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Sep 11, 2020, 7 tweets

#भंन्ते_महाकात्यायन

ईसापूर्व ५२७ भगवान ने भिक्षु-परिषद में घोषणा की थी, "संक्षिप्त उपदेश को विस्तृत कहने वालों में महाकात्यायन प्रमुख है।"

उनके पिता तिरिहिवच्छ उज्जैनी में चण्डप्रद्योत राजा के दरबार में मंत्री थे। उनकी माता का नाम चंदिमा था। अपने पिता
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के देहांत के पश्चात वे राजा चण्डप्रद्योत के दरबार में मंत्री बने।

भगवान बुध्द की किर्ती गाथा अवंति राज्यतक पहुँच चुकी थी।राजा की भगवान दर्शन कि बेहद इच्छा हुयी। राजाने अपने मंत्री कात्यायन को अन्य सात मंत्रीयो के साथ भगवान को उज्जैनी लाने को भेजा।
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कात्यायन के आठ व्यक्तियों का मण्डल भगवान के पास पहुँचा। उन्होंने भगवान का उपदेश सुना उपदेश सुनते ही उन्हें विमुक्ति प्राप्त हुयी। वे सब भगवान के पास प्रव्रजित हूये। कात्यायन ने राजा के निमंत्रण की भगवान को याद दिलाई परंतु भगवान साथ नहीं गये। उन्होंने कात्यायन को ही भेजा।
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भगवान ने उन्हीं को जाना पर्याप्त समझा।

उज्जैनी पहुंच महाकात्यायन राज्य के उद्यान में ठहरे। वहां राजा ने उनकी हर प्रकार व्यवस्था की थी। वहीं उन्होंने लोगों को उपदेश दिया। उन्होंने अपने उपदेशों से लोगों बड़ा प्रभावित किया। कई तरुणों ने उन से प्रव्रज्या प्राप्त की।
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उज्जैनी नगर में जहां तहां भिक्षु दिखाई देने लगे। अवंति में महाकात्यायन ने बौद्ध धर्म स्थापन कर दिया।

तथागत का उपदेश सुन भिक्षु लोग अधिक जानकारी प्राप्त करने महाकात्यायन के पास जाते जिनमें वल्लिय स्थविर थे जो कात्यायन
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के नेतृत्व में प्रव्रजित हूये थे।

वे खास तौर पर कुररघर-प्रपात और मक्करकट बन कुटी में विहार करते थे। वे कभी कभी मधुरा के गुष्ठावन मे, तपोदावन राजगृह में, तथा सोरयय, कोशंबी में विहार करते थे।

कहा जाता है कि अवंति में रहते समय भी वे
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लम्बा रास्ता तय कर के नियमित रूप से भगवान का उपदेश सुनने जाया करते थे। कभी पहुंचने में उन्हें देरी हो जाती तो प्रधान शिष्यों के बीच उनके लिये स्थान सुरक्षित रहता।
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#अजय_पवार ,जलगांव।

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