प्रथम भाव-यदि वक्री शुक्र कुंडली के प्रथम भाव में विराजमान हो तो जातक को अपनी शारीरिक सुंदरता पर घमंड आ जाता है। आमतौर पर वक्री शुक्र कुंडलीधारक विपरीत लिंग वालों को सहजता से अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं और जिस वजह से वह बदनाम भी होते हें।
दृतीय भाव- द्वितीय भाव में वक्री शुक्र होने पर जातक को कामुक और विलासी बनाता है। साथ ही भोग विलासता के साथ जीवन जीने की इच्छा भी पैदा करता है जिसकी वजह से वह गलत राह भी पकड़ लेता है। वक्री शुक्र की वजह से जातक दिखावा बहुत करते हैं और दिखावे की वजह से धन भी बहुत खर्च करते हैं।
तृतीय भाव-तृतीय भाव में अकेला वक्री शुक्र अशुभ फल देता है। जातक व्यभिचारी और रंगीन मिजाज होने की वजह से समाज में उसके मान-सम्मान में कमी आती है। शत्रु पक्ष से हमेशा परेशान रहता है।
चतुर्थ भाव-किसी कुंडली के चतुर्थ भाव में वक्री शुक्र भूमि प्राप्ति होने की ओर इंगित करता है परंतु जातक को अपनी भूमि और भवन से दूर भी कर देता हैं। यदि वक्री शुक्र मंगल से प्रभावित हो तो जातक को अपने परिवार से लगाव कम हो जाता है।
पंचम भाव-किसी जातक की कुंडली में वक्री शुक्र का पंचम भाव में होने पर जातक को कन्या के रूप में संताने प्राप्त होती है। जातक की रूचि लॉटरी, जुआ जैसे खेलों में होती है, वक्री शुक्र की वजह से जातक समलैंगिक भी होता है लेकिन उसे लव लाइफ में असफलता ही हाथ लगती है।
षष्टम भाव-इस भाव में यदि वक्री शुक्र (Venus Retrograde) बैठा है तो ऐसे में जातक स्त्रियों से द्वेष रखता है और उसके जीवन में शत्रु बहुत होते हैं। जातक अपनी पैतृक संपत्ति व धन को नष्ट भी कर देता है।
सप्तम भाव-इस भाव में शुक्र का वक्री होकर बैठना जातक के जीवन में अनेक शत्रुओं को पैदा करता है। ऐसे जातक अपनी लव लाइफ और मैरिड लाइफ में पार्टनर के प्रति पूर्ण निष्ठा और विश्वास नहीं रखते हैं। ये जातक धनी और एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर के प्रति ज्यादा रुचि रखते हैं।
अष्ठम भाव-जातक के जीवन में कर्ज की स्थिति हमेशा बनी रहती है और बहुत उतार चढ़ाव की स्थिति बनी रहती है।किसी जहर को खा जाने का भय या जहर,जहरीले जानवर के खा जाने से मृत्यु का भय भी बना रहता है।
नवम भाव-कुंडली के नवम भाव में वक्री शुक्र हो तो जातक को आलसीबना देता है। ये लोग केवल दिखावे की वजह से धार्मिक कार्यों, दान और यज्ञ में भाग लेते हैं बल्कि इनके मन में सकारात्मकता नहीं होती है।
दशम भाव-दशम भाव में शुक्र का वक्री होना जातक को धनवान और वैभवशाली बनाता है। जातक का विवाह उच्च कुल में होता है। लेकिन जातक का माता के साथ विवाद बना रहता है। इस भाव में वक्री शुक्र जातक को पदोन्नति,सम्मान दिलवाता है।
एकादश भाव- एकादश भाव में वक्री अवस्था में शुक्र का बैठना जातक को धन-संपत्ति, वाहन सुख और नौकर चाकरों का सुख प्राप्त कराता है साथ ही साथ आय के नए साधन उपलब्ध करवाते है।धन का आगमन बना रहता है।
द्वादश भाव-इस भाव मे वक्री शुक्र का होना जातक को ख़र्चीला बनाता है। जातक धन एकत्र करने में असफल रहते हैं।
द्वादश भाव - जातक को पित्त कफ की समस्या रहती है और पुरुष की कुंडली में इस स्थान में वक्री शुक्र होने पर जातक पारगामी स्त्री की तरह ज्यादा आकर्षित रहता है।
साथ कि अपने धन को स्त्री सुख,अनावश्यक खर्च में करने में लगा रहता है।
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#शुक्र#भौतिकसुख
बिगड़ा हुआ शुक्र जातक का जीवन ही व्यर्थ सिद्ध करता है, क्योंकि मनुष्य का जन्म ही कर्मों के फल भोगने हेतु होता है।
यदि उसे जीवनपर्यंत अशुभ फल ही भोगने पड़ते हैं तो इस जीवन के कर्म भी अशुभ हो जाते हैं जिसके परिणामस्वरूप पुनर्जन्म के बंधनों में जकड़न महसूस करता है।
शुक्र शुभ ग्रह होकर भोग और विलास का कारक ग्रह है और इस पृथ्वी पर जातक पांच कर्मेंद्रियों और पांच ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से सुखोपभोग करता है अर्थात जातक को कब, कितनी मात्रा में किस प्रकार का सुख उपलब्ध होगा, इसका निर्णय शुक्र की स्थिति देखकर किया जाता है।
शुक्र का जन्म कुंडली में निम्न स्थितियों में जातक को अशुभ फल या अनिष्ट भोगना पड़ता है
(1) किसी भी भाव में शुक्र वक्री, नीच, शत्रु राशि में स्थित हो या पापी ग्रहों के युक्त या दुष्ट हो तो जातक को घर-वाहन, वैभव, स्त्री सुख से वंचित कर परस्त्रीगामी तथा यौन रोगों से ग्रस्त बनाता है।
वक्री #बृहस्पति की क्या क्या फल प्राप्त होता है इनका अलग अलग भावो में..
प्रथम भाव-बृहस्पति वक्री हो तो व्यक्ति विद्वान और विशेष पूजनीय होता है। स्वस्थ और सुंदर शरीर होता है। सार्वजनिक जीवन में बहुत सम्मान प्राप्त करता है, लेकिन दूसरी ओर कई मामलों में सही न्याय करने से चूक जाता है। अपने प्रिय के प्रति पक्षपाती हो जाता है।
द्वितीय भाव-वक्री बृहस्पति द्वितीय भाव में है तो व्यक्ति लापरवाहीपूर्ण खर्च करता है। इन्हें पैतृक संपत्ति प्राप्त होती इसलिए वह उसका महत्व नहीं समझ पाता और अंधाधुंध खर्च करता है। बोलने में कुशल, वाकपटु, दानी और उदार होता है। पत्नी से सुख मिलता है।
★★★★★★★★★★★★★★ (1) मंगल और शुक्र में राशि परिवर्तन हो अर्थात मंगल वृष या तुला में हो तथा शुक्र मेष तथा वृश्चिक राशि में हो तो ऐसी स्त्री परपुरुषगामिनी होती है।
(2) मंगल शुक्र के नवांश में तथा शुक्र मंगल के नवांश में हो।
(3) उपरोक्त (1,2)नियमों के साथ यदि चंद्रमा सप्तम भाव में हो तो पति पत्नी दोनो ही व्यभिचारी होते हैं।
(4) सप्तम भाव में चंद्रमा शुक्र और मंगल की युति हो तो ऐसी स्त्री पति की अनुज्ञा से परपुरुषगामिनी होती है।
(5) सप्तम भाव में चंद्रमा स्थित हो तथा वह मंगल या शनि के नवांश में हो तो भी स्त्री अपने पति की सहमति से परपुरुषगामिनी होती है।
(6) सप्तम भाव में सूर्य व मंगल कर्क राशि में (मकर लग्न )युत हो तो स्त्री पति की अनुज्ञा से परपुरुषगमन करती है।
श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं।
इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा।
कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक का जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा।
एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा-
नारद- बालक तुम कौन हो ?
बालक- यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ ।
*राहु और केतु का अपना कोई घर नहीं होता दोनों छाया ग्रह है l जिसके राशि में बैठते हैं और उसी राशि पर कब्जा जमा कर बैठ जाते हैं और उसी के अनुसार अच्छा या खराब फल देना शुरू कर देते हैं l*
*राहु का शरीर नहीं है सिर्फ सर है इसलिए यह हमें मानसिक तड़प देता है उसी प्रकार केतु का सर नहीं है शरीर है इसलिए वह हमें शारीरिक तड़प देता है lचाहे वह तड़प जिस रूप में पैदा करें l मान लीजिए कि राहु द्वितीय भाव में है तो वह धन के लिए मानसिक रूप से तड़प पैदा करेगा l
अगर केतु है तो आपकी शारीरिक रूप से धन के प्रति ज्यादा झुकाव रहेगा I*
*राहु आडंबर पैदा करता है Iयोजना बनाता है I साजिश रचता है I आरोप-प्रत्यारोप लगाने में माहिर रहता है I