बिहार में खासकर मिथिला क्षेत्र की बात करें तो किसानी की हालत खराब तो है, लेकिन वृक्षारोपण/बागवानी बढ़ रही है। ख़ासकर लोग आम, जामुन, महोगनी और सागवान के पेड़ लगा रहे हैं। मछली पालन बढ़ रहा है, लोग तालाब खुदवा रहे हैं।आंध्र की मछली अब नहीं दिखती, बंगाल से मछली की आमद बढ़ी है। (1)
बंगाल से उत्तर बिहार में मछलियों की आवक का कारण चार लेन हाईवे है और बेहतर ग्रामीण सड़कों का होना है। वहाँ से जिंदा मछलियाँ आती हैं और यहाँ के तालाबों में 3-4 दिन तक रखी जाती हैं। स्वाद में बहुत फर्क नहीं है। आज से 10-15 साल पहले तक यहाँ पर आँध्र की मछलियों का राज था। (2)
सरकार भले ही बिहार में ज़मीन की चकबंदी न कर पाई हो, पर लोग निजी स्तर पर ज़मीन को एक जगह लाने की कोशिश कर रहे हैं। पलायन ने आबादी का घनत्व घटाया है, समाज में बाहरी पैसों से ही सही, थोड़ी समृद्धि दिखती है। कानून व्यवस्था तुलनात्मक रूप से ठीक है। ज़्यादातर झगड़े भूमि विवाद के हैं(3)
लड़कियाँ साइकिल या बाइक पर कस्बाई बाज़ार तक हो आती हैं। गाँवों में अधकचरे अंग्रेजी स्कूल खुल गए हैं। बड़े स्कूलों और कॉरपोरेट अस्पतालों के लिए बाज़ार सज रहा है, लेकिन बिहार सरकार के अस्पतालों में सरकारी उदासीनता के साथ ही कम और लेट सैलरी के कारण डॉक्टर नहीं मिल रहे। (4)
पंचायत चुनाव में उम्मीदवार 50 लाख तक खर्च करने को तैयार है। पंचायतों को करोड़ों का फंड मिल रहा है। धनवान होना पहली योग्यता है, क्योंकि बड़ी संख्या में मतदाता पैसे पर बिक रहे हैं। यह अनुपात विधानसभा या लोकसभा चुनाव में वैसा नहीं होता। पंचायत चुनाव में जातिवाद नदारद है। (5)
गाँवों में शहरों की तुलना में लोगों का व्यक्तित्व ज़्यादा दोहरा हो गया है। हालाँकि शहर इसके लिए बदनाम रहे हैं। शायद संक्रमण काल हो, गांव शहर की हर चीज़ में नकल करना चाहता है।यहाँ मिथकीय नैतिकता, प्रतिबद्धता और कार्य निष्ठा का बिल्कुल अभाव है। हाँ, वैचारिक कट्टरता भी नहीं है(6)
गाँव में बिजली 20 घंटे से ज्यादा रहती है। लगभग हर किसी के पास बाइक है। घरों में इनवर्टर और फ्रिज आ गए हैं। पनीर, चाऊमिन और मोमो का क्रेज है। पक्की सड़कें बेहिसाब परिवर्तन लाईं हैं। सवारियों से ठुँसी बसें नहीं दिखती, लोग टेम्पो, बाइक या टैक्सी से चले जाते हैं। (7)
हर मुख्य सड़क के किनारे औसत किस्म के नॉन वेज रेस्टोरेंट खुल गए हैं। दारू बैन है, लेकिन हर गाँव में मिल जाता है। सरकार को टैक्स भले न मिलता हो, थानेदार मालामाल है। गैस सिलेंडर टाइम पर पहुँच जाते हैं, बिजली की वजह से मसाले अब सिलवट्टे पर नहीं पीसे जाते। (8) #Bihar
पिछले तीन महीने से गाँव में हूँ। एकाध को छोड़कर किसी ने मोदी या नीतीश कुमार की आलोचना नहीं की।ज़मीन की कीमतें आसमान चूम रही हैं।दरभंगा-मधुबनी में नोएडा-गाजियाबाद से महँगी ज़मीन बिक रही है।प्रत्यक्ष सरकारी योजनाओं में लीकेज कम हुआ लगता है। सरकारी स्कूलों में औसत शिक्षक भरे हैं।(9)
शिक्षित लोगों के लिए रोजगार नहीं है।मजदूरों, कामगारों और शिल्पकारों के लिए खूब रोजगार हैं।कॉलेजों की संख्या कम है। लड़कियों के लिए घर के आसपास कॉलेज नहीं है।लड़के दूर जाकर पढ़ लेते हैं।कन्या भ्रूण हत्या का असर दिखने लगा है।ऊँची जातियों में लड़कों की शादियाँ नहीं हो पा रही है।(10)
उच्च जातियों में लैंगिक अनुपात बिगड़ने से दहेज घटा है, जबकि पिछड़ों में इसका पागलपन बढ़ा है। समाज में धन और समानता का भाव आने से मंदिरों का जीर्णोद्धार, धार्मिक क्रियाकलाप इत्यादि में बढ़ोत्तरी हुई है। मंदिर गतिविधियों में हिस्सा लेना मुख्यधारा में आने जैसा है। (End) #Bihar

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