आज से ठीक 16 साल पहले देश में ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना शुरू हुई थी। यह भारत सरकार से प्रत्येक ग्रामीण वयस्क को मिलने वाली काम की कानूनी गारंटी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद संसद में खड़े होकर बेशर्मी से मनरेगा को UPAसरकार की गड्ढा खोदो योजना बताकर मज़ाक उड़ा चुके हैं।
1
कोविड काल में इसी योजना ने करीब 10 करोड़ जॉब कार्ड धारकों को भूखों मरने से बचाया था।

लेकिन इस साल मोदी सरकार के पास 100 दिन तक काम देने को भी पैसा नहीं है। आज राज्यसभा में उनकी सरकार ने खुद यह बात बताई है।
2
वज़ह यह है कि मनरेगा की3358करोड़ से ज़्यादा की मजदूरी का भुगतान बाकी है। सामग्री पर11हज़ार करोड़ से अधिक की पेमेंट बकायाहै।

मोदी सरकार ने पिछले बजट के संशोधित अनुमान में एक-चौथाई की कटौती कीहै।

अब बकाए का भुगतान कर अगले एक साल के लिए बची रकम देखें तो यह54650करोड़ ₹ होती है।3
इतने पैसे से मोदी सरकार सिर्फ़ 16 दिन का ही काम दे सकती है।

यानी गर्मी के बाद देश के सवा 6 लाख गांवों में भयानक भुखमरी आने वाली है।

आखिर यह मोदी सरकार का अमृत काल जो है।
4
@BramhRakshas
@threadreaderapp please unroll

• • •

Missing some Tweet in this thread? You can try to force a refresh
 

Keep Current with Madhu Kothari

Madhu Kothari Profile picture

Stay in touch and get notified when new unrolls are available from this author!

Read all threads

This Thread may be Removed Anytime!

PDF

Twitter may remove this content at anytime! Save it as PDF for later use!

Try unrolling a thread yourself!

how to unroll video
  1. Follow @ThreadReaderApp to mention us!

  2. From a Twitter thread mention us with a keyword "unroll"
@threadreaderapp unroll

Practice here first or read more on our help page!

More from @MadhuKothari9

Feb 5
साल दो साल और नेहरू को गाली दे सकते हैं ...

साफ साफ बोलें तो यदि 6th pay commission के जरिये लगभग दो ढाई करोड़ लोगों ( पढ़ें 18 - 20 करोड़ आबादी ) की तनख्वाहें और पेंशन इतनी ज्यादा न बढ़ी होती तो आज न इनके पास बाइक होती , न कार होती , न ये लोन लेकर घर बनवा पाते ,
5/1
न अच्छे स्कूलों और कॉलेजों में बच्चों की फीस भर सकते थे,न प्राइवेट इलाज करा सकतेथे. सेविंग के नाम पर धेला न होता और एक बेरोजगार बेटा दस साल उम्र कम कर देता औऱ जवान होती बेटी की सूरत देख कर तकिए में मुंह छिपा कर रोते...

भला हो मनमोहन सिंहका जिन्होंने एक झटकेमें तनख्वाहें
5/2
लगभग दूनी कर दी ... और दूसरी ओर मनरेगा ने ग्रामीण भुखमरी पर लगभग लगाम लगा दी...इसी का नतीजा था कि डॉमेस्टिक सेविंग के दम पर 2008 की महामंदी से जनता की मौत नही हुई...

मिडिल क्लास और ग्रामीण अर्थव्यस्था छठे वेतन आयोग और मनरेगा ही था जो अब तक उनकी हालत थामे हुये था ...
5/3
Read 7 tweets
Feb 4
सेनाये मरने मारने के लिए नही होती

जी हां,सेना फोर्स है,जिसका इस्तेमाल पोलिटिकल ऑब्जेक्टिव के पाने लिए होताहै इंटरनेशनल पोलिटिकल ऑब्जेक्टिवके लिए

यह पोलिटीकल ऑब्जेक्टिव ऐसी टेरेटरीहो सकतीहै,जिसका महत्व जियोस्ट्रेटेजिक हो या व्यापारिकहो,या एथनिक,या कुछ और। ऑब्जेक्टिव तय करके सेना Image
यूज कीजिए,उसे हासिल करनेको

अगर आपके ऑब्जेक्टिव हासिल नहीहोते,या ऑब्जेक्टिव डिफाइंड ही नही,तब मरने मारने का कोई औचित्य नही।फिर ये महज दंगा है। लाशें गिनाकर बरियार बनने की सनक

तो चीनके चार मरे,या चालीस,हमारे दोमरे या दोसौ..इन बातोंका दम्भ जताने और ईगो सैटिस्फाइ करनेके अलावा कोई
2
महत्व नहीहोता।
एकके बदले दस सर लानेका उद्घोष इसी तरह फिजूलका लहू बहानेकी सनक है,जिसे आप गर्मी ठंडा करदेने,या टाइट करदेने के डिफरेंट वर्जनमें सुनतेहै।

अगर खुश होतेहै,तो जान लीजिए एक दंगाई आपके भीतर घुसपैठ कर चुकाहै।इसलिए कटे हुए सर की संख्या नही,हासिलात बताइये।

हासिलात पूछिये।3 Image
Read 4 tweets
Feb 4
राहुल गांधी के दो दिन पहले लोकसभा में दिए गए भाषण पर समूचे भगवा ब्रिगेड और संघी संपादकों को सांप क्यों सूंघ गया?

दरअसल, राहुल ने नरेंद्र मोदी सरकार और उनके दरबारी मीडिया के देश में संसदीय लोकतंत्र को ख़त्म करने की तमाम कोशिशों को पलीता लगा दिया।

नरेंद्र मोदी खिड़कीसे मुंह
6/1 ImageImage
निकालकर दुनिया को यह ज़रूर फेंक सकते हैं कि वे अभिव्यक्ति की आज़ादी को कितना समर्थन देते हैं।

लेकिन अपनी सरकार की नाकामयाबियों पर जवाब तो दूर, विपक्षी सांसदों को बोलने देने से कतराते हैं।

लेकिन चूंकि राहुल प्रश्नकाल नहीं, बल्कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस में बोल रहे थे,
6/2
लिहाज़ा उन्हें रोक पाना नामुमकिनथा।

और उन्होंने पूरे देशको मोदीकी इसी कथनी-करनीका सच बता दिया, जो पेडिग्री दरबारी मीडिया के सवालों में नहीं आता। पर राहुल का संसद में दिया भाषण था, तो छापना ही पड़ा। सुलगनी ही थी।

दुनियाके लोकतांत्रिक सूचकांकमें भारत खिसकता जा रहाहै।क्यों?
6/3
Read 7 tweets
Feb 3
कल हमने इस बारेमें की देश"यूनियन ऑफ़ स्टेट्स"क्यों बना इसपर लम्बी सारी पोस्ट लिख डाली और इसका फायदा क्या रहा पिछले70सालमें वो भी कवर किया,क्यूंकि हमें मालूमथा के कोई ना कोई मंदबुद्धि चड्डी जिसने संविधान नहीं पढ़ रखा होगा वो पक्का राहुलसे कहेगाके राहुलने संविधान नहीं पढ़ रखा है।
1 Image
और हमारे देश में balkanizationना हो इसलिए ही ये"यूनियन ऑफ़ स्टेट्स"बना था, इस बारे में हुई संविधान सभा की बहस भी हमने शेयर की थी।😔

#कल वाली पोस्ट येथी :

इंडिया,अमेरिका,ऑस्ट्रेलिया,कनाडा,ये सब फेडरेशंस हैं,यानी के राज्योंका समूह।
बहुत सारे चौधरियोंने मिलके एक पचायत बना रखीहै
2
भारत जब आज़ाद हुआ तो बात शुरू हुई के इस देश को कैसे एक रखा जाए,
क्या किया जाए की ये टूटे ना,
यानी के ऐसा क्या हो के जैसा पाकिस्तान में हुआ के बांग्लादेश अलग हो गया या यूगोस्लाविया ख़त्म हुआ ऐसा इंडिया में ना हो,
तो उसके लिए संविधान सभा में काफी बहस हुईथी।
क्या राज्यों को कमज़ोर
3
Read 12 tweets
Feb 3
हर साल 256 CPSEs से लगभग 90 हजार करोड़ का शुद्ध लाभ और लगभग 3.75 लाख करोड़ का टैक्स और डिविडेंड मिलता है।

बावजूद इसके, सरकार ( भ्रष्ट नेता पढ़िए) इसे लगभग मुफ्त में अपनी पार्टी फंड में चिल्लर चंदा के लालच में अपने दानदाताओं पर लुटाए जा रहे हैं।
3/1
जिसे मन किया उसे जागीर समझ के मुगलों की तरह बांट दें। इन कम्पनियों को बनाने में हम जनता के बाप-दादाओं के खून-पसीने की कमाई और उनकी पेट काटकर की गई बचत निवेशित है।

फर्जी जातीय दम्भ और धार्मिक मुद्दों पर मतदान करके देश को बेचने और लूटने वालों को
3/2
वोट करने के लिए हमारी पीढ़ी को न तो हमारे पूर्वज माफ करेंगे और न ही अगली पीढ़ी...!

इस लूट और देश के प्रति अपराध को रोकने के लिए लोग किसी दूसरे गोले से नहीं आएंगे...! यह बात आप समझ सको तो आपका ही फायदा है।
3/3
@BramhRakshas
@JitendraManoha6
Read 4 tweets
Feb 3
कल राहुल गांधी लोकसभामें पूरे47मिनट तक धारदार बोलते रहे।संघी सरकारकी आत्मा पर चोट-दर-चोट करतेरहे।

उसके बाद नरेंद्र मोदीने अपने दर्जन भर से ज़्यादा पन्ना प्रमुख मंत्रियोंको उनका विरोध करनेके लिए छोड़ दिया। साथ में दरबारी मीडिया तो थी ही।

ज़रा सोचिए।देश के लोकतंत्र में अवाम की
1
बात,उनकी चिंताओं को ज़ाहिर करना भी किस कदर चुभने लगा है।

संसदीय परंपराएं इशारा करती हैं कि विपक्ष के सारे सवालों का जवाब प्रधानमंत्री खुद दें,उनके पन्ना प्रमुख नहीं। मंच भी संसद ही होनी चाहिए।

लेकिन बिना टैलिप्राम्प्टर के अटकने, भटकने वाले कार्यपालिका के प्रमुख देश के पीएम
2
एकतरफा संवाद पसंद करते हैं, क्योंकि सवालों, बहस से उन्हें नफ़रत है।

बजट पेश होने के बाद मोदी ने कहा था कि वे उसे पढ़ेंगे, समझेंगे। एक दिन बाद ही उन्होंने जीडीपी को 230 लाख करोड़ के बजाय 2.30 लाख करोड़ बक दिया और वह भी बीजेपी के मूर्ख कार्यकर्ताओं के सामने।
3
Read 8 tweets

Did Thread Reader help you today?

Support us! We are indie developers!


This site is made by just two indie developers on a laptop doing marketing, support and development! Read more about the story.

Become a Premium Member ($3/month or $30/year) and get exclusive features!

Become Premium

Don't want to be a Premium member but still want to support us?

Make a small donation by buying us coffee ($5) or help with server cost ($10)

Donate via Paypal

Or Donate anonymously using crypto!

Ethereum

0xfe58350B80634f60Fa6Dc149a72b4DFbc17D341E copy

Bitcoin

3ATGMxNzCUFzxpMCHL5sWSt4DVtS8UqXpi copy

Thank you for your support!

:(