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Jun 1, 2020 6 tweets 3 min read Read on X
हमारी प्रकृति की अपनी राजनीति और सरवाइवल की तकनीकें हैं। आज जो उसकी स्थिती है, उसमें उसे अपनी ही कृति से अपना अस्तित्व बचाना है। इस कारण उसने हमारे लिए कुछ आपदाओं का प्रबंध किया है। कुछ बीमारियाँ, कुछ तूफ़ान बनाए हैं। जिन्हें वो एक-एक करके यहाँ भेज रही है।

#CycloneNisarga
कुछ समय पहले एक वायरस ने हमें अपनी औकात याद दिलायी और अभी भी दिला रहा है। फिर एक तूफ़ान ने हमारे इतने बड़े शहर की चूलें हिला दीं। फिर एक टिड्डों का तूफ़ान आया और लोगों को दुनिया किसी बिबलिकल कहानी की तरह लगने लगी।

एक-एक करके प्रकृति ने हमें कई तमाचे लगाए।

#CycloneNisarga
काफी संभावना है कि अगले कुछ दिनों में एक तूफ़ान महाराष्ट्र के तटीय इलाकों, ख़ासकर मुंबई से टकराने वाला है।

ये अम्फान से थोड़ा कम ख़तरनाक होगा लेकिन ये कोई राहत की बात नहीं लगती है क्यूँकि अम्फान से थोड़े कम का मतलब भी काफ़ी होता है।

#CycloneNisarga
मैं जहाँ रहता हूँ, वहाँ समुद्र मेरे घर के लगभग चारों तरफ़ है। ये बात अब तक ख़ूबसूरत बात थी और उम्मीद है कि तूफ़ान के गुज़रने के बाद भी ख़ूबसूरत रहेगी। ये मीलों फैली हरियाली, अब किसी रास्ते की तरह दिखने लगी है। जिस पर तूफ़ान किसी मत्त ऐरावत की तरह दौड़ता हुआ आएगा।

#CycloneNisarga
अब मैं अपने बंगाल के दोस्तों से पूछ-पूछ कर नोट्स बनाने लगा हूँ कि तूफ़ान का सामना किस तरह किया जाता है। वो मुझे बता रहे हैं कि मुझे पानी जमा रखना चाहिए और पावर बैंक चार्ज कर लेना चाहिए। ये वो समय है, जब लोग एक दूसरे की मदद के लिए आपदा के अनुभव बाँट रहे हैं।

#CycloneNisarga
सबकुछ अब किसी कहानी की तरह लगने लगा है। शायद यही कारण है कि अब मुझ से कहानियाँ नहीं लिखी जा रही हैं। मैं बस अपने आसपास देख रहा हूँ और अब सबकुछ किसी कपोल कल्पना की तरह मेरे सामने घट रहा है।

ये साल सच में काफी कुछ सिखा के जा रहा है। कोई सीखे न सीखे ये बात अलग है।

#CycloneNisarga

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More from @PuneetVuneet

Apr 12, 2023
"बाघ पर मुक़दमा"

बाघ अदालत में आया
बहुत ही ज़्यादा घबराया
गुर्राहट तो क्या करता
वो बेचारा मिमियाया
भरी अदालत पूरी थी
लॉयर, जज और ज्यूरी थी
चला मुकदमा बाघ पे
जिसकी सरकारी मंज़ूरी थी

बाघ ने देखे चारों ओर
लोग खचाखच भरे हुए
खून भरा था आँखों में
पर भीतर से मरे हुए
बाघ कटघरे में, बाहर
हत्यारों का जत्था था
सबके हाथों में हथियार
बाघ ही एक निहत्था था
उसका चेहरा पीला था
लाल सभी का माथा था
गूँज रहीं थी साँसे बस
कोर्ट में झक सन्नाटा था
कार्यवाही फिर शुरू हुई
ऑर्डर की आवाज़ से
वकील ने टेबल ठोकी
फुल फ़िल्मी अंदाज़ से
उसने बोला गुस्से में
केस मेरा सुनिए मिलॉर्ड
चार पैर का चौपाया ये
समझ रहा है ख़ुद को गॉड
सरकारी जंगल में रहकर
फ्री का राशन खाता है
एक तो टैक्स नहीं भरता
फिर मर्ज़ी से गुर्राता है
जब चाहे ये जंगल में
करने को सैर निकलता है
इसका मर्ज़ी से जीना
देश की एक विफ़लता है
Read 10 tweets
Oct 23, 2022
विराट कोहली को मैं सिर्फ़ इस कारण पसंद नहीं करता, कि वो एक बेहतरीन क्रिकेटर है। मैं उसे पसंद करता हूँ कि वो अकेला सितारा क्रिकेटर है, जिसकी रीढ़ अब भी बाकी है। जिस तरह वो बिना डरे शामी के साथ खड़ा हुआ, जिसके ख़िलाफ़ सत्ता और मीडिया की ताकतें ज़हर उगल रही थी। #ViratKohli𓃵
वो किसान आंदोलन के समय, किसानों के साथ खड़े हो कर, एक बेहतर हल निकलने की उम्मीद जतायी। हाथरस की घटना में भी उसने क्रूरता को क्रूरता कहा और न्याय की माँग करी।

अपने देश के लोगों के लिये अपनी शोहरत को दाँव पर लगाना, हर किसी के बस की बात नहीं है। #ViratKohli𓃵
वो सिर्फ़ क्रिकेट के मैदान पर ही नहीं, इंसानियत के मैदान पर भी चैंपियन है। जो देश के लिये, सिर्फ़ प्रतिद्वंद्वियों के विरुद्ध ही नहीं, अपने देशवासी पर हुई नाइंसाफ़ी के विरुद्ध, सत्ता से भी लड़ जाता है। यही वो सच्चा देशप्रेम है, जो उसकी हिम्मत का रसायन है। #ViratKohli𓃵
Read 4 tweets
Aug 20, 2022
- बारहवीं सदी और इक्कीसवीं सदी -

बारहवीं शताब्दी में एक संस्कृत कवि हुए, जयदेव। हिन्दू धर्म की वैष्णव भक्ति परंपरा के इतने बड़े कवि कि उड़ीसा के अखण्डलेश्वर मंदिर में उनकी मूर्ति भी है।

क्या आप जानते हैं कि फ़िलहाल के एक बायकॉट से इनका क्या संबंध है? मैं आपको बताता हूँ।
फ़िलहाल में राधा-कृष्ण के एक चित्र पर बवाल मचा हुआ है। जिसमें वे रातिक्रिया में लीन हैं।

कुपढ़ों की जानकारी के लिए बता दूँ कि जयदेव की रचना 'गीत-गोविंद' में राधा और कृष्ण की कामक्रीड़ा की इस से भी अधिक व्याख्या है और इस रचना को जगन्नाथ पुरी मंदिर में सदियों से गाया जाता है।
ये बारहवीं शताब्दी की वो भक्ति कविता है, जिसे उस युग के कृष्ण भक्तों ने इतना सराहा कि ये संगीतबद्ध हुई, इस पर नाटक बने और चित्र भी बने।

क्यूँकि वो कृष्णभक्त कला का अर्थ और उसकी आवश्यकता समझते थे। वो स्त्री और पुरूष के प्रेम में कामुकता के सौंदर्यबोध को स्वीकार कर सकते थे।
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Sep 9, 2021
एक बार सम्राट अशोक बचपन में गिल्ली-डंडा खेल रहे थे। उनकी गिल्ली उड़कर अकबर के दरबार में जा गिरी। जब अशोक गिल्ली लेने गए तो अकबर ने मना कर दिया। अशोक ने चाणक्य से कहा। तो उन्होंने ने राजा शशांक को आदेश दिया कि वो दिल्ली से गिल्ली लाएँ।

शशांक को आता देख अकबर के पसीने छूट गए।
अकबर ने तुगलक को गिल्ली देते हुए कहा कि इसकी रक्षा करो। तुगलक ने वो गिल्ली कहीं छुपा दी। इस बात पर शशांक ने पूरे मुगल साम्राज्य का सफ़ाया कर दिया लेकिन उन्हें कहीं भी गिल्ली नहीं मिली।

जब अशोक बड़े हुए तो उन्हें तेनालीराम ने बताया कि तुगलक ने वो गिल्ली मोहम्मद गोरी को दे दी थी।
अशोक ने सेनापति मान सिंह से सलाह माँगी, तो उसने कहा कि उनके गुप्तचर इब्ने सफ़ी ने बताया है कि मोहम्मद गोरी ने वो गिल्ली चंगेज़ खान को सौंप दी थी। जिसने उसे कलिंग नाम की जगह पर छुपा दिया है।

फिर अशोक ने कलिंग पर चढ़ाई कर के वहाँ हिन्दू ध्वज फहराया और इस तरह मुगल साम्राज्य हारा।
Read 4 tweets
Sep 3, 2021
देश में इतनी बेरोज़गारी आ चुकी है कि हर इंसान अपनी नौकरी जाने के डर से अमानवीय परिस्थितियों में भी काम करने को तैयार है।

किसी को अगर कोई ग़लत काम करने को भी कहा जाएगा, तो भी वो विरोध करने से पहले दस बार सोचेगा कि क्या मुझे कहीं और काम मिलेगा?

ये यूँ ही नहीं है। सब सोचा समझा है।
किसी देश में इतनी भुखमरी और बेरोज़गारी पैदा कर दो कि इंसान पैसे के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाए। उस पर भी ऐसा देश जिसकी जनसंख्या ही 135 करोड़ से ऊपर है।

अब हर बेरोज़गार या तो इनके लिए आग या फिर ईंधन है। दोनों समाज में घृणा की आग फैलाएँगे और इनकी सत्ता फ़ैक्ट्री चलती रहेगी।
सरकारी कंपनियों को ख़त्म किया जा राह है, जिस से सरकारी नौकरियाँ ख़त्म हो जाएँगी। फिर रोज़गार और सुविधाएँ सरकारी ज़िम्मेदारी नहीं रह जाएंगी।

यूनियन तो कहीं है ही नहीं। तो जिस के पास पैसा है, वो जब चाहे जिसे नौकरी से निकाल देगा और उसके सामने सौ आदमी लाइन में खड़े होंगे।
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Sep 2, 2021
किन्हीं भी दो लोगों का धर्म या विचारधारा पूरी तरह से एक नहीं हो सकते।

ऊपर से तो आप पूरे स्कूल को एक ही ड्रेस पहना सकते हैं लेकिन उन सब के विचारों को एक नहीं कर सकते। आप उन्हें एक ही कहानी रता दीजिए लेकिन उनके मन के उसकी अलग ही तस्वीर होगी।

आखिरी सच केवल व्यक्तिगत सच है।
आज समाज में कई लोगों को आसान पहचानों में बाँधना मुश्किल होता जा रहा है। क्यूँकि लोग जान रहे हैं कि उनकी पहचान वह नहीं है, जो उन्हें रटाई गयी है।

राजनीतिक और सामाजिक पहचानें केवल शक्ति प्रदर्शन के काम आ सकती हैं। व्यक्ति की पहचान की यात्रा में वो केवल बाधक हैं।
जितना बड़ा सच ये है, उतना बड़ा सच ये भी है कि अधिकतर लोग इस यात्रा से डरते हैं। क्यूँकि अपनी निजी पहचान बनाना यानी खुद को इन शक्ति केंद्रों से काट लेना। फिर आप उस भीड़ का इस्तेमाल अपने हित में नहीं कर सकते।

उन्हें एक भीड़ में रहकर, दूसरी भीड़ से सुरक्षा महसूस होती है।
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