कल राहुल गांधी लोकसभामें पूरे47मिनट तक धारदार बोलते रहे।संघी सरकारकी आत्मा पर चोट-दर-चोट करतेरहे।
उसके बाद नरेंद्र मोदीने अपने दर्जन भर से ज़्यादा पन्ना प्रमुख मंत्रियोंको उनका विरोध करनेके लिए छोड़ दिया। साथ में दरबारी मीडिया तो थी ही।
ज़रा सोचिए।देश के लोकतंत्र में अवाम की
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बात,उनकी चिंताओं को ज़ाहिर करना भी किस कदर चुभने लगा है।
संसदीय परंपराएं इशारा करती हैं कि विपक्ष के सारे सवालों का जवाब प्रधानमंत्री खुद दें,उनके पन्ना प्रमुख नहीं। मंच भी संसद ही होनी चाहिए।
लेकिन बिना टैलिप्राम्प्टर के अटकने, भटकने वाले कार्यपालिका के प्रमुख देश के पीएम
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एकतरफा संवाद पसंद करते हैं, क्योंकि सवालों, बहस से उन्हें नफ़रत है।
बजट पेश होने के बाद मोदी ने कहा था कि वे उसे पढ़ेंगे, समझेंगे। एक दिन बाद ही उन्होंने जीडीपी को 230 लाख करोड़ के बजाय 2.30 लाख करोड़ बक दिया और वह भी बीजेपी के मूर्ख कार्यकर्ताओं के सामने।
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मूर्ख दरबारी मीडिया ने उसे हूबहू छाप भी दिया।
राहुल के भाषण पर पन्ना प्रमुख मंत्रियों की बिलबिलाहट उन्हें बीजेपी ITसेल के 2रुपये वाले ट्रोल की पहचान देती है। असल में इन मंत्रियों की हैसियत ही देश चलाने की नहीं, ट्रोल करने की है।
विदेश मंत्री जैसे घाघ राजनेता को भी अपना अनुभव
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कूड़े में डालकर 1973के बाद का इतिहास तोड़-मरोड़कर बकना पड़ा। लेकिन बहस में उनके पास भी जवाब नहीं होगा कि अगर चीन और पाकिस्तान वाकई दुश्मन हैं तो मोदी अपनी "शरीफ़ बिरयानी" और जिन-पिंग को झूला झुलाने पर क्या बोलेंगे?
राहुल जैसा ही हाल हम कुछ सवालियों का भी है। पूछते हैं तो बजाय
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जवाब देने के, ट्रोल्स हमारी वैधानिकता, बोलने की आज़ादी को चुनौती देने लगते हैं।
शायद 6-7 फरवरी को मोदी लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस का जवाब देंगे। इस बार संसद हंगामों से नहीं, सवालों से गरमाई हुई है।
बजट, योजनाएं, कोविड, विकास और देश की सुरक्षा के दावे-
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सब भरभराकर ढह चुके हैं और सरकार इसे अमृत काल कह रही है।
काश! पीएम के जवाब से पहले संसद में मोदी के पिछले सारे झूठ और जुमलों का 5 मिनट का एक फ्लैशबैक दिखाया जा सके।
साफ साफ बोलें तो यदि 6th pay commission के जरिये लगभग दो ढाई करोड़ लोगों ( पढ़ें 18 - 20 करोड़ आबादी ) की तनख्वाहें और पेंशन इतनी ज्यादा न बढ़ी होती तो आज न इनके पास बाइक होती , न कार होती , न ये लोन लेकर घर बनवा पाते ,
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न अच्छे स्कूलों और कॉलेजों में बच्चों की फीस भर सकते थे,न प्राइवेट इलाज करा सकतेथे. सेविंग के नाम पर धेला न होता और एक बेरोजगार बेटा दस साल उम्र कम कर देता औऱ जवान होती बेटी की सूरत देख कर तकिए में मुंह छिपा कर रोते...
भला हो मनमोहन सिंहका जिन्होंने एक झटकेमें तनख्वाहें
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लगभग दूनी कर दी ... और दूसरी ओर मनरेगा ने ग्रामीण भुखमरी पर लगभग लगाम लगा दी...इसी का नतीजा था कि डॉमेस्टिक सेविंग के दम पर 2008 की महामंदी से जनता की मौत नही हुई...
मिडिल क्लास और ग्रामीण अर्थव्यस्था छठे वेतन आयोग और मनरेगा ही था जो अब तक उनकी हालत थामे हुये था ...
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राहुल गांधी के दो दिन पहले लोकसभा में दिए गए भाषण पर समूचे भगवा ब्रिगेड और संघी संपादकों को सांप क्यों सूंघ गया?
दरअसल, राहुल ने नरेंद्र मोदी सरकार और उनके दरबारी मीडिया के देश में संसदीय लोकतंत्र को ख़त्म करने की तमाम कोशिशों को पलीता लगा दिया।
नरेंद्र मोदी खिड़कीसे मुंह 6/1
निकालकर दुनिया को यह ज़रूर फेंक सकते हैं कि वे अभिव्यक्ति की आज़ादी को कितना समर्थन देते हैं।
लेकिन अपनी सरकार की नाकामयाबियों पर जवाब तो दूर, विपक्षी सांसदों को बोलने देने से कतराते हैं।
लेकिन चूंकि राहुल प्रश्नकाल नहीं, बल्कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस में बोल रहे थे,
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लिहाज़ा उन्हें रोक पाना नामुमकिनथा।
और उन्होंने पूरे देशको मोदीकी इसी कथनी-करनीका सच बता दिया, जो पेडिग्री दरबारी मीडिया के सवालों में नहीं आता। पर राहुल का संसद में दिया भाषण था, तो छापना ही पड़ा। सुलगनी ही थी।
दुनियाके लोकतांत्रिक सूचकांकमें भारत खिसकता जा रहाहै।क्यों?
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कल हमने इस बारेमें की देश"यूनियन ऑफ़ स्टेट्स"क्यों बना इसपर लम्बी सारी पोस्ट लिख डाली और इसका फायदा क्या रहा पिछले70सालमें वो भी कवर किया,क्यूंकि हमें मालूमथा के कोई ना कोई मंदबुद्धि चड्डी जिसने संविधान नहीं पढ़ रखा होगा वो पक्का राहुलसे कहेगाके राहुलने संविधान नहीं पढ़ रखा है।
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और हमारे देश में balkanizationना हो इसलिए ही ये"यूनियन ऑफ़ स्टेट्स"बना था, इस बारे में हुई संविधान सभा की बहस भी हमने शेयर की थी।😔
इंडिया,अमेरिका,ऑस्ट्रेलिया,कनाडा,ये सब फेडरेशंस हैं,यानी के राज्योंका समूह।
बहुत सारे चौधरियोंने मिलके एक पचायत बना रखीहै
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भारत जब आज़ाद हुआ तो बात शुरू हुई के इस देश को कैसे एक रखा जाए,
क्या किया जाए की ये टूटे ना,
यानी के ऐसा क्या हो के जैसा पाकिस्तान में हुआ के बांग्लादेश अलग हो गया या यूगोस्लाविया ख़त्म हुआ ऐसा इंडिया में ना हो,
तो उसके लिए संविधान सभा में काफी बहस हुईथी।
क्या राज्यों को कमज़ोर
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हर साल 256 CPSEs से लगभग 90 हजार करोड़ का शुद्ध लाभ और लगभग 3.75 लाख करोड़ का टैक्स और डिविडेंड मिलता है।
बावजूद इसके, सरकार ( भ्रष्ट नेता पढ़िए) इसे लगभग मुफ्त में अपनी पार्टी फंड में चिल्लर चंदा के लालच में अपने दानदाताओं पर लुटाए जा रहे हैं।
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जिसे मन किया उसे जागीर समझ के मुगलों की तरह बांट दें। इन कम्पनियों को बनाने में हम जनता के बाप-दादाओं के खून-पसीने की कमाई और उनकी पेट काटकर की गई बचत निवेशित है।
फर्जी जातीय दम्भ और धार्मिक मुद्दों पर मतदान करके देश को बेचने और लूटने वालों को
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वोट करने के लिए हमारी पीढ़ी को न तो हमारे पूर्वज माफ करेंगे और न ही अगली पीढ़ी...!
इस लूट और देश के प्रति अपराध को रोकने के लिए लोग किसी दूसरे गोले से नहीं आएंगे...! यह बात आप समझ सको तो आपका ही फायदा है। 3/3 @BramhRakshas @JitendraManoha6