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Artha funds Dharma. Dharma fuels Bhakti. Bhakti builds the Mandir. And the Mandir belongs to Him.

Aug 15, 2022, 31 tweets

“सम्पादक चाहिए- वेतन दो सूखे टिक्कड़ और एक गिलास ठंडा पानी। हर सम्पादकीय लिखने पर दस वर्ष काले पानी की सज़ा।”

यह है एक ऐसे समाचार पत्र की कहानी जिसका कोई सम्पादक जब जेल जाता था तो उस समाचार पत्र में यही विज्ञापन छपता था।

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान प्रकाशित होने वाली पत्र-पत्रिकाओं के संपादक, प्रकाशक एवं मुद्रकों को किसी का सहारा नहीं था। संसाधनों और संरक्षण दोनो की मारामारी थी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कोई मायने नहीं थे। इन सबके बावजूद पत्रकारिता ‘व्यवसाय’ नहीं ‘मिशन’ के रुप में की जाती थी।

लक्ष्य सिर्फ एक था,देश को गुलामी की जंजीर से आज़ाद करना।स्वराज्य वही समाचार पत्र है जहाँ से उत्तर-प्रदेश में क्रांतिकारी प्रचार और प्रयास का सूत्रपात हुआ था।

इसके कर्ताधर्ता, अंग्रेज़ों की सेना में रहे, लाहौर निवासी, संपादक श्री शांति नारायण भटनागर थे।

यह वह समय था जब इलाहाबाद देश की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में अपनी जगह बना रहा था। क्रांतिकारी गतिविधियाँ अपना सिर उठाने लगी थीं।
यह सोचते हुए शांति नारायण ने 1907 की दीपावली पर इलाहाबाद में स्वराज्य का प्रकाशन शुरू करने का निर्णय लिया था।

दीपावली के पहले ही मांडले जेल में बंदी बनाये गए लाला लाजपतराय और सरदार अजीत सिंह की रिहाई हुई थी। शांति नारायण ने ऐलान किया कि "स्वराज्य" का प्रकाशन उस रिहाई की खुशी में किया जा रहा है।

फौज की नौकरी छोड़ देने के बाद शांति नारायण की पत्नी अपनी ससुराल से अपने पति के मिशन के लिए अपने कुल जेवर 1000 रुपये में बेच कर वापस आ गयी थीं। पूरी तैयारी करते हुए लाहौर से निकलने के पहले ही शांति नारायण जी ने स्वराज्य के पोस्टर छपवा लिए थे।

अपनी इस यात्रा के दौरान उनके रास्ते में जितने बड़े शहर आये, शंतिनारायण रायज़ादा “स्वराज्य” के पोस्टर चिपकाते हुए इलाहाबाद पहुँच गये।

इलाहाबाद पहुंचकर उन्होंने जानसनगंज में एक किराये का मकान और प्रेस का इंतजाम कर ठीक दीपावली के मौके पर स्वराज्य का पहला अंक निकाल दिया था।

"स्वराज्य" का नारा था -
"हिंदुस्तान के हम हैं, हिंदुस्तान हमारा है."

"अखबार के ऊपरी हिस्से पर "भारत माता" की तस्वीर होती थी, दोनों तरफ शेर थे, शेरों के हाथों में ताज था और यह ताज वे भारतमाता के सिर पर रख रहे थे।"

शांति नारायण ने जिस दिन 'स्वराज्य' निकाला, उसी दिन से उन्हें पता था कि गिरफ़्तारी होने में अब देर नहीं हैं।

अपनी गिरफ्तारी के बाद के लिए एक दूसरा संपादक की तलाश उन्होंने तुरंत शुरू कर दी थी।

शांति बाबू का समाचार पत्र शुरू से ही सरकार विरोधी था, किन्तु खुदीराम बोस की फाँसी के बारे में एक लेख के कारण एक दिन शान्ति बाबू को तीन वर्षों का सश्रम कारावास सुना दिया गया।
उन्होंने लिखा था-
"बम क्यों चला?"
फिर खुद ही उसका जवाब देते हुए लिखा -
"इसलिए कि रियाया तंग आ रही थी..."

शांति बाबू ने अपने इस लेख में एक नज़्म भी कही थी कि खुदीराम की मां विलाप करते हुए कहती है -

"इस तरह फांसी पर चढ़ कर जान दी,
क्या तुम्हें पाला था इसी दिन के लिए?"

इस नज़्म के लिए शांति नारायण जी को 17 अप्रैल 1908 को गिरफ्तार कर लिया गया था।

8 अप्रैल 1908 को उन्हें अदालत में पेश किया गया। जब पंडित मदन मोहन मालवीय ने यह सुना तो उन्होंने बाबू पुरुषोत्तमदास टंडन को शांति नारायण का वकील बनाकर भेजा था।

शांति नारायण कहाँ झुकने वाले थे?
शांति बाबू ने मजिस्ट्रेट से साफ-साफ कह दिया कि -
"मैंने अपने मुल्क के लिए जो कुछ बेहतर समझा वह किया है अब आप अपने मुल्क के लिए जो कुछ बेहतर समझें वही करें."

स्वराज्य प्रेस को जब्त कर सरकार ने प्रेस को बंद करा दिया। लेकिन शांति जी के साथी कहाँ मानने वाले थे? नया प्रेस खोल खुला और स्वराज्य फिर शुरू हो गया था।

अब समाचार पत्र की कमान संभाली थी होतीलाल वर्मा और बाबू राम हरी ने। सरकार ने समाचार पत्र के खिलाफ़ दोबारा कार्यवाही की।

इस बार निशाना थे होतीलाल जिनको को दस वर्ष सज़ा सुनाने के बाद अंग्रेज़ चैन की साँस लेने ही वाले थे कि बाबूराम हरि सामने आ गए जो उस समय महज सत्रह -अठारह वर्ष के नौजवान थे।

अल्हड़,खिलंदड़, जोशीले बाबूराम हरि के संपादकीय में 'स्वराज्य' के केवल दो अंक निकल पाए।

बाबू राम हरि ने जैसे ही यह नज़्म छापी, उन पर भी गाज आ कर गिर गयी

उन पर भी वही दफ़ाएँ लगाई गई थीं जो शान्ति बाबू पर काबिज हुई थी। डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट मैकनेयर वही था जो शांति बाबू के केस में बैठा था। वो हैरान था और उसे विश्वास नहीं हुआ कि इस मासूम नौजवान के खिलाफ ब्रिटिश सरकार को उलटने की साजिश का इल्ज़ाम लगाया गया है।

मगर फौरन ही उस को समझ आ गया कि जिसे वो मासूम समझ रहा है उसके सीने में अंग्रेज़ों के खिलाफ बदले की आग सुलग रही है। बाबू राम ने अपने मजिस्ट्रेट से अपने बयान में कहा -

"जब तक हिंदुस्तान गुलाम है तब तक हिंदुस्तान के हर बाशिंदे का यह फर्ज़ है, खासकर हिंदुस्तान के नौजवानों का कि वह हर मुमकिन तरीकों से विदेशी हुकूमत को उखाड़ फेंकने की कोशिश करें और इस कोशिश में अपने आपको फना कर देने के लिए तैयार रहें....."

मुकदमा पूरा हुआ और हरी को 7 बरस के कालापानी की सजा सुना दी गयी। जेल में उनका किसी से झगड़ा हो गया तो मजिस्ट्रेट ने उनकी सजा और बढ़ा दी।
सजा सुनने पर हरी मायूस थे। झगड़ा करने का कोई फ़ायदा नहीं हुआ था..

उन्होंने पूछा कि इतनी कम सजा उन्हें क्यों दी गई है जबकी जो धारा उन पर लगाई गई है, मजिस्ट्रेट उन्हें फाँसी की सजा दे सकता था. फिर क्यों उन्हें सिर्फ कालापानी की सजा मिली?

मजिस्ट्रेट उनका मुँह देखता रह गया था..

इतने पर भी बाबूराम हरी नहीं माने थे।

अदालत से चलते वक्त मजिस्ट्रेट पर उन्होंने यह शेर जड़ दिया था -
"आह! सय्याद तू आया मेरे पर काटने को,
मैं तो खुश था कि छुरा लाया है सर काटने को"

बाबू राम अंडमान जा चुके थे लेकिन अब मुंशी रामसेवक सामने आ गए थे। सरकार को जब मुंशीराम के बारे में पता चला उसी दिन उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया।
गिरफ़्तारी के बाद कलेक्टर ने ऐलान कराया कि कोई और है स्वराज्य की गद्दी सँभालने के लिए तो वो भी सामने आकर अपनी इच्छा पूरी कर सकता है।

घमंडी कलेक्टर को धता दिखाते हुए इस बार देहरादून के नन्दगोपाल चोपड़ा सामने आये थे। वो बारह अंक ही निकाल पाये थे कि उन्हें भी तीस सालों की सज़ा सुना दी गयी।अंग्रेज़ों को अब उम्मीद हो चली थी कि कोई आगे आने की हिम्मत नहीं करेगा लेकिन एक नहीं, इस बार बारह लोग सरकार के सामने खड़े थे।

जान-जहान, माँ-बाप, परिवार सभी को तिलांजलि देकर वो सभी बारह लोग सम्पादन के लिए तैयार थे। अब इस बार पंजाब के फील्ड मार्शल कहे जाने वाले लद्धा राम कपूर ने सम्पादन की ज़िम्मेदारी उठायी थी।

कपूर साहब तीन ही सम्पादकीय लिख पाये थे कि उनको भी प्रति सम्पादकीय दस वर्ष के तौर पर तीस वर्षों की सज़ा सुना दी गयी।
अब बारी अमीर चन्द्र जी की थी। वो सम्पादक बने लेकिन 1910 तक आते-आते, महज ढाई वर्ष में ही स्वराज्य बंद हो गया।

अंग्रेजी सरकार के खिलाफ़ आग उगलने वाले संपादकों ने सरकारी चेतावनियों के बावजूद हार नहीं मानी थी। अपनी कलम को बिकने नहीं दिया था, हार नहीं मानी थी और जान पर खेलकर अंग्रेजी सरकार के ज़्यादतियों के खिलाफ़ बिना रुके लिखते ही रहे।

हिंदुस्तान के हम हैं हिंदुस्तान हमारा है जैसा नारा देने वाले शांति लाल जैसे पत्रकारों के लिए ही महादेवी वर्मा ने कहा होगा कि पत्रकारों के छालों से ही इतिहास लिखा जायेगा।

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