क्या अवतारों के भी प्रकार होते हैं? ये प्रश्न सदैव से हमारे मन में संशय उत्पन्न करता है। अवतार के विषय में कहा गया है - अवतरति इति अवतारः। अर्थात जो अवतरण करे अर्थ है कि जो ऊपर (दिव्य लोक) से नीचे (पृथ्वी लोक) पर आये, वही अवतार है।
पुराणों में अवतारों के प्रकारों के विषय में भी विस्तृत वर्णन दिया गया है। आइये इसे समझते हैं।
पुरुष अवतार: जब ईश्वर मनुष्य के रूप में अवतरित होते हैं तो उसे पुरुष अवतार कहा जाता है। हालाँकि ये भगवान विष्णु के अवतारों के लिए विशेष रूप से प्रयुक्त होता है
जो वास्तव में महाविष्णु का विस्तार रूप होता है।
विमावतार: जब भगवान स्वयं आते हैं तो वो विमावतार कहलाता है। विमावतार दो प्रकार के होते हैं:
साक्षात् अवतार: ये ईश्वर का साक्षात् रूप होता है, अर्थात ईश्वर अपनी समस्त क्षमताओं के साथ अवतरित होते हैं।
आवेश अवतार: आवेश अवतार में भी ईश्वर की शक्तियां निहित होती हैं किन्तु उतने स्पष्ट रूप में नहीं जितनी साक्षात् अवतार में होती हैं। आवेश अवतार भी दो प्रकार के होते हैं
शक्ति आवेश: इस अवतार में केवल ईश्वर की शक्ति आती है
रूप आवेश: इस अवतार में ईश्वर स्वयं प्राणी के रूप में आते है
अंशावतार: इस अवतार को कलावतार भी कहते हैं। पृथ्वी पर भगवान का अवतार अधिकतम १६ कलाओं के साथ ही हो सकता है। तो १-१६ कलाओं के साथ अवतरित होने पर वे अंशावतार अथवा कलावतार कहलाते हैं।
पूर्णावतार: जो ईश्वर की सभी १६ कलाओं के साथ अवतरित हों उन्हें पूर्णावतार कहा जाता है। श्रीहरि के दशावतार में केवल श्रीकृष्ण ही उन सभी १६ कलाओं के साथ अवतरित होते हैं इसीलिए उन्हें ही पूर्णावतार कहा जाता है। सभी १६ कलाओं से युक्त होने के कारण ही
श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के सर्वाधिक समकक्ष माने जाते हैं
विभूति अवतार: जब कोई अवतार १ कला से भी कम होता है तो उसे विभूति अवतार कहते हैं।
चतुर्व्यूह अवतार: ये विशेष अवतार है जो हर बार नहीं होता। इसमें भगवान अपने अलग-अलग अंश से एक ही कालखंड में ४ अलग-अलग रूपों में अवतरित होते हैं
जो एक साथ मिलकर किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति करते हैं। जैसे श्रीराम, भरत, लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न रामावतार के चतुर्व्यूह रूप हैं। उसी प्रकार श्रीकृष्ण, बलराम, प्रद्युम्न एवं अनिरुद्ध कृष्णावतार के चतुर्व्यूह रूप हैं।
गुणवतार: ये गुणों पर आधारित है। विष्णु सतगुण, ब्रह्मा रजोगुण एवं शंकर तमोगुण का प्रतिनिधित्व करते हैं। उसी प्रकार विभिन्न अवतार भी अलग-अलग गुणों के होते हैं, जैसे दशावतार में श्रीराम सतोगुण, श्रीकृष्ण रजोगुण एवं परशुराम तमोगुण का प्रतिनिधित्व करते हैं।
कल्पावतर: ये अवतार कल्प में एक बार होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि मत्स्य से लेकर श्रीकृष्ण तक, श्रीहरि के ये ९ अवतार कल्पावतर हैं। अर्थात ये एक कल्प में केवल एक ही बार अवतरित होते हैं।
मन्वन्तरावतार: एक मन्वन्तर में एक बार अवतरित होने वाले अवतार मन्वन्तरावतार कहलाते हैं।
ये अवतार परमपिता ब्रह्मा के रूप माने जाते हैं। अर्थात एक कल्प में ब्रह्मा के १४ मन्वन्तरावतार होते हैं, जिन्हे आम भाषा में मनु भी कहा जाता है।
युगावतार: ये हर युग में अवतरित होते हैं। श्रीहरि के दशावतार में केवल भगवान कल्कि ही युगावतार हैं, अर्थात ये हर युग में एक बार अथवा
एक कल्प में १००० बार अवतरित होते हैं।
लीलावतार: भगवान विष्णु के २४ अवतार लीलावतार कहलाते हैं। ये हैं - सनकादि ऋषि, वराह, नारद, हंस, नर-नारायण, कपिल, दत्तात्रेय, यज्ञ, ऋषभदेव, पृथु, मत्स्य, कूर्म, धन्वन्तरि, मोहिनी, हयग्रीव, नृसिंह, वामन, गजेंद्र मोक्ष, परशुराम, वेदव्यास,
राम, कृष्ण, वेंकटेश्वर एवं कल्कि।
अर्चावतार: यहाँ ईश्वर स्वयं अवतरित ना होकर किसी प्रतीक अथवा मूर्ति के रूप में अवतरित होते हैं।
नैमित्तिक अवतार: ईश्वर के ऐसे अवतार जो कभी कभी, किसी विशेष प्रयोजन हेतु अवतरित होते हैं। लीलावतारों को कई बार नैमित्तिक अवतार में भी गिना जाता है।
नित्यावतार: लौकिक अवतार। ईश्वर का सबसे आम और बहुधा होने वाला अवतार।
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महर्षि भारद्वाज द्वारा लिखित विमान शास्त्र क्या है?
विमान शास्त्र मैं विमान अर्थात वायुयान सम्बन्धी विवरण है विमानों तथा उनके युद्धों का विस्तरित वर्णन है। सैनिक क्षमताओं वाले विमानों के प्रयोग, विमानों की भिडन्त, तथा एक दूसरे विमान का अदृष्य होना
किसी आधुनिक वेज्ञानिक उपन्यास का आभास देते हैं लेकिन वह कोरी कलपना नहीं यथार्थ है।
प्राचीन भारतीयों ने जिन विमानों का अविष्कार किया था उन्होंने विमानों की संचलन प्रणाली तथा उन की देख भाल सम्बन्धी निर्देश भी संकलित किये थे,
जो आज भी उपलब्द्ध हैं और उन में से कुछ का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया जा चुका है।
विमान विज्ञान विषय पर कुछ मुख्य प्राचीन ग्रन्थों का ब्योरा इस प्रकार हैः-
1. ऋगवेद- इस आदि ग्रन्थ में कम से कम 200 बार विमानों के बारे में उल्लेख है।
प्रश्न = प्रत्येक मन्वन्तर काल में कौन-कौन से सप्तऋषि रहे हैं ?
देखिए आकाश में 7 तारों का एक मंडल नजर आता है। उन्हें सप्तर्षियों का मंडल कहा जाता है। इसके अतिरिक्त सप्तर्षि से उन 7 तारों का बोध होता है, जो ध्रुव तारे की परिक्रमा करते हैं उक्त मंडल के तारों के नाम भारत के महान 7
संतों के आधार पर ही रखे गए हैं। वेदों में उक्त मंडल की स्थिति, गति, दूरी और विस्तार की विस्तृत चर्चा मिलती है।
अर्थात : 1. ब्रह्मर्षि, 2. देवर्षि, 3. महर्षि, 4. परमर्षि, 5. काण्डर्षि, 6. श्रुतर्षि और 7. राजर्षि-
ये 7 प्रकार के ऋषि होते हैं इसलिए इन्हें सप्तर्षि कहते हैं।
भारतीय ऋषियों और मुनियों ने ही इस धरती पर धर्म, समाज, नगर, ज्ञान, विज्ञान, खगोल, ज्योतिष, वास्तु, योग आदि
प्रश्न = पिप्पलाद ऋषि कौन थे ? पिप्पलाद ऋषि का शनिदेव से क्या संबंध है ?
श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं।
इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।
जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा।
यहाँ के पण्डे आपके आते ही आपके पास पहुँच कर आपसे सवाल करेंगे
आप किस जगह से आये है ?
मूल निवास ?
आदि पूछेंगे और धीरे धीरे पूछते पूछते आपके #दादा, #परदादा ही नहीं बल्कि #परदादा के #परदादा से भी आगे की #पीढ़ियों के नाम बता देंगे जिन्हें आपने कभी सुना भी नही होगा
और ये सब उनकी #सैंकड़ो सालों से चली आ रही #किताबो में सुरक्षित है
प्रश्न = इंसान को भगवान ने बनाया तो भगवान को किसने बनाया?
ये एक बहुत पुराना पर प्रासंगिक प्रश्न है। इसके दो भाग हैं
भगवान क्या है —
आस्तिक हो या नास्तिक कोई भी ईश्वर को माने या न माने पर एक स्वचालित व्यवस्था की सत्ता में तो हम सब मानते ही हैं ।
ऐसा नही है तो हम हिरण्यकश्यप हो जाएंगे जो यह कहता था कि वही जीव को प्राण देता है, पालन-पोषण करता हैं, और वो ही प्राणों का हरण करता है। इसलिए उसी की पूजा हो।
जो ईश्वर को मानना चाहे माने, जो न माने वो इसी बड़ी सत्ता को माने।
इस शाश्वत स्वचालित व्यवस्था को ही मेरे जैसे भक्त भगवान कहते हैं। इसको किसी ने नही बनाया, इसके बिना कोई हो ही नही सकता।
2. भगवान की ज़रूरत क्यों है
हवा की ज़रूरत हम सबको है पर इसकी जरूरत महसूस नही होती क्योंकि यह हमेशा हर जगह उपलब्ध है।इसलिए हम हवा के लिए कोई कोशिश नही करते।