीय अधिकार पर निर्भर रहने की आवश्यकता है, तो वह धम्म नहीं।"

"यदि धम्म की प्रतिष्ठा के लिये हर बार इसके संस्थापक का नाम रटते रहने की आवश्यकता है, तो वह धम्म नहीं।"
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#बिमरन_स्तूप

अफगाणिस्तान मधील जलालाबादच्या पश्चिमेला ११ किलोमीटरवर बिमरन आहे.
१८३४ मध्ये चार्ल्स मॅसन यांनी चार स्तूपापैकी, स्तूप नंबर २ उघडला. त्यात व्यवस्थित ठेवण असलेल्या एका चौकोनी दगडाच्या खात्यात एक दगडी अवशेष मंजूषा सापडली व त्यात सोन्याचा एक गोलाकार डबा होता.
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डब्यात एक बहुमुल्य निलमणी, काही मोती, काही हिरे, सोन्याचे दागिने, चार नाणी व बुध्दांच्या हाडांचा अंश. एवढे सारे या सोन्याच्या डब्यात होते.

चित्र क्रमांक एक जोसफ ई. होटंग गॅलरी ठेवलेली अवशेष मंजूषा.

चित्र क्रमांक दोन अभय मुद्रातील सोन्याच्या डब्यावर कोरलेले बुध्दांचे शिल्प.
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चित्र क्रमांक तीन सोन्याच्या डब्यातील अवशेष.

चित्र क्रमांक चार इंडो /सियिरियनचा शेवटचा राजा अॅजेस दुसरा याची अवशेष मंजूषा मध्ये सापडलेली चार नाणी इसवी सन ३५/१२
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एक बार आनंद ने बुध्द से पूछा, 'भगवान, आपने आज तक यह नहीं बताया कि मृत्यु के उपरांत क्या होता है?'

उसकी बात सुनकर बुध्द मुसकराए, फिर उन्होंने उससे पूछा,'पहले मेरी एक बात का जवाब दो। अगर कोई व्यक्ति कहीं से जा रहा हो और अचानक कहीं से आकार उसके शरीर में विषबुझा बाण घुस
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जाय तो उसे क्या करना चाहिए? पहले शरीर में घुसे बाण को हटना ठीक रहेगा या फिर देखना कि बाण किधर से आया है और किस लक्ष्य पर मारा गया है।

आनंद ने कहा, 'पहले तो शरीर में घुस बाण को तुरंत निकालना चाहिए, अन्यथा विष पूरे शरीर में फैल जाएगा।'
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बुध्द ने कहा, "बिल्कुल ठीक कहा तुमने। अब यह बताओं कि पहले इस जीवन के दु:खों के निवारण का उपाय किया जाए या मृत्यु के बाद की बातों को सोचा जाए।"
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#अजय_पवार ,जलगांव।
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#भगवान_बुध्द_का_वर्षावास

भगवान बुद्धाने संम्बोधी प्राप्त करने के पश्चात धम्म प्रचार और प्रसार के हेतु ४५ साल निरंतर पेदल ही परिक्रमा कर पवित्र ऐसा धम्म दुनियां को दिया है। भगवान बुद्ध ने अपने पहला वर्षावास ईसापूर्व ५२७ सारनाथ में संपन्न किया था, उनका
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सारनाथ के साथ कुल ४६ वर्षावास संपन्न हुए हैं।

सारनाथ १, राजगृह ५, वैशाली २,मंकुल पर्वत २, संसुमारगिरी २, कौशंबी १, परिलेयक १, नाला १, वैरंजा १, चालिय पर्वत ३, श्रावस्ती २५, आलवी १, कपिलवस्तु १,
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ऐसे कुल ४६ वर्षावास भगवान बुद्ध ने संपन्न किये हैं।

यह चित्र अजंता गुफाओ में के स्तूप का है।
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#अजय_पवार ,जलगांव।
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#राजा_पसनजित_धम्मदिक्षा

भाद्रपद पौर्णिमा म्हणजे पोट्ठापाद मासो पुन्नमि

"ऐहिक संपत्ती ही अनित्य आणि नाशवंत आहे. तर धम्मरूपी धन शाश्वत आहे."

"आपली बरीवाईट कृत्ये नेहमी छायेप्रमाणे आपला पाठपुरावा करतात"

"सर्वात अधिक गरज करुणामय ह्रदयाची आहे."
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"आपल्या प्रजाला एकुलत्या एक मुलाप्रमाणे माना, त्यांच्यावर जुलूम करू नका, त्यांचा नाश करू नका, आपल्या शरीराचा प्रत्येक अवयव आपल्या ताबा ठेवा, कुमार्गाच्या विचारांचा त्याग करा व सन्मार्गने जा, दुसर्‍यानां पायदळी तुडवून स्वतः उच्चपदी चढू नका, दु:खिताला सुख द्या आणि त्याला
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आपला मित्र माना."

"राजशाही बडेजावस अधिक महत्व देऊ नका, किंवा तोंडपुजा करणार्‍यांची गोड शब्दात केलेली स्तुती ऐकू नका."
"तपश्चर्येने स्वतःला क्लेश करून घेण्यात काहीही लाभ नसते म्हणून धम्माचे चिंतन करा व सदाचारणाच्या नियमांचे महत्व ओळखा."

"सर्व शहाणे लोक शारीरिक सुखोपभोगांची
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एक बार एक आदमी तथागत गौतम बुद्ध के पास पहुँचा। उसने पूछा "भगवान मुझे यह जीवन क्यों मिला, इतनी बड़ी दुनिया में मेरी क्या कीमत है?"

बुध्द उसकी बात सुनकर मुस्कुराए और उसे एक चमकीला पत्थर देते हुए बोले "जाओ, पहले इस पत्थर का मूल्य पता करके आओ, पर ध्यान रहें, इसे बेचना नहीं,
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सिर्फ मूल्य पता करना है।"

वह आदमी उस पत्थर को लेकर एक आमवाले के पास पहुँचा और उसे पत्थर को दिखाते हुए बोला "इसकी कीमत क्या होगी?"

आमवाला पत्थर की चमक देखकर समझ गया कि अवश्य ही यह कोई कीमती पत्थर है, लेकिन वह बनावटी आवाज में बोला, 'देखने में तो कुछ खास नहीं लगता, पर मै
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इसके बदले दस आम दे सकता हूँ।'
वह आदमी आगे बढ़ गया। सामने एक सब्जीवाला था। उसने उससे पत्थर का दाम पूछा। सब्जीवाला बोला 'मैं इस पत्थर के बदले एक बोरी आलू दे सकता हूँ।'
आदमी आगे चल पड़ा। उसे लगा पत्थर कीमती हैं, किसी जौहरी से इसकी कीमत पता करनी चाहिए। वह एक जौहरी के दुकान
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#मेस_आयनक

अफगाणिस्तान मधील काबुल शहरा पासून सुमारे ४० किलोमीटर वर दक्षिणपूर्वला लॉगर प्रांतात #मेस_आयनक आहे.

स्थानिक दारी भाषेत #मेस_ऐनक म्हणजे #तांब्याचा_डोळा. जगातील सर्वात मोठय़ा तांब्याच्या खाणी येथे आहेत.

अफगाणिस्तान आणि बौद्धांनाही ऐतिहासिक, सांस्कृतिक आणि
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अध्यात्मिक क्षेत्रातील महत्त्वाचे केंद्र आहे.

बौद्ध धर्म मेस आयनक मार्गे चीन व रोम साम्राज्यात पोहचला. कारण हे सिल्क रोडवरील मध्यवर्ती अतिशय महत्त्वाचे ठिकाण होते.

२०१० - ११ उत्खननात ३/६ शतकातील १०० एकर मध्ये स्तूप व विहार असलेले बौध्दाचे धर्मीक स्थळ होते.
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चित्र क्रमांक एक, दोन, तीन यातील शिल्प ही मेस आयनक येथे उत्खननात मिळाली आहे. सध्या हि शिल्प नॅशनल म्युझियम ऑफ अफगानिस्तान मध्ये आहे.
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चित्र क्रमांक तीन व मेस आयनक उत्खनन स्थळ अफगाणिस्तान.

#अजय_पवार ,जळगाव.
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#वर्षावासाची_तिसरी_पौर्णिमा

भाद्रपद पौर्णिमा म्हणजे पोट्ठापाद मासो पुन्नमि

वर्षावासचा आरंभ आषाढी पौर्णिमेपासून होतो आणि समाप्ती अश्विन पौर्णिमेला होतो. या चार पौर्णिमांमध्ये 'भाद्रपद पौर्णिमा' ही तिसरी आहे.

या वर्षावासचा काळात भिक्खूगण एकाच ठिकाणी राहत या काळात ते
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बुध्द धम्म तत्त्वज्ञानाचे विचारांवर चिंतन मनन करीत असतात.

पावसाळ्यात है भिक्खू इकडे तिकडे फिरत ओले गवत तुडवितात, त्यामुळे गवतातील बारीकसारीक जीव जंतूंचा नाश होतो, असे लोक टीका करू लागले. ही गोष्ट जेव्हा तथागतांना कळाली तेव्हा भिक्खूनी वर्षाकाळी एकाच ठिकाणी राहावे, असा
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त्याने नियम केला.

तथागतांनी आषाढी पौर्णिमेच्या दिवशी वर्षावासाला सुरुवात व्हावी असा नियम केला. वर्षावासाला सुरुवात झाल्यानंतर भिक्खूनी तीन महिने एका ठिकाणी राहिले पाहिजे.

वर्षावासाच्या तीन महिनाच्या काळात भिक्खू आंतरिक शुध्दी आणि मनोविकासाचा कसून प्रयत्न करतात.
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#सरदार_स्तूप

अफगाणिस्तान मधील गझनी शहराजवळ #दस्त_ए_मनारा टेकडीवर सरदार स्तूप आहे.

१९६० ते १९७० मध्ये इटालियन पुरातत्व विभागाने येथे उत्खनन केले होते. २००३ जिओव्हानी वेरार्डी यांच्या मार्गदर्शनाखाली पुन्हा उत्खनन सुरू करण्यात आले आणि आणि पुन्हा सुरक्षा कारणास्तव
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थांबवण्यात आले.

या जागेवर सापडलेल्या मातीच्या भांड्यावर एक शिलालेख होता. त्या भांड्यावर #कनिष्क_महाराजा_विहार असे लिहले आहे. या शिलालेखवरून सिध्द होते की, येथे २/३ शतकात कुशाणाचे सम्राज होते. या स्थानकावरील स्तूप, विहार व शिल्प यांची अगोदर तोडफोड करण्यात आली मग
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हे जाळण्यात आले.

येथे केलेल्या उत्खननात २/३ शतकातील जळालेले अवशेष व भग्न अवशेष मिळाली आहेत.

चित्र क्रमांक एक शिल्पांची प्रदर्शनी व तपासणी.

चित्र क्रमांक दोन #कनिष्क_महाराजा_विहार उल्लेख असलेल्या मातीच्या भांड्याचे अवशेष.
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#नरेंज_स्तूप

अफगाणिस्तान मधील काबुलच्या परिसरातील दक्षिणेस झानबुरक टेकडीवर पहिल्या शतकातील स्तूप व विहार होते. या जागेत एक मोठा व पाच लहान स्तूप होते. यात पाच ध्यान अवस्थेतील पाच बुध्द मुर्त्या सापडल्या आहेत.

चीनी यात्री तांग सझाग याने सातव्या शतकात या स्तूपाला भेट
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दिली होती असे त्याने #जर्नी_टु_दवेस्ट या पुस्तकात नोंद केली आहे.

२००८ मध्ये काबुल पुरातत्व संस्थेने उत्खनन स्थळावरील सर्व शिल्पे व इतर अवशेष एकत्र केले आहेत.
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सदर सर्व चित्रे हि नरेंज स्तूप व विहारांची आहेत.
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#अजय_पवार ,जळगाव. ImageImage
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#कपिसा

आत्ताचे बग्राम शहर व पुर्वीचे कपिसा हे अफगाणिस्तान मधील प्रसिद्ध बौद्ध शहर होते. या प्रांतात १०० संघाराम व ६००० भिक्खू होते. या प्रांतावर सम्राट कनिष्काच्या अधिपत्याखाली होता.

दक्षिण-पूर्वेला राहुल संघाराम आहे. याच्या जवळ १०० फुट उंच एक स्तूप आहे.
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पश्चिमोत्तर एक मोठी नदी असुन पुर्वी एका राजाने येथे एक संघाराम बांधला आहे व त्यात तथागतांचा एक दात होता.

दक्षिण पश्चिम एका संघारामात बुध्दांच्या शिर धातू असुन जवळ एक सोन्याच्या मुलमा असलेला एक १०० फुट उंच स्तूप एका राणीने बांधला आहे.
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पश्चिम दक्षिण सम्राट अशोकाने एका टेकडीवर १०० उंच एक स्तूप बांधला आहे. हा स्तूप #पीलुसर_स्तूप म्हणुन प्रसिद्ध होता. या स्तूपात बुध्दांचे एक शेर शरिर धातू आहेत अशी मान्यता होती.
संदर्भ - हुएगसांग की भारत यात्रा

चित्र क्रमांक एक टोपदारा स्तूप कपिसा अफगाणिस्तान याची दुरूस्ती
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#बुध्द_आणि_बोधीवृक्ष

ज्ञान प्राप्ती नंतर तथागत एक आठवडा म्हणजे सात दिवस #बोधीवृक्षाचे निरिक्षण, धम्मावर मनन चिंतन करत होते.

या शिल्पात तथागत #बोधीवृक्षाकडे पाहत #संम्बोधी प्राप्तीचा आनंद त्याच्या चेहऱ्यावर जाणवत आहे. हे एकमेव शिल्प आहे ज्यात तथागत गंभीर नसुन आनंदी
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जणू दु:ख मुक्त. या शिल्पात तथागतांचे स्वरूप हे #बोधीवृक्ष एवढे म्हणजे त्यांचे ज्ञान हे कुठल्याही चौकटीत न बसणार म्हणजे या जगाच्या चौकटीपेक्षा कितीतरी पटीने खूप मोठे आहे.

डाव्याबाजूच्या कॉलम मध्ये #धुळीचे_भेट तर उजव्यात #दिपंकर जातक कथा असुन त्या कॉलमवर सुंदर तोरण आहे.
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दोघबाजूला घुबड चित्रीत असुन तथागतांच्या मागे वज्रपाणी आहे. यातील दोन्ही जातक कथा पुढील पोस्ट मधे देणार आहे. हे संपुर्ण शिल्प एकमेकात गुंतलेले आहेत.

खालील भागात दोन्ही बाजूंना ध्यानस्थ बुध्द तर वेगवेगळ्या मुद्रातील तथागत आहे.
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#बामियान

अफगाणिस्तान पूर्वोत्तर पहाडी भाग म्हणजे #बामियान खोर्‍यात बुध्दांची दगडात कोरलेली एक १४० - १५० फुटाची उभी मुर्ती आहे. भंन्ते हुएगसांगने अशी नोंद केली आहे की, हि मुर्ती सोनेरी रंगांची असून याला सुंदर बहुमुल्य रत्न जडीत आभूषणांनी सजवण्यात आले होते.
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याच्या पुर्वेला एक संघाराम यात बुध्दांची १०० फुटाची धातुची मुर्ती आहे ह्या मुर्तीचे अवयव वेगवेगळे बनवून मग जोडण्यात आले होते. अश्याप्रकारे हि मुर्ती बनवण्यात आली होती.

चंगेज खान, बाबर, औरंगजेब यांनी मुर्ती तोडण्यासाठी तोफगोळ्याचा वापर केला होता. तसेच पर्शियन राजा नादर
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अफशर याने देखील तोफ डागण्याचा प्रयत्न केला होता. अफगाणचा राजा अब्दुर्रहमान खान याने लष्करी मोहीमे दरम्यान बुध्दाचा चेहेरा नष्ट केला होता.

शेवटी तालिबानी दहशतवाद्यांनी २००१ मध्ये इसवी २/३ शतकातील १५० फुटाची बुध्दांची उभी मुर्ती हळूहळू डायनामाईटने नष्ट केली.
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#अजय_पवार ,जळगाव.
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#नवसंघाराम

बल्ख नगरच्या दक्षिण-पश्चिम दिशेस #नवसंघाराम नावाचे एक स्थान आहे. याच ठिकाणी एक संघाराम होता. यालाच #नवसंघाराम म्हणत. या स्थानावर बुध्दांची रत्न जडीत एक सुंदर मुर्ती होती. नवसंघारामाच्या आत मध्ये दक्षिणी भागात बुध्दांचे हात धुण्याचे सोन्याचे पात्र व बुध्द
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वापरत असलेला झाडू दोन फूट लांब, सात इंच गोल याच्या मुठेला रत्नांनी सजवण्यात आले होते तसेच मध्यभागी बुध्दांचा दात ठेवलेला होता. प्रत्येक पौर्णिमेला यांची पुजा केली जाते होती.

नवसंघारामाच्या उत्तरेस एक स्तूप २०० फूट उंच असून यात बुध्दवशेष ठेवलेले होते.
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सदर चित्रे हि #नवसंघाराम व स्तूपाची अवशेष अफगानिस्तान बल्ख प्रदेशातील आहे. हे सिल्क रोडवरील महत्त्वाचे स्थान होते.

#अजय_पवार ,जळगाव.
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#दरोडेखोर_अंगुलीमालची_दिक्षा

श्रावण पौर्णिमा म्हणजे "सावन्त मासो पुन्नमि"

या शिल्पात दरोडेखोर अंगुलीमाल तथागतांना तलवार मारण्याचा प्रयत्न करतांना दिसत आहे. पण तथागत शांत, स्वच्छ, निर्मल, गंभीर, करुणामय नजरेने अंगुलीमाला कडे बघत आहे. डाव्या बाजूला एक उपासक अश्चर्याने
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अंगुलीमाला कडे बघत आहे. मागे नेहमीप्रमाणे अदृश्य स्वरूपात तथागतांचा रक्षक वज्रपाणी आहे.

तथागत, "अंगुलीमाल मी तुझ्यासाठी थांबलेला आहे. दुष्कार्म करण्याचा आपला व्यवसाय तु सोडून देशील काय ? तुला आपलासा करावा, सदाचारणाच्या मार्गावर तुला आणावा म्हणून मी तुझ्या मागोमाग
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आला आहे. तुझ्यातील साधुत्व अजुन मेलेले नाही. जर त्याला तू संधी देशील तर त्यामुळे तुझ्यात बद्दल घडवून येईल."

अंगुलीमाल, "आपण आपल्या दिव्य वाणीने मला आपल्या दुष्कर्माचा त्याग करावयास सांगत आहात म्हणून मी तसा प्रयत्न करावयास तयार आहे."

ज्या दिवशी अंगुलीमालला धम्मदिक्षा दिली
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