यंत्र, मंत्र व देवता की गति को निर्धारित करता है। कार्य की दिशा को इंगित कारता है। वर्णाक्षरों व अंकों का लेखन भी भूतलिपि माध्यम से मंत्र की सत्ता को निहित करते हैं। यंत्र देवता की प्राकृतिक सत्ता का भी बोध कराते हैं। जैसे
त्रिकोण सत्, रज, तम तीन अवस्थाएं।
षट्कोण - सृष्टि, स्थिति, संहार, निग्रह, ग्रेस, निग्रह - ग्रेस स्टेटये । पटकोण में देवता के पड़ांगों की कल्पना कर देवभाव को प्राकट्य किया जाता है।
अष्टदल अष्टदलों में अधिकतर ब्राह्मयादि अष्टमातृका या अष्टभैरवों का पूजन अथवा देवी की अष्टांग शक्तियों - का वर्णन होता है।
षोडशदल देवी के सहायक कला शक्तियों का वर्णन आवाहन किया जाता है। -
भूपुर - साध्य देवता का एक स्वतंत्र सृष्टि खण्ड है एवं उसकी रक्षा हेतु दिक्पालों का पूजन किया जाता है। इस तरह देवताओं को उसकी अंग शक्तियों सहित आवाहित कर मंत्र में कार्य सिद्धि हेतु पूर्णता प्राप्त की जाती है।
शब्द ब्रह्म है इस सिद्धान्त के अनुसार आर्कषण, मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, अर्थसिद्धि, धनप्राप्ति, देह रक्षा, मार्गरक्षा, संतान प्राप्ति, राजविजय हेतु अनेकानेक कार्य हेतु मनीषियों ने कई यंत्रों का निर्माण किया है।
इस तरह तंत्र साधना में तीनों क्रियाओं का समावेश है।
मंत्र साधना के साथ, देवता का यंत्राचन पश्चात् हवनादि कर्म एवं बलिकर्म सन्निहित है।
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१. गालिनी मुद्रा- दोनों हथेलियों को एक दूसरे पर रक्खे। कनिष्ठिकाओं को इस प्रकार मोड़े कि वे अपनी-अपनी हथेलियों को स्पर्श करें। तर्जनी, मध्यमा और अनामिका उँगलियाँ सीधी और परस्पर मिली रहें। यह शङ्ख बजाने
बजाने की गालिनी मुद्रा हैं।
२. कुम्भमुद्रा- दाहिने अंगूठे को बाँयें के ऊपर रक्खे इसी अवस्था में दोनों हाथ की मुट्ठियाँ बाँधे परन्तु दोनों मुट्ठियों के बीच थोड़ी जगह होनी चाहिये। यह कुम्भ मुद्रा हैं।
३. कुम्भमुद्रा द्वितीया- दोनों हाथ को मिलाकर एक ही मुट्ठी बनाये और दोनों
१. लिङ्गमुद्रा- दाहिने हाथ के अँगूठे को ऊपर उठाकर उसे बायें अँगूठे से बाँधे। उसके बाद दोनों हाथों की उँगलियों को परस्पर बाँधे। यह शिवसान्निध्यकारक लिङ्ग मुद्रा हैं।
२. योनिमुद्रा दोनों कनिष्ठिकाओं को, तथा तर्जनी और अनामिकाओं को बाँधे। अनामिका को
मध्यमा से पहले किञ्चित् मिलाये और फिर उन्हें सीधा कर दे। अब दोनों अंगूठों को एक दूसरे पर रक्खे यह योनि मुद्रा कहलाती हैं।
३. त्रिशूलमुद्रा कनिष्ठिकाओं को अंगूठों से बाँधकर शेष उँगलियों को सीधा रक्खें। यह त्रिशूल मुद्रा हैं।
४. अक्षमाला मुद्रा अँगूठों और तर्जनियों के अग्रभाग