प्रश्न = महाभारत काल में जब दो चचेरे भाइयों में व्यक्तिगत लड़ाई थी, तो उसमें सम्पूर्ण योद्धाओं को समिल्लित होने की क्या जरूरत थी ?
पिछले लगभग 100 सालों में दुनिया ने दो विश्व युद्ध देखे। 1945 के आसपास दूसरा विश्व युद्ध खत्म हुआ,
उसके बाद से अब तक अगले विश्व युद्ध की कोई संभावना नही बनी।
युद्ध अपने आप मे कोई लक्ष्य नही होता, पर युद्ध का लक्ष्य है कि बाद में लम्बे समय तक शांति बनी रहनी चाहिए।युद्ध के बाद भी जीतने वाले पक्ष को सदा आशंकित रहना पड़े तो क्या मतलब , इसलिए आखिरी दिन दुर्योधन तालाब में छिप गया
तब भी उसको ढूंढ कर वध किया गया आज हम चाहे जो कहें पर दुर्योधन के पास पाण्डवों से ज्यादा लोगों का समर्थन था,उसकी सेना डेढ़ गुना थी। अधिकतर लोगों को लगता था कि दुर्योधन जीतेगा। राजा अधर्मी और लालची थे इसलिए उन्हें लगता था कि साधु स्वभाव के पांडव जीत भी गए तो अपने सहयोगियों को
कुछ धन संपदा नही देंगे,इसलिए नकुल-सहदेव का मामा शल्य भी कौरवों में जा मिला।
एक विकल्प ये भी था कि युद्ध में भाग न लिया जाए, बाद में जीते हुए पक्ष से हाथ मिला लें पर राजनीतिक रूप से तब आपकी कोई अहमियत नही रहती। 5 साल रेल मंत्री रहने के बाद
2009 के चुनाव के पहले लालू यादव ने कांग्रेस से समझौता नही किया, ये सोचा कि मेरे बिना UPA की सरकार नही बन सकती,तब वो अपने आप को "किंग मेकर"कहते थे। चुनाव के नतीजों का गणित ऐसे बैठा कि बिना लालू के समर्थन के कांग्रेस के पास 272 हो गए। बाद में उन्होंने upa को समर्थन दिया पर उनको
सोनिया गांधी ने कोई भाव नही दिया।
उस समय के लोकाचार के हिसाब से कोई भी क्षत्रिय रति निमंत्रण और रथ निमंत्रण( युद्ध का आह्वान) नही ठुकरा सकता था। अर्जुन ने अप्सरा उर्वशी का रति निमंत्रण ठुकराया था तो वो क्रोधित हो गई थी। वैसे ही रथ निमंत्रण को भी मना नही करते थे।
सबसे बड़ी बात ,कौरव-पांडव समझौता करना चाहते भी तो कई लोग अड़ंगा लगा देते क्योंकि इनको आपसी खुन्नस निकालनी थी।
1. कर्ण को अर्जुन से युद्ध करना था।
2. द्रुपद,धृष्टद्युम्न और शिखंडी को द्रोण से हिसाब बराबर करना था।
3. दो यादव कृतवर्मा और सात्यकि एक दूसरे को फूटी आंख नही भाते थे।
4. जयद्रथ को पांडवों से अपने अपमान का बदला लेना था।
ऐसे कई और लोग "फाइट क्लब" की तलाश में थे। दुर्योधन शांति की बात भी करता तो ये लोग उसको युद्ध के लिए उकसाते रहते।
18 दिन का युद्ध नही होता तो इनके छोटे-छोटे युद्ध होते रहते तो भी जनता त्रस्त ही रहती।
इसलिए अच्छा ही हुआ कि इस "न भूतो न भविष्यति" युद्ध मे अधिकतर अधर्मी मारे गए।
इस महाविनाश की ग्लानि में पांडव हमेशा दुखी रहे पर आम जनता को युधिस्ठिर जैसा राजा मिला।
ये एक प्राणान्तक युद्ध था, कोई गली-मोहल्ले का क्रिकेट मैच नही कि हार गए तो भी विपक्षी से हाथ मिलाकर घर आ ही जायेंगे 10-15 लोगों को छोड़कर अधिकतर योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए थे।
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प्रश्न = आध्यात्मिकता, क्या एक जन्मजात गुण है? अथवा जीवन में कुछ नहीं पाने के मलाल का परिणाम भी है ?
"भज गोविन्दम भज गोविन्दम गोविन्दम भज मूढ़मते" अरे मेरे मूर्ख मन! गोविंद का भजन कर! गोविंद का भजन कर!
मल मूत्र के छोटे से थैले में पड़ा हुआ असहनीय पीड़ा का दिन-रात अनुभव करता हुआ एक गर्भस्थ शिशु यही तो प्रार्थना करता है उस परब्रह्म परमेश्वर से जिसने उसे फिर से संसार चक्र में अनेको पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, कीट-पतंगों जैसी योनियों में उत्पन्न करते हुए।
अंत मे मनुष्य की योनि दया करके प्रदान की है।
उस गर्भ में जब से पिंड में जीव प्रवेश करता है, तभी से उस जीव को अपने सारे पूर्वजन्मों की स्मृतियाँ होने लगती है।
जाने कितनी बार ही मानव बनाया गया और भोग-विलास, अभिमान-क्रोध और धन के लोभ में अंधा होकर हर जन्म व्यर्थ कर दिया।
प्रश्न - धर्मका नाश हो जानेपर सम्पूर्ण कुलमें पाप भी बहुत फैल जाता है , इस कथनका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर - पाँच हेतु ऐसे हैं , जिनके कारण मनुष्य अधर्मसे बचता है और धर्मको सुरक्षित रखनेमें समर्थ होता है - ईश्वरका भय , शास्त्रका शासन , कुल - मर्यादाओंके टूटनेका डर राज्यका कानून
और शारीरिक तथा आर्थिक अनिष्टकी आशंका । इनमें ईश्वर और शास्त्र सर्वथा सत्य होनेपर भी वे श्रद्धापर निर्भर करते हैं , प्रत्यक्ष हेतु नहीं हैं । राज्यके कानून प्रजाके लिये ही प्रधानतया होते हैं , जिनके हाथों में अधिकार होता है , वे उन्हें प्राय : नहीं मानते ।
शारीरिक तथा आर्थिक अनिष्टकी आशंका अधिकतर व्यक्तिगत रूपमें हुआ करती है । एक कुल- मर्यादा ही ऐसी वस्तु है , जिसका सम्बन्ध सारे कुटुम्बके साथ रहता है । जिस समाज या कुलमें परम्परासे चली आती हुई शुभ और श्रेष्ठ मर्यादाएँ नष्ट हो जाती हैं ,