#महाकाश्यप_भद्दकपिलानी
एक दिन पिप्पली खेत पर गये। उस समय मजदूर खेत में हल चला रहे थे। हल से फटी हूई जमीन में से बरसाती किडे बाहर निकल आये थे जिनको हलों के पीछे उड़ने वाले पक्षी खा रहे थे। यह प्रकृति का खेल पिप्पली ने देखा। उनसे कहा गया और उन्होंने स्वीकार किया कि इस पाप
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का उत्तरदायित्व उन्ही पर है। इससे उनके मन में पश्चाताप होने लगा। सारी भौतिक वस्तुये त्याग देने का उन्हों ने उसी समय निश्चय किया।
इधर घर में भद्दकपिलानी उन कौवों देख रही थी। जो धूप में सुखते तील से किडे खा रहे थे। पूछने पर उसकी दासी ने बताया कि इन किडो के हत्या का पाप उसी
2)
को हो रहा है तो उसने भी गृहत्याग का संकल्प लिया।
दोनों का एक ही संकल्प था। उन्होंने एक दूसरे के बाल काटें काषाय वस्त्र पहने और हाथ में भिक्षापात्र ले विलापते दास दासियों को छोड़ घर से निकाल पड़े। उन्होंने सब दास दासियों को मुक्त कर दिया तथा अपना धन उनमें बांट दिया।
3)
पिप्पली आगे आगे और भद्दकपिलानी उनके पीछे पीछे चल रही थी। कुछ दूर जाने पर दोनों को अनुभव हुआ कि दोनों को साथ यात्रा करना योग्य नहीं है। भिन्न दिशाओं में जाना दोनों तय किया। एक चौराहे पर पिप्पली ने दाहिने तरफ जानेवाला मार्ग पकड़ा और भद्दकपिलानी ने बाई ओर का
4)
दोनों ने भिन्न दिशाओं में प्रस्थान किया।
कहा जाता है कि जब दोनों पति-पत्नी चौराहे से अलग हुये तो धरणी कंपित हुई थी। उस समय भगवान बुद्ध वलुवन की गंधकुटी में विराजमान थे। भूकंप का कारण
5)
जान भगवान आसन से उठ कर कुछ दूर तक गये। वे नालंदा और राजगृह के बीच निग्रोध के नीचे बैठ गये।
यह महाकाश्यप शिल्प आठवीं शताब्दी चायना में का है।
6)
#अजय_पवार ,जलगांव।
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