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May 17, 2020, 21 tweets

Tread - रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने के ज्योतिषीय उपाय

1. बदलते मौसम में या सामान्य तौर पर बार-बार किसी न किसी तरह के संक्रमण या एलर्जी की चपेट में आना रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने का संकेत है। इम्यूनिटी आपके शरीर में मौजूद विषैले पदार्थो से लड़ने की क्षमता होती है।

2. प्रत्येक ग्रह का हमारी धरती और हमारे शरीर सहित मन-मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ता है जिसके चलते हमें सामान्य या गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ता है।

हमारी जन्मापत्रिका का हर ग्रह, लग्नह और राशि हमारे स्वानस्य्सन पर प्रभाव जरूर डालते हैं। हमारी जन्मकुंडली के बारह भावो में

3. से पहला भाव अर्थात लग्न भाव ही हमारे स्वास्थ और शरीर का प्रतिनिधित्व करता है |

कुंडली के लग्न भाव को शरीर बल, स्वास्थ,रोगप्रतिरोधक क्षमता यश , तेज़, आदि का कारक माना गया है। कुंडली में लग्न और लग्नेश का बली स्थिति में होना उस व्यक्ति को अच्छा स्वास्थय प्रदान करता है

4. जबकि कमजोर लग्न या लग्नेश, व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर बनाता है, जिस कारण स्वास्थ समस्यायें अधिक होती हैं ।
जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली में लग्न(देह), चतुर्थेश(मन) और पंचमेश (आत्मा) इन तीनों की स्थिति अच्छी होती है, उनकी रोग प्रतिरोधक शक्ति मजबूत होती है I वह

5. सदैव स्वस्थ जीवन व्यतीत करता है I यदि कुंडली में लग्नेश विशेषकर छठा एवं भाव में हो तो ऐसे में शरीर की रोग प्रतरोधक क्षमता कम होती है ऐसे में व्यक्ति के स्वास्थ में काफी उतार चढाव आते हैं। रोग प्रतिरोधक शक्ति का विचार जन्मकुण्डली के द्वादश भाव से किया जाता है।

6. इन भावों में स्थित ग्रह और इन भावों पर दृष्टि डालने वाले ग्रह व्यक्ति को अपनी महादशा, अंतर्दशा और गोचर में विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न करते हैं। जन्मकुंडली में रोग प्रतिरोधक शक्ति को प्रभावित करने वाले प्रमुख ज्योतिषीय कारण -

7. 1. कुंडली में यदि लग्नेश पाप भाव विशेषकर छटे या आठवे भाव में हो तो व्यक्ति के शरिर की इम्युनिटी कमजोर होती है व्यक्ति स्वास्थ की ओर से परेशान रहता है।
2. लग्नेश यदि अपनी नीच राशि में हो तो भी व्यक्ति का स्वास्थ पक्ष कमजोर होता है।

8. 3. कुंडली में लग्नेश का षष्टेश या अष्टमेश के साथ योग भी स्वास्थ को उतार चढाव में रखता है।

4. यदि षष्टेश या अष्टमेश लग्न में हो तो भी व्यक्ति का स्वास्थ समस्याग्रस्त रहता है।

9. 5. नीचस्थ चन्द्रमाँ का कुंडली के छटे और आठवे भाव में बैठना इम्युनिटी को कमजोर करता है जिससे व्यक्ति जल्दी ही बिमारियों का शिकार हो जाता है।

6. राहु का आठवे भाव में बैठना भी स्वास्थ में अस्थिरता देता है I राहु अष्टम होने से व्यक्ति को जल्दी इंफेक्शन होने की समस्या होती है

10. जिससे जल्दी बीमार पड़ने की स्थिति बनी रहती है।

7. यदि लग्न में कोई पाप ग्रह नीच राशि में हो या लग्न में कोई पाप योग बन रहा हो तो भी व्यक्ति का स्वास्थ कमजोर रहता है।

8. कुंडली के आठवे और छटे भाव में अधिक ग्रहों का होना भी स्वास्थ पक्ष के लिए अच्छा नहीं पाया गया है।

11. जन्मकुंडली अनुसार चक्रो द्वारा रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के उपाय -
चक्रो का ज्योतिषीय ग्रहो से गहरा सम्बन्ध है I हर एक चक्र पर किसी न किस ग्रह का स्वामित्व है I इनका प्रनिधित्व सौर-मंडल के सूर्य,चंद्र, मंगल आदि 9 ग्रह करते हैं ।

12. इन चक्रों के स्वामी सभी ग्रह है, सात चक्र और सात ग्रह, राहु-केतु छाया ग्रह है, अतः उन्हें छोड़कर ।

मूलाधार चक्र - शनि, स्वाधिष्ठान चक्र - बृहस्पति , मणिपूरक चक्र - मंगल, अनाहत चक्र - शुक्र, विशुद्ध चक्र - बुध, आज्ञा चक्र - सूर्य−चंद्रमा, सहस्त्रार-चक्र - शनि I

13. वैदिक काल से ग्रहों की अनुकूलता के प्रयास किए जाते रहे हैं। यजुर्वेद में (समुषद्भिरजायथा:।। (यजु. 29।37)) 9 ग्रहों की प्रसन्नता के लिए उनका आह्वान किया गया है। यह मंत्र चमत्कारी रूप से प्रभावशाली हैं। वैदिक मंत्र द्वारा रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के उपाय /मंत्र -

14. सूर्य - ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् (यजु. 33। 43, 34। 31)

15. चन्द्र - ॐ इमं देवा असपत्नं सुवध्यं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय। इमममुष्य पुत्रममुष्ये पुत्रमस्यै विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा।।
(यजु. 10। 18)

16. भौम - ॐ अग्निमूर्धा दिव: ककुत्पति: पृथिव्या अयम्। अपां रेतां सि जिन्वति।। (यजु. 3।12)

बुध - ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते सं सृजेधामयं च। अस्मिन्त्सधस्थेन अध्यु(त्तरस्मिन् विश्वे देवा यशमानश्च सीदत।। (यजु. 15।54)

17. गुरु - ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु। यद्दीदयच्छवस ऋतुप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।। (यजु. 26।3)

18. शुक्र - ॐ अन्नात्परिस्त्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपित्क्षत्रं पय: सोमं प्रजापति:। ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु।। (यजु. 19।75)

शनि - ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्त्रवन्तु न:।। (यजु. 36।12)

19. राहु - ॐ कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृध: सखा। कया शचिष्ठया वृता।। (यजु. 36।4)

केतु - ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे।

इन साधारण मंत्र उपाय के अलावा जातक की जन्म पत्रिका का चतुर्थ, षष्ठम, अष्ठम, एकादश एवं द्वादश भाव, उनके स्वामी की स्थिति भी देखकर उपाय करने से

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