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Sep 19, 2020, 5 tweets

#तथागत_और_महाकाश्यप

भगवान और महाकाश्यप राजगृह के लिये रवाना हुये। नगर के पास जाकर भगवान ने एक वृक्ष की छाया में बैठने की इच्छा प्रकट की। काश्यप ने अपना उत्तरासंध का आसन बनाया और वृक्ष के नीचे बिछा दिया। भगवान पीछे आसन पर बैठ गये। संघाटी को हाथ से स्पर्श कर भगवान ने
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मृदुलता से उसकी प्रशंसा की। काश्यप ने संघाटी को स्वीकार करने की भगवान से प्रार्थना की।

भगवान ने पूछा — "तुम क्या पहनोंगे ? "
उन्होंने भगवान के जीर्ण चीवर की याचना की।
"किंन्तु यह जीर्ण हुआ है और फट गया है" भगवान ने कहा।
काश्यप ने पुनः याचना की — "सारे संसार से
2)

भी यह मेरे लिये कीमती हैं।"

भगवान ने अपना पुराना चीवर काश्यप को दिया और उन्हीं ने अपना नया चीवर भगवान को प्रदान किया। काश्यप के इस महापुन्य के कारण धरती कांप गई थी क्योंकि भगवान द्वारा इस्तेमाल की हुई वस्तु साधारण आदमी इस्तेमाल नहीं कर सकता था।
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धूतांग व्रत धारण कर काश्यप ने आठ दिनों में ही तृष्णा का क्षय कर अर्हंत पद को प्राप्त किया। कहा जाता है कि बत्तीस महापुरुष लक्षणों में से उनके शरीर पर छ: लक्षण विद्यमान थे।

प्रथम भेट में ही भगवान ने महाकाश्यप को अपना चीवर दिया था। इससे उनके प्रति भगवान की आस्था प्रदर्शित
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होती है। महाकाश्यप ने इस घटना को बड़े अभिमान के साथ हमेशा याद रखा। कहा जाता है कि महाकाश्यप भगवान के पश्चात धम्म संगीति करवायेंगे यह भगवान जानते थे।

७/८ शताब्दी का यह महाकाश्यप का शिल्प #मोगाओ_गुफा चायना ।
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#अजय_पवार ,जलगांव।

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