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The enemies are only 50 yards from us. We are heavily outnumbered. We are under devastating fire. I shall not withdraw an inch but will fight to our last man and our last round.

— Major Somanth Sharma, Battle of Badgam, 1947

Today's the Jayanti of First Paramaveera Chakra Image
Recipient Major Somanath Sharma.

On October 22, 1947 Pakistan Invaded Bharat and Bharatiya Military was deployed by October 25th

On 3 November, a batch of three companies was deployed to the Badgam area on patrol duties. Their objective was to check the infiltrators moving
toward Srinagar from the north. As there was no enemy movement, two of the three deployed companies returned to Srinagar at 2:00 pm. However, Sharma's D Company, was ordered to stay in position until 3:00 pm.

The M's Showed Their True Colours Then...
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#BhagavadGita

अध्याय: ०७, श्र्लोक: २९

जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्य तद्विदुः कृत्स्न्मध्यात्म कर्म चाखिलम् ॥
जो मेरी शरण ग्रहण करते हैं, वे बुढ़ापे और मृत्यु से छुटकारा पाने की चेष्टा करते हैं, वे ब्रह्म, अपनी आत्मा और समस्त कार्मिक गतिविधियों के क्षेत्र को जान जाते हैं।
जरा-वृद्धावस्था; मरण-और मृत्यु से; मोक्षाय–मुक्ति के लिए; माम्-मेरे; आश्रित्य–शरणागति में; यतन्ति-प्रयत्न करते हैं; ये-जो; ते-ऐसे व्यक्ति; ब्रह्म-ब्रह्म; तत्-उस; विदु-जान जाते हैं; कृत्स्नम्-सब कुछ; अध्यात्मम्-जीवात्मा; कर्म-कर्म; च-भी; अखिलम्-सम्पूर्ण।
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#BhagavadGita

अध्याय: ०७, श्र्लोक: २८

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥
लेकिन पुण्य कर्मों में संलग्न रहने से जिन व्यक्तियों के पाप नष्ट हो जाते हैं, वे मोह के द्वन्द्वों से मुक्त हो जाते हैं। ऐसे लोग दृढ़ संकल्प के साथ मेरी पूजा करते हैं।
येषाम्-जिसका; तु–लेकिन; अन्त-गतम्-पूर्ण विनाश; पापम्-पाप; जनानाम्-जीवों का; पुण्य-पवित्र; कर्मणाम्-गतिविधियाँ; ते–वे; द्वन्द्व-द्विविधताएँ; मोह-मोह; निर्मुक्ताः-से मुक्त; भजन्ते-आराधना करना; माम्-मुझको; दृढ-व्रताः-दृढसंकल्प।
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#BhagavadGita

अध्याय: ०७, श्र्लोक: २७

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥ Image
हे भरतवंशी! इच्छा तथा घृणा के द्वन्द मोह से उत्पन्न होते हैं। हे शत्रु विजेता! भौतिक जगत में समस्त जीव जन्म से इन्हीं से मोहग्रस्त होते हैं।
इच्छा-इच्छा; द्वेष-घृणा; समुत्थेन-उत्पन्न होने से; द्वन्द्व-द्वन्द्व से; मोहेन-मोह से; भारत-भरतवंशी, अर्जुन; सर्व-सभी; भूतानि-जीव; सम्मोहम्-मोह से; सर्गे–जन्म लेकर; यान्ति–जाते हैं; परन्तप-अर्जुन, शत्रुओं का विजेता।
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Sri Aurobindo on Bhagavad Gita, humanity's greatest asset: The human mind moves way forward, alters its viewpoint and enlarges its thought substance,and the effect of these changes is to render past systems of thinking obsolete or, when they are preserved, to extend,to modify 1/6 Image
and subtly or visibly alter their value. The vitality of an ancient doctrine consists in the extent to which it naturally lends itself to such treatment; for that means that whatever may have been the limitations or the obsolescences of the form of its thought, the truth of 2/6
substance, the truth of living vision and experience on which its system was built is still sound and retains a permanent validity and significance. The Gita is a book that has worn extraordinarily well and it is almost as fresh and still in its real substance quite as new, 3/6
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#GEETAJAYANTHI 🙏🙏🙏
#Bhagawadgita chintana🧵
Margasira sukla Ekadasi is revered as Geeta Jayanthi, the day Lord #SriKrishna counselled Arjuna with his famous preaching #Bhagawadgita. But it was not first time Supreme God preaching the philosophy and Arjuna was not the first person to be imparted with the divine knowledge.+
In 4th Canto #JnaAnaYoga (sloka #1) Sri Krishna says,
" I taught this imperishable Yoga (Bhagawadgita)
to #Vivaswan (Sun God-Surya);
He (#Surya) in turn taught it to #Manu (#Vaivaswatha) who in turn taught it to #Ikshvaaku (in whose dynasty Lord Sri #Ramachandra was born)". +
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#Ghantasala దేశభక్తిని రగిలించాలన్నా.. జానపదాలతో ఉర్రూతలు ఊగించాలన్నా..ప్రేమగా పాడుకోవాలన్నా..దేవుడిని భక్తిగా ఆరాధించాలన్నా... తెలుగు పద్యాలను అలవోకగా ఆలపించాలన్నా ఆయన గొంతే కేరాఫ్‌. గానగాంధర్వుడిగా చరిత్రలో నిలిచిపోయిన ఆయనే ఘంటశాల వెంకటేశ్వరరావు.. ఈయన మన వాసి కావడం మనకే
గర్వకారణం.. ఈ రోజు ఆయన జయంతి ఈ సందర్భంగా ఆయన గురించి కొన్ని విశేషాలు తెలుసుకుదాం....🎵🎶👨‍🎤📻🎙️

ఘంటశాల వెంకటేశ్వరరావు 1922 డిశంబర్‌ 4న గుడివాడ మండలం చౌటపల్లిలో ఘంటశాల సూర్యనారాయణ, రత్నమ్మ దంపతులకు జన్మించారు. చిన్నప్పటి నుండే భజనలు, కీర్తనలు తండ్రి వెంట పాడుతూ ఉండేవారు.
తండ్రి ఆశయం నెరవేర్చాలనే లక్ష్యంతో సంగీత గురుకులంలో చేరారు. అక్కడి కట్టుబాట్లను తట్టుకోలేక తిరిగి సొంత ఊరికి వచ్చేశారు. తెలిసిన కొందరు సంగీత విద్వాంసుల ఇళ్ళలో పని చేస్తూ సంగీతం అభ్యసించాలని నిర్ణయించుకున్నారు. ఈ క్రమంలో పని ఒత్తిడి పెరగడంతో ఆయన సంగీత కళాశాలలో చేరాలని అనుకున్నారు.
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#GeetaJayanti #BhagavadGita
గీతా జయంతి హిందూ పవిత్ర గ్రంథం భగవద్గీత పుట్టినరోజు. ఇది భారతదేశం మరియు ప్రపంచ వ్యాప్తంగా హిందూ పంచాంగం ప్రకారం మార్గశిర శుద్ధ ఏకాదశి రోజు జరుపుకొంటారు.
#GeetaDay #GeetaJayanti 📖🚩
ఈ రోజు కౌరవ రాజు దృతరాష్ట్రునికి సంజయుడు కురుక్షేత్ర సంగ్రామంలో
శ్రీకృష్ణుడు అర్జునునికి బోధించిన గీతోపదేశాన్ని వినిపించాడు. ఈ ఉద్గ్రంథం మానవులకు లభించిన వరంగా భావించాలి. సుమారు 6,000 సంవత్సరాల పుర్వం ఉపదేశించబడినా ఇది ప్రస్తుత కాలపు మానవులకు ఉపయోగపడడం విశేషము. ఇది మానవుల్ని మానవత్వం కలిగిన మంచి మార్గం లో నడిపిస్తుంది.
కాని వాస్తవంగా ఆ రోజున భగవద్గీత పుట్టలేదు, ఆవిర్భవించినది. శ్రీకృష్ణ భగవానుడు అర్జునునకు గీతోపదేశం చేసినాడని ఈనాడు అనగా మార్గశీర్ష శుద్ధ ఏకాదశి నాడు సంజయుడు ధృతరాష్ట్రునకు చెప్పినాడు. కౌరవపాండవ యుద్ధం ప్రారంభమైన తరువాత పదియవనాడు ధృతరాష్ట్రుడు సంజయునితో
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#BhagavadGita

अध्याय: ०६, श्र्लोक: २६

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥
जब और जहाँ भी मन बेचैन और अस्थिर होकर भटकने लगे तब उसे वापस लाकर स्थिर करते हुए भगवान की ओर केन्द्रित करना चाहिए।
यतः-यत:-जब भी और जहाँ भी; निश्चरति-भटकने लगे; मन:-मन; चञ्चलम्-बेचैन; अस्थिरम्-अस्थिर; ततः-तत:-वहाँ से; नियम्य-हटाकर; एतत्-इस; आत्मनि-भगवान पर; एव-निश्चय ही; वशम्-नियंत्रण; नयेत्-ले आए।
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#BhagavadGita

अध्याय: ०६, श्र्लोक: २५

शनैः शनैरूपरमेबुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥
फिर धीरे-धीरे निश्चयात्मक बुद्धि के साथ मन केवल भगवान में स्थिर हो जाएगा और भगवान के अतिरिक्त कुछ नहीं सोचेगा।
शनै:-क्रमिक रूप से; शनै:-क्रमिक रूप से; उपरमेत्–शान्ति प्राप्त करना; बुद्धया-बुद्धि से; धृति-गृहीतया-ग्रंथों के अनुसार दृढ़ संकल्प से प्राप्त करना; आत्म-संस्थम्-भगवान में स्थित; मन:-मन; कृत्वा-करके; न-नहीं; किञ्चित्-अन्य कुछ; अपि-भी; चिन्तयेत्-सोचना चाहिए।
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#BhagavadGita

अध्याय: ०६, श्र्लोक: २४

सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥
संसार के चिन्तन से उठने वाली सभी इच्छाओं का पूर्ण रूप से त्याग कर हमें मन द्वारा इन्द्रियों पर सभी ओर से अंकुश लगाना चाहिए।
संकल्प-दृढ़ संकल्पः प्रभवान्–उत्पन्न; कामान्–कामना; त्यक्त्वा-त्यागकर; सर्वान्-समस्त; अशेषत:-पूर्णतया; मनसा-मन से; एव-निश्चय ही; इन्द्रिय-ग्रामम्-इन्द्रियों का समूह; विनियम्य-रोक कर; समन्ततः-सभी ओर से।
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#BhagavadGita

अध्याय: ०६, श्र्लोक: २३

तं विद्यादः दुःखसंयोगवियोगं योगसज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥ Image
दुःख के संयोग से वियोग की अवस्था को योग के रूप में जाना जाता है, ऐसा तू जान। इस योग का दृढ़तापूर्वक कृतसंकल्प के साथ निराशा से मुक्त होकर पालन करना चाहिए।
तम्-उसको; विद्यात्-तू जान; दु:ख-संयोग-वियोगम्-वियोग से दुख की अनुभूति; योग-संज्ञितम्-योग के रूप में ज्ञान; निश्चयेन-दृढ़तापूर्वक; योक्तव्यो–अभ्यास करना चाहिए; योग-योग; अनिर्विण्णचेतसा-अविचलित मन के साथ।
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#BhagavadGita

अध्याय: ०६, श्र्लोक: ०७

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥
वे योगी जिन्होंने मन पर विजय पा ली है वे शीत-ताप, सुख-दुख और मान-अपमान के द्वंद्वों से ऊपर उठ जाते हैं। ऐसे योगी शान्त रहते हैं और भगवान की भक्ति के प्रति उनकी श्रद्धा अटल होती है।
जित-आत्मन:-जिसने मन पर विजय प्राप्त कर ली हो; प्रशान्तस्य–शान्ति; परम-आत्मा-परमात्मा; समाहितः-दृढ़ संकल्प से; शीत-सर्दी; उष्ण-गर्मी में; सुख-सुख, दुःखेषु-और दुख में; तथा-भी; मान-सम्मान; अपमानयोः-और अपमान।
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#BhagavadGita

अध्याय: ०६, श्र्लोक: ०६

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥
जिन्होंने मन पर विजय पा ली है, मन उनका मित्र है किन्तु जो ऐसा करने में असफल होते हैं मन उनके शत्रु के समान कार्य करता है।
बन्धुः-मित्र; आत्मा–मन; आत्मनः-उस व्यक्ति के लिए; तस्य-उसका; येन-जिसने; आत्मा-मन; एव–निश्चय ही; आत्मना-जीवात्मा के लिए; जित:-विजेता; अनात्मनः-जो मन को वश नहीं कर सका; तु-लेकिन; शत्रुत्वे-शत्रुता का; वर्तेत-बना रहता है; आत्मा-मन; एव-जैसे; शत्रु-वत्-शत्रु के समान।
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#BhagavadGita

अध्याय: ०६, श्र्लोक: ०५

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ Image
मन की शक्ति द्वारा अपना आत्म उत्थान कर और स्वयं का पतन न होने दे। मन जीवात्मा का मित्र और शत्रु भी हो सकता है।
उद्धरेत्-उत्थान; आत्मना-मन द्वारा; आत्मानम्-जीव; न-नहीं; आत्मानम्-जीव; अवसादयेत्-पतन होना; आत्मा-मन; एव–निश्चय ही; हि-वास्तव में; आत्मनः-जीव का; बन्धुः-मित्र; आत्मा-मन; एव-निश्चय ही; रिपुः-शत्रु; आत्मनः-जीव का।
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3 ways to overcome jealousy 👇

[A Thread]
1. Acknowledge your jealousy

Jealousy arises when you want what someone else has. So, whenever such feelings of jealousy occur, first acknowledge that yes, I am feeling jealous.
Acknowledge jealousy, and try to find its root cause. This way, you'll become more self-aware and mature in dealing with that emotion.
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#BhagavadGita

अध्याय: ०५, श्र्लोक: २९

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥
जो भक्त मुझे समस्त यज्ञों और तपस्याओं का भोक्ता, समस्त लोकों का परम भगवान और सभी प्राणियों का सच्चा हितैषी समझते हैं, वे परम शांति प्राप्त करते हैं।
भोक्तारम्-भोक्ता; यज्ञ-यज्ञ; तपसाम्-तपस्या; सर्वलोक-सभी लोक; महाईश्वरम्-परम् प्रभु; सुहृदम्-सच्चा हितैषी; सर्व-सबका; भूतानाम्-जीव; ज्ञात्वा-जानकर; माम्-मुझे, श्रीकृष्ण; शान्तिम्-शान्ति; ऋच्छति-प्राप्त करता।
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#BhagavadGita

अध्याय: ०५, श्र्लोक: २७-२८

स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥
समस्त बाह्य इन्द्रियाँ सुख के विषयों का विचार न कर अपनी दृष्टि को भौहों के बीच के स्थान में स्थित कर नासिका में विचरने वाली भीतरी और बाहरी श्वासों के प्रवाह को सम करते हुए इन्द्रिय, मन और बुद्धि को संयमित करके जो ज्ञानी कामनाओं और भय से मुक्त हो जाता है, वह सदा के लिए...
...मुक्त हो जाता है।

स्पर्शान-इन्द्रिय विषयों से सम्पर्क; कृत्वा-करना; बहिः-बाहरी; बाह्यान्–बाहरी विषय; चक्षुः-आंखें; च-और; एव–निश्चय ही; अन्तरे-मध्य में; भ्रवोः-आंखों की भौहों के; प्राण-अपानो-बाहरी और भीतरी श्वास; समौ-समान; कृत्वा-करना; नास-अभ्यन्तर-नासिका छिद्रों के भीतर;
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#BhagavadGita

अध्याय: ०५, श्र्लोक: २६

कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥
ऐसे संन्यासी भी जो सतत प्रयास से क्रोध और काम वासनाओं पर विजय पा लेते हैं एवं जो अपने मन को वश में कर आत्मलीन हो जाते हैं, वे इस जन्म में और परलोक में भी माया शक्ति के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं।
काम-इच्छाएँ; क्रोध-क्रोध; वियुक्तानाम्-वे जो मुक्त हैं; यतीनाम्-संत महापुरुष; यत-चेतसाम्-आत्मलीन और मन पर नियंत्रण रखने वाला; अभितः-सभी ओर से; ब्रह्म-आध्यात्मिक; निर्वाणम्-भौतिक जीवन से मुक्ति; वर्तते-होती है; विदित-आत्मनाम्-वे जो आत्मलीन हैं।
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#BhagavadGita

अध्याय: ०५, श्र्लोक: २५

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥ Image
वे पवित्र मनुष्य जिनके पाप धुल जाते हैं और जिनके संशय मिट जाते हैं और जिनका मन संयमित होता है वे सभी प्राणियों के कल्याणार्थ समर्पित हो जाते हैं तथा वे भगवान को पा लेते हैं और सांसारिक बंधनों से भी मुक्त हो जाते हैं।
लभन्ते–प्राप्त करना; ब्रह्मनिर्वाणम्-भौतिक जीवन से मुक्ति; ऋषयः-पवित्र मनुष्य; क्षीण-कल्मषा:-जिसके पाप धुल गए हों; छिन्न-संहार; द्वैधाः-संदेह से; यत-आत्मानः-संयमित मन वाले; सर्वभूत-समस्त जीवों के; हिते-कल्याण के कार्य; रताः-आनन्दित होना।
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#BhagavadGita

अध्याय: ०५, श्र्लोक: ११

कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥
योगीजन आसक्ति को त्याग कर अपने शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धि द्वारा केवल अपने शुद्धिकरण के उद्देश्य से कर्म करते हैं।
कायेन-शरीर के साथ; मनसा-मन से; बुद्धया-बुद्धि से; केवलैः-केवल; इन्द्रियैः-इन्द्रियों से; अपि-भी; योगिनः-योगी; कर्म-कर्म; कुर्वन्ति-करते हैं; सङ्गम्-आसक्ति; त्यक्त्वा-त्याग कर; आत्म-आत्मा की; शुद्धये-शुद्धि के लिए।
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#BhagavadGita

अध्याय: ०५, श्र्लोक: १०

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥
जो अपने कर्मफल भगवान को समर्पित कर सभी प्रकार से आसक्ति रहित होकर कर्म करते हैं, वे पापकर्म से उसी प्रकार से अछूते रहते हैं जिस प्रकार से कमल के पत्ते को जल स्पर्श नहीं कर पाता।
ब्रह्मण-भगवान् को; आधाय–समर्पित; कर्माणि-समस्त कार्यों को; सङ्गगम्-आसक्ति; त्यक्त्वा-त्यागकर; करोति-करना; यः-जो; लिप्यते-प्रभावित होता है; न-कभी नहीं; स:-वह; पापेन-पाप से; पद्म-पत्रम्-कमल पत्र; इव-के समान; अम्भसा-जल द्वारा।
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#BhagavadGita

अध्याय: ०५, श्र्लोक: ८-९

नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन्॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥
कर्मयोग में दृढ़ निश्चय रखने वाले सदैव देखते, सुनते, स्पर्श करते, सूंघते, चलते-फिरते, सोते हुए, श्वास लेते हुए, बोलते हुए, त्यागते हुए, ग्रहण करते हुए और आंखें खोलते या बंद करते हुए सदैव यह सोचते हैं- 'मैं कर्ता नहीं हूँ' और दिव्य ज्ञान के आलोक में वे यह देखते हैं कि भौतिक...
...इन्द्रियाँ ही केवल अपने विषयों में क्रियाशील रहती हैं।

न-नहीं; एव-निश्चय ही; किंचित्-कुछ भी; करोमि-मैं करता हूँ; इति–इस प्रकार; युक्तः-कर्मयोग में दृढ़ता से स्थित; मन्येत–सोचता है; तत्त्ववित्-सत्य को जानने वाला; पश्यन्–देखते हुए; शृण्वन्–सुनते हुए; स्पृशन्-स्पर्श करते हुए;
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#BhagavadGita

अध्याय: ०५, श्र्लोक: ०७

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥
जो कर्मयोगी विशुद्ध बुद्धि युक्त हैं, अपने मन तथा इन्द्रियों को वश में रखते हैं और सभी जीवों की आत्मा में आत्मरूप परमात्मा को देखते हैं, वे सभी प्रकार के कर्म करते हुए कभी कर्मबंधन में नहीं पड़ते।
योग-युक्त:-चेतना को भगवान में एकीकृत करना; विशुद्ध-आत्मा:-शुद्ध बुद्धि के साथ; विजित-आत्मा-मन पर विजय पाने वाला; जितेन्द्रियः-इन्द्रियों को वश में करने वाला; सर्व-भूत-आत्म-भूत आत्मा-जो सभी जीवों की आत्मा में आत्मरूप परमात्मा को देखता है; कुर्वन्-निष्पादन; अपिः-यद्यपि; न-कभी नहीं;
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