Yesterday, Islamist and Communist celebrated the birth anniversary of #TipuSultan as #TipuSultanJayanti.

Do you know who was the most trusted ally of Tipu? - Shankaracharya

Let us learn how so called Jagadguru blessed Tipu Sultan, ditching Sanatan Dharma.
The Entire Narration has been taken from "The Records of the "Sringeri Dharmasthana" - A Book by Dr. A K Shastry.

The Book has been published by Shringeri Math itself. So, it is authentic history of the matha.
Then Shankaracharya Sri Sacchidanand Bharti III use to send Prasada, Shawl, as a token of his blessings to Tipu Sultana.

A Sultan who plundered many temples, were given blessings by the so-called highest Guru of Sanatan Dharma.

This exposes how fraud these traditions are!
Shankaracharya did not stop here. He performed a special "Sahasrachandi-japa" for well-being and success of "Tipu Sultan's government".

Imagine, a performing Pooja for a monster who killed thousands of Hindus!

Do we need external enemies when we have such Dharmacharya?
It is not isolated incident that Shankaracharya is performing Pooja for well-being of Tipu. Tipu is requesting this on regular basis and Shankaracharya is obliging him.

May be Shankaracharya considered donation provided by Tipu as more important than blood of his fellow Hindus.
Tipu used to give expensive gifts, privileges and other favors to Shankaracharya Matha.

This is the bribe he gave to Shankaracharya so that he remains silent on massacre of Hindus by Tipu.

So callaed Dharma Guru did not fight for Dharma but sided with Adharma.
Hindus of India were enemies of Tipu and fighting against him. Tipu Sultan requested Shankaracharya to perform "Chandihavana" so that Tpu Sultan can conquer his infield enemies.

And Bingo! Shankaracharya agreed!

He performed homa so that Tipu can kill more Hindus.
Such Dharmaguru are liability for Dharma. They never fight for Dharma, but sides with Adharma. It's shameful that traditions of Vidyaranya Swami fell to this level that they will bless Adharmi like Tipu Sultan.
Next Time when someone comes to you and advocate "Traditional Acharya", please show them this mirror.

Traditions are not dependent on such Kaliyugi Acharya. It depends on Dharma which is Sanatan.

The day we stop idealizing such fraud Gurus, a new dawn will happen for Sanatana.

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Nov 19
तप्तमुद्रा धारण - एक अवैदिक परम्परा

जैसे ईसाईमें बापिस्ता होता है और मुसलमानोमें सुन्नत करवाते है, वैसे ही दक्षिण भारत के वैष्णव मठोमें धर्म का छापा लगवाने की परम्परा है, जिसे तप्तमुद्रा बोलते है।

यह परम्परा का सनातनधर्म से कोई लेना देना नहीं, केवल अन्धश्रद्धा है। Image
इस परम्परामें आचार्य अपने कल्ट को माननेवाले अनुयायी के शरीर पर गरम ताम्बे की मुद्रा छापता है।

यह अमानुषि परम्परा के अन्दर, तांबे को अग्निमें गरम किया जाता है और अनुयायी के शरीर पर लगाया जाता है। सामान्यतः शङ्ख, चक्र, गदा आदि प्रतिको की मुद्रा बनायी जाती है।
कुछ अनुयायी अपने शरीर पर पांच मुद्रा भी बनवाते है। उनका मानना यह है की यह मुद्रा बनवाने से श्रीविष्णु को ज्ञात होगा की हम उसके भक्त है और मरण के समय वह वैकुण्ठ ले जायेगे।

इसी अन्धश्रद्धा के कारण प्रतिवर्ष लाखो अनुयायी यह यातना उठाते है।
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Nov 18
सनातनधर्म में आजकाल अनाश्रमी लोगो की संख्या बढ रही है।

ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास यह चार आश्रममें से एक में भी स्थित ना हो, उसे अनाश्रमी कहते है।

अनेक युवान और युवती आजकल अभ्यास करने के बाद विवाह करना नहीं चाहते। अपनी नौकरी करते हुए अविवाहित रहना पसंद करते है। Image
वह ब्रह्मचारी नहीं है क्यु की वह आश्रम की मर्यादा का पालन नहीं करते।वह गृहस्थ भी नहीं है क्यु की उनहोने विवाह नहीं किया है। संन्यासी भी नहीं है क्यु की संसार को नहीं छोडा है।

यह लोग आश्रम व्यवस्था को जानेअंजाने में नष्ट कर रहे है। वह स्वयं की मस्ती में है, धर्म से कुछ नाता नहीं।
आश्रम व्यवस्था कै उद्धेश है की आप समाज और धर्म के लिए लाभकारी हो।

प्रथम आश्रममें ज्ञानप्राप्त कर लाभ करो, गृहस्थाश्रममें संतान और संपति अर्जीत कर लाभ दो, वानप्रस्थानमें नयी पीढी का संस्कारसिंचन करना और संन्यासमें ज्ञानप्रचार अपेक्षित है।
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Nov 16
हिन्दू समाज के पतन का सब से बडा कारण है, हम भोजन सम्बधित आचारशुद्धता को छोड चूके है।

हम जैसा खाते है, वैसा हमारा मन बनता है। पहले के समयमें भोजन पकाते समय शुद्धता का खास ध्यान रखा जाता था। बिना नहाये किचनमें प्रवेशना भी वर्जीत था।
लेकिन आज आधुनिकता के नाम पर बिना नहाये किचनमें प्रवेशना तो छोडो, बिना नहाये भोजन भी बनाया जाता है। किचनमें काम करने से पसीना होता है, इसलिए बारबार नहाना ना पडे महिलाये सुबह नहाये बिना ही रसोई बना लेती है।

जब शुद्धता के साथ भोजन नहीं बनता, तो वह भोजन हमे शुद्ध विचार कैसे देगा?
हमारे घरमें नहाये बिना बच्चो को अन्न का दाना नहीं मिलता। और आजके आधुनिक कपल नहाना तो छोडो, ब्रश भी करे बिना नाश्ता कर लेते है। बेड टी के बाद बेडब्रेक्फास्ट एक फेशन बन गयी है, जिसमें निन्दमें से सीधा उठकर बिना नहाये या ब्रश करे लोग ब्रेकफास्ट करते है।
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Nov 15
श्रद्धा और आफताब वाले प्रकरण को भी हम थोडे दिनमें भूल जायेंगे। सवाल यह है की इन सब की जड क्या है? में मेरे विचार रख रहा हूं।
१. अधिकारो की बात करना, जिम्मेदारी से मुह मोडना

श्रद्धा को यह मालुम था की वह २५ वर्ष की हो गयी है और अपना निर्णय स्वयं लेना उसका अधिकार है। लेकिन उसे यह मालूम नहीं था की २५ वर्ष के युवा की जिम्मेदारी क्या होती है।
यह बात आजकल के सारे युवा पर लगती है।
बचपन से उनको अधिकार की शिक्षा दि जाती है, और जिम्मेदारी से बचाया जाता है। वास्तवमें बच्चा छोटी छोटी जिम्मेदारी उठायेगा, तभी तो वह लायक बनेगा।बचपनमें उसे जिम्मेदारी नहीं दी जाती क्युं की वह छोटा है।किशोरावस्थामें उसे जिम्मेदारी नहीं दी जाती, क्युं की वह पढाई कर रहा है।
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Nov 14
ब्रह्मा कौन है?

पुराणोमें ब्रह्माजी का अनेक स्थान पर वर्णन मिलता है। ब्रह्मदेव को चतुर्मुखी बताया जाता है तथा उनके हाथमें पुष्प, कमण्डल, माला और वेद दिखाये जाते है। उनहे सफेद दाढीवाला वृद्धपुरुष दिखाया जाता है। उनहे सृष्टिका सर्जक माना जाता है। Image
वास्तवमें ब्रह्माजी का यह चित्रण प्रतिकात्मक है। वेद और उपनिषदमें ब्रह्मा शब्द के जो विविध अर्थ होते है उनको समझाने के लिए ऐसा चित्र बनाया जाता है।

ब्रह्मा शब्द किसी व्यक्ति को नहीं पद को दर्शाता है।
ब्रह्मा के चार मुख का अर्थ - ब्रह्माजी के चार मुख चारवेद का प्रतीक है। वास्तवमें ब्रह्मा एक पद है। जो भी व्यक्ति चारवेद का ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह ब्रह्मा बन जाता है। मनुस्मृति के श्लोक १२.५०में भी उत्तम सत्वगुणवाले व्यक्ति ब्रह्मा पद को प्राप्त कर लेते है,ऐसा वर्णन है।
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Oct 4
क्या #दशहरा के दिन सचमें रावणवध हुआ था?

सामान्यजनो की यह मान्यता है की श्रीरामने #Dussehra के दिन #Ravana का वध किया था। इसी लिए आज के दिन #रावणदहन भी किया जाता है।

लेकिन हमारे कोई भी शास्त्रमें यह नहीं लिखा की रावणवध दशहरा को हुआ था। दशहरा तो छोडो, उसके आसपास भी नहीं हुआ था। Image
क्रिष्किन्धाकाण्ड सर्ग २६

श्रीराम सुग्रीव को कह रहे है की कार्तिकमास आने के बाद रावणवध के लिए प्रयत्न करना। तब तक तुम महलमें रहकर आनन्द करो।

दशहरा अश्विनमासमें आता है। कार्तिकमास तक तो श्रीराम क्रिष्किन्धामें ही थे। तो उन्होने दशहरे को रावणवध कैसे कर दिया? Image
यह सर्ग २७ के श्लोक है। जहाँ पर श्रीराम सुग्रीव से स्पष्ट कह रहे है की वह चतुर्मास के समय तक पर्वत पर निवास करेगे। चारमास समाप्त होने के बाद ही वह रावणवध के लिए प्रयत्न करेगे। ImageImageImage
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