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अबकी बार कार्नवालिस सरकार ...
लार्ड साहिब असल लार्ड थे, उच्चकुल शिरोमणी गर्वनर जनरल। इसके पहले क्लाईव और वारेन हेस्टिंग्ज दलित टाइप के जीव थे। याने वो कंपनी एम्पलॉयी, छोटी मोटी नौकरी से शुरूआत, और प्रमोट होते होते गर्वनर बने।
लेकिन लार्ड कार्नवालिस,एक दिन अचानक हाईकमान के आदेश पर गुजरात के गवर्नर बन गए।
गुजरात टाइपो इरर है, बंगाल पढा जाए।तो असल मे अमरीका जाकर जार्ज वाशिंगटन से माफी मांगने के कारण कार्नवालिस की प्रसिद्धि चहुं ओर फैली थी। उन्होने संसद को बताया कि अमेरिका मे न कोई घुसा है,न आया है ..
बस वो इलाका हमारे हाथ से निकल गया है। इस पर खुश होकर जब भारत की गवर्नरी ऑफर की गई, तो पहले पहल उन्होने मना कर दिया।

दरअसल कार्नवालिस को नंदकुमार केस का पता चल चुका था। इसके कारण हेस्टिंग्ज के इंपीचमेण्ट की तैयारी चल रही थी। कार्नवालिस कोई लोचा नहीं चाहते थे।
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भारत मे जब प्लासी की धूल छंट रही थी ..

जर्मनी के फ्रेड्रिक ने सैक्सनी पर हमला कर दिया। इसके साथ ही सात बरस तक चलने वाली मशहूर लड़ाई शुरू हो चुकी थी। इस समय चार्ल्स, ऐटन के मशहूर कॉलेज मे पढ ही रहा था।

वो बड़े प्रभावशाली और पहुंचे हुए खानदान का चश्मो चिराग था।
महान बनना चाहता था, तो सेना मे कैप्टन का पद खरीदा गया। चार्ल्स कार्नवालिस लाल कोट पहनकर यूरोप मे लडने चला गया।

सप्तवर्षीय युद्ध खत्म होते हुए वह कर्नल बन चुका था। लंदन लौटकर उसने हाउस ऑफ कामन्स की सांसदी खरीदी और पॉलिटिक्स करने लगा। यह वक्त अमेरिका मे असंतोष फूटने का था।
कार्नवालिस अच्छा आदमी था, इसलिए अमेरिकन कालोनी पर टैक्स बढाने का विरोधी थां। लेकिन जब चाय पर टैक्स के विरोध मे बोस्टन मे फसाद हुआ, दोबारा लाल कोट पहनकर, अमेरिकन्स से लडने मे उसे कोई हिचक भी न हुई।

वैसे भी वहां कुछ किसान तो थे, जो छोटे मोटे हथियार से लड़ रहे थे।
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हिंदुस्तान का पहला ज्यूडिशियल मर्डर..

सुप्रीम ठोक की स्थापना के अगले ही साल हो गया था। फांसी की पर टांगा गया था हिंदुस्तान का पहला व्हिसिलब्लोवर- राजा नंदकुमार,

और उसका अपराध- राजा की रिश्वतखोरी को उजागर करना।
रेगुलेटिंग एक्ट के निर्देशों के बाद वारेन हेस्टिंग्स अब बंगाल का गवर्नर जनरल था, और उसके हाथ मे एक नई प्रशासनिक व्यवस्था को बिठाने का जिम्मा था।

मगर वह निरंकुश बादशाह न बने, एक्ट में इसकी भी व्यवस्था थी। वाइसराय की एक काउंसिल होनी थी, जिसमे 5 लोग थे।
स्वयं वाइसराय चेयरमैन, और चार दूसरे अफसर।

और उनमें से तीन अक्सर हेस्टिंग्ज से असहमत रहते। इसका असर यह था कि कमेटी में झगड़े और कटुता का वातावरण था। इनमे से एक मेम्बर को हेस्टिंग्ज के करप्शन का पता लगा।
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प्रशासन का मूल- अर्थ है..

अर्थ मतलब पैसा, रोकड़ा, नगदी। इसके बिना संगठन सूना हो जाता है, जैसे नोटबन्दी के बाद विपक्ष कमजोर हो जाता है, (और सत्तापक्ष लबालब..)

इसलिए चाणक्य की किताब, जो लोक प्रशासन पर है, उसका नाम अर्थशास्त्र है। प्रशासक यदि मूर्ख, आदतन भिखारी और
अनपढ़ न हो, तो जानता है सरकार चलाने को पैसा टैक्स से आएगा।

और तब आयेगा, जब जनता कमाएगी, खुश और संतुष्ट रहेगी। उसे न्याय और सरकार से सहयोग मिलेगा। अब अंग्रेज तो मूर्ख थे नही, अनपढ़ भिखारी भी न थे।

इसलिए 1773 का रेगुलेटिंग एक्ट आया।
दरअसल ब्रिटिश पार्लियामेंट, ईस्ट इंडिया कम्पनी के निवेशकों के दुख से दुखी थी। कम्पनी लॉस में जा रही थी, और क्लाईव जैसे कर्मचारी, अपनी दौलत का नंगा प्रदर्शन कर रहे थे। पार्लियामेंट ने दखल दिया। अब बंगाल में कम्पनी को, सरकारी कायदों के तहत चलना था। एक अच्छा प्रशासन देना था।
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बर्कले स्क्वेयर पर क्लाईव का भव्य मकान था। बड़े लोगो से दोस्ती की। जनता में क्लाईव ऑफ इंडिया के नाम से मशहूर हो गए।

वो बचपन से ही लार्ड बनना चाहते थे। मगर लार्ड का ओहदा तो, ब्रिटिश किंग देता है। क्लाईव तो वह स्वयम्भू baron बन गया।
कहीं भी जाता, एक चमचा चिल्लाता- बा अदब, बा मुलाहिजा, होशियार, .. बंगाल के भूतपूर्व गवर्नर, बैरोन ऑफ प्लासी, जनरल रॉबर्ट क्लाईव जी पधार रहे हैं।
मगर लड़े बगैर क्लाईव को डिप्रेशन आ जाता। यहाँ उसका दुश्मन ईस्ट इंडिया कम्पनी का डायरेक्टर लॉरेंस सुलिवान था।
क्लाईव ने प्रधानमंत्री पिट को चिट्ठी लिखी-

"ईस्ट इंडिया कम्पनी के मामलात इंडिया में बड़े हो रहे हैं। किसी कम्पनी को यह सब सम्हालने नही देना चाहिए। अच्छा होगा कि कम्पनी को हटाकर, ब्रिटिश क्राउन बंगाल का शासन हाथ मे लेले। अगर आप ऐसा करते हैं, तो मैं हिंदुस्तान
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राजनीति के अपराधीकरण की स्क्रिप्ट हर जगह एक ही होती है।पहले नेता एक गुंडा चुनता है। उसकी मदद से दबदबा कायम करता है।
और चुनाव जीतता है।
फिर एक वक्त गुंडा समझ जाता है कि जो जो काम,वह इल्लीगल पॉवर,औऱ बड़े रिस्क के साथ करता है,वही चीज लीगल पॉवर और बिना रिस्क के नेताजी कर लेते हैं।
हनुमानजी की तरह गुंडे को जब अपनी ताकत का अंदाजा हो जाये, थोड़े बहुत गुर सीख जाये, तो वो खुद के लिए काम करता हैं। बुद्धिमान गुंडे जल्द ही नेता, विधायक, मंत्री और सरकार बनते हैं।

अखबारों में प्रशस्ति छपवाते हैं। राजनीति करते हैं। और अपने गुरु को ही चुनौती देते हैं।
भारत मे तिजारती कम्पनियों को, सिर चढ़ाकर मिल्ट्री पावर बनाने वाले, हमारे ही राजे महाराजे थे। डूप्ले, याने फ्रेंच के अर्काट के साथ सम्बंध, आप जान चुके हैं। वहीं अंग्रेजो को भारतीय राजनीति की घुट्टी, मराठों से मिली।

इस वक्त मुगल तख्त, मोहम्मद शाह "रंगीला" के हाथ मे था।
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