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Sep 9, 2020, 7 tweets

#आयुष्मान्_यश

ईसापूर्व ५२८ भगवान के धम्म में प्रविष्ट होने वाले यश छटे भिक्षु थे। पंचवर्गीय भिक्षुओं की उपसंपदा के पश्चात श्रेष्ठी पुत्र यश तथागत के पास प्रव्रजित हूए।

धनवान यश कुमार के पास सब था किंन्तु कितना भी धन हो और उसके द्वारा कितने भी सुख साधन क्यों न प्राप्त
1)

किये जाएं परंतु मानसिक शांति किसी भी प्रकार धन देकर खरीदी नहीं जा सकती। यश कुमार के पास सब होने के बावजूद मानसिक शांति, मन की स्थिरता नहीं थी।

धन और उनके माध्यम से प्राप्त किये गये भौतिक सुख के साधनों से यश घिरा रहने पर भी उनके मन में एक प्रकार की अशांति, उदासीनता छाई
2)

हुई थी। उन्हें अपने अंतर मन में किसी वस्तु का अभाव सा जान पड़ता था किंन्तु वह किस प्रकार का अभाव है उसका चित्र उनके सम्मुख स्पष्ट नहीं था।

व्यक्ति परिवर्तनवादी होता है। यश कुमार अपने जीवन में परिवर्तन लाना चाहते थे। वह परिवर्तन किस प्रकार का हो इसका उन्हें ज्ञान नहीं था।
3)

वे आँधी और तूफ़ान से भरे ह्रदय के साथ प्रासाद से बाहर निकले। उनके पैर अपने आप ऋषिपतन की रमणीय भूमि की ओर बढ़े।

भगवान के समीप पहूँच यश के मुख से अपने आप दुःखभरी आह निकली "हा ! संतप्त !! हाय......! पीड़ा !!"
तथागत ने यश को सांत्वना दी - "यश यहाँ संतप्तता नहीं है।
4)

यहाँ पीड़ा नहीं है। यहाँ आओं और सुखपूर्वक बैठ जाओ।"

जब भगवान ने यश का चित्त स्थिर और धम्म बोध करने लायक पाया तो उन्होेंने विमुक्ति मार्ग का उपदेश दिया। संक्षेप में भगवान ने धम्मदेसना दी -- दुःख है, दु:ख समुदाय हैं, दु:ख का निरोध हो सकता है और दु:ख निरोध का मार्ग है।
5)

इसी प्रकार यश के पिता श्रेष्ठी सर्व प्रथम त्रिसरण के उपसाक हुयें तथा उनकी माता और पूर्व पत्नी त्रिसरण ग्रहण कर के सर्वप्रथम उपासिकाये बनी थी।

यश के बारे में स्वयं भगवान द्वारा अकसर कहा जाता था कि यश गृहस्थ जीवन में महान सुख का जीवन व्यतीत करने वाले थे।
6)

कहा जाता है कि यश जहां भी जाते थे तो उनके स्वागत के लिए स्वर्णमय आच्छादन प्राप्त होता था और बड़ा सम्मान मिलता था।

यह बुध्द शिल्प अजंता गुफा में का है।
7)

#अजय_पवार ,जलगांव।

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