(1/9)#BirthAnniversary
25 दिसंबर 1861 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में एक पंडित परिवार में मदन मोहन मालवीय का जन्म हुआ। उन्होंने अपना उपनाम ‘चतुर्वेदी’ से बदलकर ‘मालवीय’ रख लिया, क्योंकि उनके पूर्वज मालवा से इलाहाबाद आए थे।
(2/9)मालवीय ने भारत में शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाने और समाज में सुधार लाने की दिशा में अनेकों काम किए। क्योंकि कहीं न कहीं उन्हें पता था कि जब तक भारतीय, शिक्षित नहीं होंगे और उन्हें समझ नहीं होगी कि स्वतंत्रता के असल मायने क्या हैं?
(3/9)तब तक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को वह गति नहीं मिलेगी, जो मिलनी चाहिए। इसके अलावा, उनकी सोच यह भी थी कि उन्हें युवाओं को स्वतंत्र भारत के लिए तैयार करना है, ताकि उन्हें पता हो कि उन्हें कैसे अपने देश के सर्वांगीण विकास में साथ देना है।
(4/9)इसी सोच के साथ उन्होंने साल 1915 में 'बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय' की नींव रखी। इसके निर्माण के लिए उन्होंने अलग-अलग जगह जाकर वहां के नामी-गिरामी लोगों से चंदा इकट्ठा किया। इस कड़ी में एक किस्सा बहुत ही मशहूर है। बताया जाता है कि जब यूनिवर्सिटी के लिए चंदा इकट्ठा करने महामना,
(5/9)हैदराबाद के निज़ाम के यहाँ पहुंचे,तो निज़ाम ने उन्हें चंदा देने से मना कर दिया।

लेकिन मदन मोहन की भी जिद थी कि उन्हें तो चंदा चाहिए ही चाहिए।इसलिए उन्होंने एक अलग ही तरकीब निकाली। उन्होंने निज़ाम की चप्पलें उठा लीं और उन्हें कहा कि मैं बाज़ार में लोगों को ये चप्पलें बेचूंगा
(6/9)और उन्हें कह दूंगा कि आपके पास पैसे नहीं थे,इसलिए चप्पलें दे दीं।

ऐसे में,निज़ाम ने खुद अच्छी-ख़ासी रकम देकर उनसे अपनी ही चप्पलें खरीदीं। बाद में, बीएचयू के निर्माण के समय,महामना ने कैंपस में शिक्षकों के रहवास के लिए बनने वाली कॉलोनी को ‘निज़ाम हैदराबाद कॉलोनी’ का नाम दिया।
(7/9)आज बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी न सिर्फ़ देश के बल्कि पूरे विश्व के बड़े और मुख्य शिक्षण संस्थानों में से एक है।

इस सबके अलावा, उन्होंने हमेशा ही स्त्री शिक्षा, उनके अधिकारों और दलितों के अधिकारों पर जोर दिया। वह हमेशा कहते थे कि वह बनारस में नहीं मरना चाहते।
(8/9)क्योंकि कहते हैं कि जो बनारस में मरता है, वह फिर कभी दोबारा पृथ्वी पर जन्म नहीं लेता। लेकिन महामना फिर से भारत की भूमि पर जन्म लेकर अपने जीवन को गरीबों और ज़रुरतमंदों के लिए समर्पित करना चाहते थे।

लेकिन 12 नवंबर 1946 को उन्होंने बनारस में ही अपनी आख़िरी सांस ली।
(9/9)द बेटर इंडिया भारत के इस अनमोल रत्न को सलाम करता है!

तस्वीर : गांधीजी के साथ मदन मोहन मालवीय।
#MadanMohanMalaviya #Inspiring #FreedomFighter #History

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Dec 24
(1/8)क्या आपने मक्खन का पेड़ देखा है?

चौंकिए मत! इस तरह के पेड़ उत्तराखंड में अक्सर दिखाई पड़ते है। च्यूर नाम का यह पेड़ देवभूमि वासियों को वर्षों से घी उपलब्ध करा रहा है। इसी खासियत के कारण इसे 'इंडियन बटर ट्री' कहा जाता है।
(2/8)जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्व विद्यालय के डॉ. वीपी डिमरी बताते हैं कि दूध की तरह मीठा और स्वादिष्ट होने के कारण च्यूर के फलों को चाव से खाया जाता है। दुनिया में तेल वाले पेड़ों की सैकड़ों प्रजातियां हैं, लेकिन कुछ ही ऐसी हैं, जिनसे खाद्य तेल प्राप्त किया जा सकता है।
(3/8)डॉ. डिमरी कहते हैं कि यदि च्यूर के व्यावसायिक उत्पादन को बढ़ावा दिया जाए, तो यह राज्य की आर्थिक स्थिति को बदल सकता है।

च्यूर संरक्षित प्रजाति का पेड़ है और इसे काटने की अनुमति नहीं है। इसके बावजूद च्यूरा के पेड़ों की संख्या लगातार घट रही है।
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Dec 23
(1/7)कई बार ऑफिस आते-जाते या सड़क पर चलते हुए आपकी नज़र ऐसे किसी इंसान पर पड़ी होगी जिनके पास इस कड़कड़ाती ठंड में तन ढकने के लिए एक कंबल भी नहीं है। वे छोटे-छोटे बच्चे जो बिना स्वेटर, टोपी और गर्म कपड़े के ही दिन-रात काटने को मजबूर हैं।
(2/7)इनकी मदद करने का ख़्याल तो आपको भी आया होगा!तो अब बिना सोचे हमारे ज़रिए आप इन तक पहुंचा सकते हैं गर्म कपड़े और कंबल जैसी ज़रूरी चीज़ें।
द बेटर इंडिया के #DonateWarmth कैंपेन से जुड़कर हमारा साथ दीजिए।क्योंकि साथ मिलकर कोशिश करने से ही हम इनकी ज़िंदगी थोड़ी आसान बना सकते हैं।
(3/7)नए साल की इससे अच्छी शुरुआत और क्या होगी?
आपको क्या करना है?
जो कपड़े अब आप नहीं पहनते या आपके लिए बेकार हैं, उन्हें हमारे कैंपेन पार्टनर Uddeshhya के इन पतों पर #DonateWarmth के ज़रिए दान कर सकते हैं या कोरियर के माध्यम से पहुंचा सकते हैं-
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Dec 23
(1/4)अगर जीवन में कुछ कर गुज़रने का जुनून हो, तो कोई भी मुश्किल काम आसान हो जाता है। ऐसा ही कुछ कमाल कर दिखाया है उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर जिले के छोटे से गांव की रहनेवाली सानिया मिर्ज़ा ने।
(2/4)सानिया ने एनडीए की परीक्षा में 149वीं रैंक के साथ फ्लाइंग विंग में दूसरा स्थान हासिल किया है।

सानिया की इस सफलता से उनका परिवार बहुत खुश है। सानिया के पिता शाहिद अली मिर्ज़ापुर में एक टीवी मैकेनिक हैं। ot
(3/4)उन्होंने बताया, "सानिया मिर्ज़ा, देश की पहली फाइटर पायलट अवनी चतुर्वेदी को अपना आदर्श मानती है। वह शुरू से ही उनके जैसा बनना चाहती थी। सानिया देश की दूसरी ऐसी लड़की है, जिसे फाइटर पायलट के तौर पर चुना गया है।"
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(1/4)आज के आधुनिकता की चकाचौंध में हमारे बहुत से ऐसे परंपरागत तरीके खो से गये हैं, जिनमें विज्ञान की झलक मिलती है। ऐसी ही एक पोस्ट हमारे साथ साझा की है अंजनी कुमार पांडे ने।
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बाद में बड़े होने पर पता चला कि वह झाग शरीर मे यूरिक एसिड बढ़ाता है और माई इसीलिए उस झाग को फेंक दिया करती थी।
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(1/5)#gardening
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