थ्रेड:
#PSU_असली_हीरा

औद्योगिक क्षेत्र को छोड़ दें तो डायमंड आम आदमी के लिए एक गैर जरूरी चीज मानी जाती है। लेकिन फिर भी डायमंड की कीमतें आसमान को छूती हैं। बड़ा और दुर्लभ डायमंड खरीदना और पहनना एक स्टेटस सिंबल माना जाता है।
कुछ कुछ डायमंड तो इतने महंगे होते हैं कि पूरा देश बिक जाए तो भी उसकी कीमत नहीं लगा सकते। डायमंड की एक सच्चाई ये भी है कि जितना दुर्लभ डायमंड माना जाता है उतना दुर्लभ ये होता नहीं है। धरती पर हीरा बहुतायत में उपलब्ध है।
आपने कभी सोचा है कि बैंक वाले जब सोना रखते हैं तो हीरे का वजन क्यों निकाल देते हैं? या जब आप हीरा ज्वेलरी वाले को बेचने जाते हैं तो वो हीरे की कोई कीमत क्यों नहीं देता? तनिष्क वाला सिर्फ अपने बेचे हुए हीरे की ही कीमत वापिस करता है और वो भी आधी?
क्यूंकि हीरे का कोई मूल्य ही नहीं। हीरा अनमोल नहीं मूल्यहीन वस्तु है। और आजकल तो कृत्रिम हीरा भी बनाया जा सकता है जो रंग-रूप-गुण में हूबहू प्राकृतिक हीरे की ही तरह होता है। एक आम आदमी कृत्रिम और प्राकृतिक हीरे में अंतर नहीं बता सकता।
मतलब न किसी काम है है, न इसकी कोई कमी है, तो फिर हीरा इतना महंगा है क्यों? जवाब है De Beers'। ये एक निजी कंपनी है जिसका पूरे विश्व की डायमंड इंडस्ट्री पर लगभग एकाधिकार है। बीस साल पहले तक विश्व का 90% हीरा उद्योग इनकी जेब में था।
पूरे विश्व में हीरे के सप्लाई, डिमांड, कीमत ये कंपनी ही तय करती है। ये कंपनी कभी भी हीरे की कीमत कम नहीं होने देती। हीरा पहले इनके वॉल्ट में जाता है और वहीँ से सप्लाई कंट्रोल की जाती है। अफ्रीका में सिविल-वॉर के पीछे इनका भी बहुत बड़ा हाथ है।
हॉलीवुड फिल्म "Blood Diamond" में ये बखूबी दिखाया गया है। हीरे की मार्केटिंग के लिए तरह तरह के स्टैण्डर्ड बनाये जाते हैं, विश्व की शीर्ष अभिनेत्रियों से विज्ञापन कराये जाते हैं और इस तरह एक गैर जरूरी बेकार सा पत्थर आपको गगनचुम्बी दामों पर बेचा जाता है।
ये सिर्फ एक बानगी है कि जब किसी भी प्राकृतिक वस्तु पर किसी निजी कंपनी का एकाधिकार हो जाता है तो उसका किस तरह दुरूपयोग किया जा सकता है। चलिए हीरा तो गैर जरूरी चीज़ है, लेकिन अगर यही सिद्धांत शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग इत्यादि पर भी लागू हो गया तो क्या होगा?
और वो भी भारत जैसे देश में जहां आधी से ज्यादा आबादी गरीब है। क्या हम वास्तव में निजीकरण के लिए तैयार हैं? अगर नहीं तो वक़्त है एकजुट होकर सरकारी उपक्रमों के निजीकरण का विरोध करने का।

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2 Feb
थ्रेड: #कैसी_जीभ_लपलपाई

आजकल आये दिन कभी अख़बारों में तो कभी न्यूज़ चैनल्स पर रोज कोई न कोई कॉर्पोरेट का पालतू तोता पत्रकार या एक्सपर्ट के भेष में आकर PSU बेचने की वकालत करता नजर आता है। तो आज बात करते हैं कि क्यों कॉर्पोरेट PSU खरीदने पर आमादा हैं।
1. पका-पकाया हलवा: नयी कंपनी खड़ी करने से कहीं ज्यादा आसान है पुरानी कंपनी खरीदना। आजकल बिज़नेस ग्रुप का जमाना है। मतलब आप केवल एक ही क्षेत्र की कंपनी रह कर ज्यादा पैसा नहीं कमा सकते। ग्रुप ऑफ़ कम्पनीज कहलाने का अपना अलग ही रुतबा है।
सबको टाटा अम्बानी बनना है।अम्बानी तेल-गैस, कम्युनिकेशन, रिटेल से लेकर, एग्री बिज़नेस तक में है।उसकी देखा-देख बाकियों को भी मल्टी-टास्किंग करनी है।लेकिन नए सेक्टर में घुसना आसान तो है नहीं।पूरा नया इन्वेस्टमेंट, नए लाइसेंस, जेस्टेशन पीरियड, नया सेट-अप। और वो भी बिना एक्सपीरियंस।
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31 Jan
बैंकर किसान नहीं है। वे चार महीने तक सड़क जाम करके नहीं बैठ सकते। आप दस लाख बैंकरों को महीने भर तक हड़ताल पे नहीं रख सकते। न ही उनकी संख्या किसानो जितनी हैं। बैंकर इस्टैब्लिशमेंट के पार्ट हैं, एंटी-एस्टाब्लिशमेंट तरीके नहीं अपना सकते। बैंकर बनने के लिए बहुत लोग कतार में बैठे हैं।
SBI PO की 2000 सीटों के लिए बीस लाख लोग फॉर्म भरते हैं। हमारा रिप्लेसमेंट बहुत आसान है। किसान बनने के लिए कितने लोग लाइन में हैं? आप पचास करोड़ किसानों को रिप्लेस नहीं कर सकते। बैंकर एकजुट होकर वोट दें तो भी एक आदमी को MP नहीं बना सकते। किसान पूरे देश के चुनाव का रुख तय करते हैं।
बैंकरों की असली लड़ाई सरकार से नहीं है। हमारी असली लड़ाई अपने यूनियनों से है। राष्ट्रीय स्तर पर लड़ने का काम यूनियन ही कर सकती है। उनके पास कानूनी ताकत है। सोशल मीडिया पर हम बाकी बैंकर और जनता को अपनी समस्यों से अवगत करते हैं।
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31 Jan
थ्रेड: सरकारी फिल्में
#CorporatePuppetGOVT
लोगों को ये शिकायत अक्सर रहती है कि सरकारी संस्थानों और उपक्रमों में क्वालिटी की कमी रहती है। मेरा मानना है कि ये सिर्फ पूंजीवादी मुनाफाखोर कॉर्पोरेट द्वारा फैलाई हुई अफवाह है।
IIT-IIM तो हैं ही, आज आपको NFDC (नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन) के बारे में बताता हूँ। ये 1975 में बनाया हुआ एक सरकारी संस्थान है जिसका उद्देश्य अच्छी फिल्मों को प्रोत्साहन देना है। इस संस्थान ने लगभग 300 फिल्में प्रोडूस की हैं।

#CorporatePuppetGOVT
उदाहरण, लंचबॉक्स (2013), मांझी दी माउंटेन मैन (2015) से लेकर आक्रोश (1980), जाने भी दो यारों (1983), मिर्च मसाला (1986), सलाम बॉम्बे (1988) जैसी फिल्में NFDC ने दी हैं। गाँधी (1982), जिसको आठ ऑस्कर मिले थे, उसके प्रोडक्शन में भी NFDC का हाथ था।

#CorporatePuppetGOVT
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31 Jan
#CorporatePuppetGOVT

Thread:

सरकार देश के संसाधनों का निजीकरण करने पर तुली हुई है। और देश की जनता बिगबॉस देखने में बिजी है। आइये आपको निजीकरण के फायदे समझाते हैं।
हवा: आपको खुली हवा में सांस लेने की आजादी नहीं है, क्यूंकि हवा किसी कंपनी ने सरकार से बोली लगाकर खरीद ली है। अब उस कंपनी को
अपने हिसाब से हवा में प्रदूषण फ़ैलाने का हक़ है।

#CorporatePuppetGOVT
आप चाह कर भी सांस नहीं ले सकते। हवा गन्दी ही इतनी हो गयी है। हाँ अगर सांस लेनी है तो प्राइवेट कंपनी का बनाया हुआ पॉलूशन फ़िल्टर मास्क या फिर ऑक्सीजन सिलिंडर खरीदना पड़ेगा।

#CorporatePuppetGOVT

edition.cnn.com/2015/12/15/asi….
Read 18 tweets
31 Jan
अपनी गलतियों का ठीकरा दूसरों के सर फोड़ने का तरीका कोई कृष्णमूर्ति सुब्रह्मनीयन साहब से सीखे। ये न केवल नालायक हैं बल्कि झूठे और मक्कार भी हैं। पॉइंट बाई पॉइंट थ्रेड :

moneycontrol.com/news/business/…
1. इन्होने ने बैंकों की हालत के लिए रघुराम राजन के कार्यकाल को जिम्मेदार ठहराया है। चलो मान लिया कि उनकी गलती थी। आपने क्या किया उसके बाद? जिस रिस्ट्रक्चरिंग को गालियाँ दे रहे हैं वो बंद हो गयी क्या?
2. एक तरफ आप बैंक और कॉर्पोरेट के कोलैबोरेशन को गरिया रहे हैं। दूसरी तरफ आप कॉर्पोरेट को बैंकिंग में एंट्री देने की वकालत कर रहे हैं।

3. आप कह रहे हैं कि कॉर्पोरेट वाले बैंकों पर दबाव बनाते हैं लोन रिस्ट्रक्चरिंग के लिए।
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30 Jan
थ्रेड: क्रोनोलॉजी

आइये आज आपको निजीकरण की क्रोनोलॉजी समझाते हैं। कॉर्पोरेट बहुत तगड़ी प्लानिंग के साथ काम करते हैं। ये बरसों तक तैयारी करते हैं। सबसे पहले विदेशी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर्स को प्रोजेक्ट फंडिंग दी जायेगी।
साथ ही उनको कंपनी एडवाइजरी बोर्ड में पार्ट टाइम आनरेरी पोजीशन के साथ मोटी सैलरी भी दी जायेगी। फिर अवार्ड्स की फंडिंग करके, और नामी अख़बारों और पत्रिकाओं में लेख छपवाकर उन प्रोफेसर्स को नामचीन बनाया जाएगा।
फिर कॉर्पोरेट के एहसानों के बोझ तले दबे इन शिक्षाविदों को सरकारें सलाहकार नियुक्त करेंगी। अगर सरकार नहीं मानी तो दुनिया भर में पैसे देकर खड़ी की गयी रेटिंग एजेंसियों, NGOs, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के जरिये कभी असहिष्णुता तो कभी व्यापार,
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